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श्रद्धा और श्राद्ध/सतविन्द्र कुमार राणा

आस्थाओं का ढोल बजा है

श्रद्धा का बाजार सजा है

विश्वासों की लगती बोली

मानवता को मारो गोली।


मैं बिकता हूँ तू बिकता है

अब बिकता ईश्वर दिखता है

मान बड़ों का कब होता है

श्रद्धा का मतलब खोता है।


श्रद्धा आडम्बर  बन जाती

जब दुनिया पाखण्ड दिखाती

जीते जी टुकड़ों को तरसे

फिर भोजन कागों पर बरसे।


श्रद्धा से अपनों को मानों

कीमत जीते जी की जानों

करें गमन दुनिया से जब वे

बोझ नहीं लें दिल पर तब वे।


भूल झूठ को पूरा जाना

सच का ही बस ध्यान लगाना

नहीं कहीं फिर मन विचलाना

यह श्रद्धा है हमने जाना।


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 20, 2016 at 11:55am
आभार आदरणीया कल्पना दीदी।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 6, 2016 at 9:50pm

अच्छी रचना है आदरणीय सतविन्द्र भैया  |

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 27, 2016 at 1:02pm
आभार आदरणीय सुरेश भाई जी!
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 27, 2016 at 9:09am
यथार्थ को दर्शाती सुन्दर एवं सटीक सारगर्भित रचना के लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है आदरणीय सतविंदर भाई जी।सादर ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 26, 2016 at 5:29pm
आदरणीय शिज्जु शकूर जी प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आत्मीय आभार।सादर नमन
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 26, 2016 at 5:28pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी अनुमोदन एवं प्रोत्साहन के लिए तहेदिल शुक्रिया।सादर नमन

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 26, 2016 at 3:46pm

अच्छी रचना हुई है आ. सतविन्दर कुमार जी बहुत बहुत बधाई

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2016 at 3:32pm
बहुत बढ़िया कड़वी सच्चाई व्यक्त करती प्रेरक रचना के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ आदरणीय सतविंदर कुमार राणा जी।

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