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गजल (फूलों की बात)

2122 2122 2122 2



फूल हैं खिलते निगाहें चार करते हैं,

बागवाँ पर हम बड़ा एतबार करते हैं।1



बाँटते खुशबू जमाने से रहे सब हम,

झेलते झंझा कहाँ तकरार करते हैं?2



हम बटोही प्यार के दो बोल के भूखे ,

खुशनुमा बस आपका संसार करते हैं।3



हैं विहँसते हम सदा बगिया सजाने को,

प्यास आँखों की बुझा आभार करते हैं।4



हो नहीं सकता मसल दे पंखरी कोई,

खार भी रखते बहुत हम प्यार करते हैं।5



जां लुटाने की अगर नौबत हुई तब भी,…

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Added by Manan Kumar singh on September 26, 2016 at 7:00am — 6 Comments

ग़ज़ल -- हरगिज़ न हमको मूकदर्शक पासबानी चाहिए ( दिनेश कुमार 'दानिश' )

2212--2212--2212--2212



हरगिज़ न हमको मूकदर्शक पासबानी चाहिए

दुश्मन का मुँह जो तोड़ दे अब वो जवानी चाहिए



फ़िरक़ा परस्ती की जड़ों को काटना है गर हमें

लफ़्ज़े-सियासत के लिए उम्दा म'आनी चाहिए



ये क्या कि हम बँटते गए दैरो-हरम के नाम पर

जम्हूरियत जब हो, रेआया भी सयानी चाहिए



उस उम्र में बच्चों के हाथों में यहाँ हथियार हैं

जिस उम्र में ख़ुशियों की उनको मेज़बानी चाहिए



ग़ुरबत अशिक्षा भुखमरी के मुद्दए तो गौण हैं

संसद में चर्चा… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 26, 2016 at 5:32am — 4 Comments

मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने

मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने

मै हँसूंगा तो उतर जाएंगे चेहरे कितने



मेरी जफाओं का रोना रोते हो बहोत

तुम अपनी वफाओं मे ठहरे कितने



आस्मा अपनी उसत लिए ठहरा है

है समंदर तुम्हारे गहरे कितने



काम थोडा कर लेते है लेकिन

लोग सजा लेते है सहरे कितने



मोहब्बत का पैगा़म सुनाना है मुझे

देखिए तो ये लोग है बहरे कितने



ताबिर जो बतलाते है आज ख़्वाबों कि

बता नही सक्ते दरपेश है ख़तरे कितने



ये तो अपनी नज़र तय करेगी… Continue

Added by Azeem Shaikh on September 25, 2016 at 11:30pm — 5 Comments

मत्तगयंद सवैया: अलका चंगा

छाँव बने तन भाव जगे मन चाव सजे चहकी फुलवारी ,

पावन भाव जगे मन में जब मात बनी यह देह हमारी,

ये वरदान मिला जग में जब बिटिया खेलत गोद हमारी,

चाव जगे इस जीवन के जब आँगन बीच सजी किलकारी,

.

नन्हि परी जब मात पुकारत आतम हो जय धन्य हमारी

झांझर डोलत कोयल बोलत व्याकुल हो महकी अंगनारी

मीत सखी बन जाय सदा सब बात सुने अब मोरि दुलारी

मान करे सबका फिर भी प्रतिपात सहे जग में हर नारी

.

जोगन प्रीत तजे रसना सब भोग सजे मुख खावत नाही

कृष्ण सदा बसते मन में सब भार…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 25, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

श्रद्धा और श्राद्ध/सतविन्द्र कुमार राणा

आस्थाओं का ढोल बजा है



श्रद्धा का बाजार सजा है



विश्वासों की लगती बोली



मानवता को मारो गोली।





मैं बिकता हूँ तू बिकता है



अब बिकता ईश्वर दिखता है



मान बड़ों का कब होता है



श्रद्धा का मतलब खोता है।





श्रद्धा आडम्बर  बन जाती



जब दुनिया पाखण्ड दिखाती



जीते जी टुकड़ों को तरसे



फिर भोजन कागों पर बरसे।





श्रद्धा से अपनों को मानों



कीमत जीते जी की… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 25, 2016 at 10:34pm — 8 Comments

ग़ज़ल - मेरी ग़ज़ल पे निशाना है बात क्या करना

1212 1122 1212 22



बड़ा खराब ज़माना है बात क्या करना ।

मेरी ग़ज़ल पे निशाना है बात क्या करना ।।



नहीं है नज्म की तहजीब जिस मुसाफिर को ।

उसी से दिल का फ़साना है बात क्या करना ।।



अजीब शख़्स यूँ पढ़ता उन्हीं निगाहों को ।

किसी को वक्त गवाना है बात क्या करना ।।



बिखर गए है तरन्नुम के हर्फ़ महफ़िल में ।

नजर नज़र से मिलाना है बात क्या करना ।।



हुजूर जिन से दुपट्टे कभी नही सँभले ।

उसे भी घर को बसाना है बात क्या करना ।।



दिखी है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 25, 2016 at 6:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

212 212 212 212 212 212 212 212





एक दिन सब बदल जायेगा हमसफर, ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर

वक़्त है तो कठिन कट रहा है मगर , ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर



भावनाएं भंवर के मुहाने पे हैं,तेरी मर्ज़ी भी तो डूब जाने में है

क्यों सताता है फिर खोने पाने का डर,ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर



राह कैसी भी हो मुस्कुराले ज़रा,अपने दिल का सबर आज़मा ले ज़रा

तेरी आहट में है रौशनी का नगर, ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर



कोई नाशाद है कोई… Continue

Added by मनोज अहसास on September 25, 2016 at 3:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल (दर्द दे वो चले)

दर्द दे वो चले पर दवा कौन दे,

साँस थमने लगी अब दुआ कौन दे।



चाहतें दफ़्न सब हो के दिल में रही,

जब जफा ही लिखी तो वफ़ा कौन दे।



प्यास बढ़ती रही आप छिपते रहे,

आग दिल में लगी पर बुझा कौन दे।



मंजिलें दूर जब हमसे जाने लगी,

हाथको थाम के आसरा कौन दे।



आशियाँ तक हमारा गया है उजड़,

याद में जो उसे अब बसा कौन दे।



बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

तिनसुकिया



(212 212 212 212 बहर की रचना)



मौलिक व… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 25, 2016 at 11:30am — 8 Comments

ग़ज़ल

बहर : २१२ २१२ २१२ २१२

पेट को चाहिए  खाद्य, नारा नहीं

पेट जितने से भर जाय, सारा नही |

भावना की कमी,  जाँचना चाहिए

भूखे  को चाहिए खाना,चारा नहीं | 

सारे रिश्ते बिगड़ते हैं, तकरार से  

शत्रुवत  और हो जाता  यारा नहीं |

बात है कर्ण प्रिय ,’आयगा अच्छा दिन”

अब किसी को भी यह, लगता प्यारा नहीं |

देख कर ठण्ड वातावरण क्या कहें

पी गए मय मधुर किन्तु प्यारा नहीं |

सिन्धु जल मेघ बन फिर बरसता…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on September 25, 2016 at 8:30am — 6 Comments

तंत्र-मन्त्र-यंत्र--- डॉo विजय शंकर

तंत्र को नैये-नैये मंत्र मिल रहे हैं ,

सफलता और विकास के नैये-नैये

शब्दकोष रचे जा रहे हैं ,

शब्द , नैये-नैये अर्थ पा रहें हैं ,

अर्थ , पुरुषार्थ में पुरोधा बन रहे हैं।

पा लें , सब पा लें की होड़ लगी हैं ,

क्या खो रहें हैं , देख नहीं पा रहें हैं।

सत्ता , मद - यामिनी ,

सिंहासन , पद - वाहिनी ,

जब डोलता है तो ,

डोलता हुआ नहीं लगता है ,

झूला झुलाता हुआ लगता है ,

जागो , जागते रहो , कहनेवाला ,

खुद नींद में सोया-सोया लगता है।

आगे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 25, 2016 at 7:35am — 8 Comments

चवपैया छंद

(चवपैया छंद-10, 8, 12 मात्रा के तीन -तीन चरणों के कुल चार पद , प्रत्येक पद के प्रथम एवं द्वितीय चरण मं समतुक एवं दो-दो पद में 1122 मात्रा या पदांत 2 मात्रा के के साथ समतुक पर हो)

हे आदि भवानी, जग कल्याणी, जन मन के हितकारी ।
माँ तेरी ममता, सब पर समता, जन मन को अति प्यारी ।।
हे पाप नाशनी, दुख विनाशनी, जग से पीर हरो माँ ।
आतंकी दानव, है क्यों मानव, जन-मन विमल करो माँ ।।

...................................

मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 25, 2016 at 7:30am — 2 Comments

मानवता

आज बलि चढ़
रही है मानवता
हर तरफ़
शहीद हुए जा
रही है सचाई
गुम हो गये
है प्यार के फूल
डरा के छुप
रही है परछायी
कौन है ज़िम्मेदार
दरंदगी के लहु का
हर ओर क्यूँ
हो रही लड़ाई
मौलिक अप्रकाशित

Added by S.S Dipu on September 25, 2016 at 12:24am — 6 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : श्रद्धांजलि (गणेश जी बागी)

श्रद्धांजलि
राज पथ पर अवस्थित
शहीद चौक ..
लोगो का हुजूम
मिडिया वालों का आवागमन
चकमक करते कैमरे
चमकते-दमकते चेहरे
फोटो खिंचाने की होड़
हाथों में मोमबत्तियाँ
नहीं-नहीं, कैंडल....
साथ में लकदक पोस्टर, बैनर
जिनपर अंकित था -
'शहीदों को
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि' !!

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 25, 2016 at 12:00am — 11 Comments

ग़ज़ल - आँख जब भी कभी लड़ी होगी

बहरे ख़फ़ीफ़ मुसद्दस् मख़बून

फाइलातुन मुफाइलुन् फेलुन



2122 1212 22

‌

उन अदाओं में तिश्नगी होगी ।

कोई खुशबू नई नई होगी ।।



यूं ही नाराजगी नही होती ।

बात उसने भी कुछ कही होगी ।।



होश आया कहाँ उसे अब तक ।

कुछ तबीयत मचल गई होगी ।।



बेकरारी का बस यही आलम ।

बे खबर नींद में चली होगी ।।



कर गया इश्क में तिज़ारत वह ।

शक है नीयत नहीं भली होगी ।।



वो बगावत की बात करता है ।

खबर शायद सही पढ़ी होगी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 24, 2016 at 11:54am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ज़ज्बात के समंदर ऐसी शराब रखना ---फिल्बदीह ग़ज़ल "राज '

मैं फूल इक छुपा दूँ दिल में किताब रखना

तैयार कल उसी में अपना जबाब रखना

 

वो सामने कहूँगा जो बात सच लगी है

तुम नाम चाहे मेरा खानाखराब रखना 

 

 कैसा एजाज़ वल्लाह कैसा हुनर है तुझमे

होटों पे इक तबस्सुम दिल में अज़ाब रखना

 

ले लेगी  जान मेरी तेरी अदा  कसम से

इस वक्त-ए-वस्ल में भी मुख पे निकाब रखना

 

पीकर जिसे सुखनवर अशआर दिल के कह दे 

ज़ज्बात  के समंदर ऐसी शराब रखना

 

मैं खुश रहूँ वहाँ पर है…

Continue

Added by rajesh kumari on September 24, 2016 at 10:45am — 16 Comments

सलीक़े जीने के

हर क़दम अपना
सलीक़े से उठा
रहा में फूल हैं
कम काँटें
हैं ज़्यादा
कुछ सोच के
मिला है तेरे
शहर का पता
राम हैं कम
यहाँ रावण
है ज़्यादा
किसी से
रही नही रंजिश
रखने की ताक़त
लकीरें हैं कम
ठोकर
हैं ज़्यादा
हंस के गुज़ार
लीजिए दो पल
जीने के
यहाँ उजाले
हैं कम बादल
हैं ज़्यादा
मौलिक अप्रकाशित

Added by S.S Dipu on September 24, 2016 at 1:28am — 5 Comments

ग़ज़ल

उजाड़े हैं हमारे घर, चले शकुनी के पासे हैं . 
तुम्हारे हाथ में हंटर, हुकुम हम तो बजाते  हैं . 
 
हमारी बेटियाँ, बहिनें तुम्हें जायदाद लगती हैं,
हमारा लुट रहा सब कुछ, मगर हम ही लजाते हैं . 
 
इधर जयघोष शंकर का, उधर अल्लाह-ओ-अकबर,
सुना दोनों तरफ दागी, तुम्हारी ही कृपा से  हैं . 
 
अँधेरा हँस रहा रौशन अनाचारी, दुराचारी,
निशा उपभोग करते हैं, दिवस जी भर सताते  हैं…
Continue

Added by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on September 23, 2016 at 11:30pm — 2 Comments

नज़्म : अदाकार (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला')

किसी को हँसाये,किसी  को रुलाये,
कोई परेशां है,कोई हंसे कोई बिलखे,
कोई चुप- तो कोई चीखे,
उम्र के अलग अलग पड़ावों में,
अभिनय मिले नये-नये किरदारों में,
ज़िन्दगी तू मक़बूल अदाकार है,
कि क्या खूब अदायगी है तेरी...
सब कुछ बिल्कुल मौलिक लगे ।
और उस भगवान् का निर्देशन तो देखो !
कि हम जग के लोगों को सांसारिक लगे ।


आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' on September 23, 2016 at 3:00pm — No Comments

शरारत कर वो तेरा मुँह बनाना याद आता है(ग़ज़ल)/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:1222 1222 1222 1222

शरारत कर वो तेरा मुँह बनाना याद आता है

कि पहले रूठना फिर मान जाना याद आता है।



तुम्हारी प्यार की बोली ने मिश्री कान में घोली

कभी झूठे से झगड़े से सताना याद आता है।



बिताया हम कभी करते तुम्हारे साथ जो लमहेे

उन्हीं में गूँजता दिल का तराना याद आता है।



हुआ करते कभी हम भी अगर गमगीन थोड़े से

कि कर नादानियां हमको हँसाना याद आता है।



हमेशा ही हुआ करता हमारे पास आने का

तुम्हारा वो सही बनता बहाना याद आता… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 23, 2016 at 3:00pm — 10 Comments

गीत-सखि! री! मन न धरे अब धीर -रामबली गुप्ता

सखि! री! मन न धरे अब धीर।

विरही मन ले वन-वन डोलूँ, सही न जाये पीर।

सखि! री! मन न धरे अब धीर।



ना चिट्ठी ना पाती आयो, ना कोई संदेश।

जाय बसे कौने सौतन घर, प्रियतम कौने देश।।

राह तकत बीते दिन-रैना छिन-छिन घटत शरीर।

सखि! री! मन न धरे अब धीर।



बीते कितने साल-महीने, बीत गए मधुमास।

कितने सावन-भादो बीते, पर ना छूटी आस।।

अँखियाँ पिय दर्शन की प्यासी, झर-झर बरसत नीर।

सखि! री! मन न धरे अब धीर।



सेज-सिँगार भयो सब सूना, कजरा बहि-बहि… Continue

Added by रामबली गुप्ता on September 23, 2016 at 5:30am — 10 Comments

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