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आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'
  • Male
  • Raipur, Chhattisgarh
  • India
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आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s Friends

  • Samar kabeer
  • डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव
  • गिरिराज भंडारी
  • मिथिलेश वामनकर
 

आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s Page

Profile Information

Gender
Male
City State
रायपुर (छ. ग.)
Native Place
रायपुर

आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला''s Blog

ग़ज़ल:हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके । (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' )

212  212  212   22

ज़िन्दगी को मिरे रायगाँ करके,    

चल दिये रंज को मेहमाँ करके,.

बाँह के इस क़फ़स से उड़े, अब क्या?

हसरतें बाँध लें बेडियाँ करके,

बेबसी आदमी की कहाँ ठहरे,

 रास्ते पर रहे आशियाँ करके,

पैर के धूल पर वक़्त मेहरबाँ,

धूल उड़ने लगे आँधियाँ करके,

लज़्ज़तें कुछ नहीं, दर्द ओ आंसू,

ये मिले फासले दरमियाँ करके,

वक़्त यूँ ही गुज़रता रहा…

Continue

Posted on October 2, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

नज़्म : अदाकार (आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला')

किसी को हँसाये,किसी  को रुलाये,
कोई परेशां है,कोई हंसे कोई बिलखे,
कोई चुप- तो कोई चीखे,
उम्र के अलग अलग पड़ावों में,
अभिनय मिले नये-नये किरदारों में,
ज़िन्दगी तू मक़बूल अदाकार है,
कि क्या खूब अदायगी है तेरी...
सब कुछ बिल्कुल मौलिक लगे ।
और उस भगवान् का निर्देशन तो देखो !
कि हम जग के लोगों को सांसारिक लगे ।


आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला'
मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 23, 2016 at 3:00pm

ग़ज़ल: इक नज़र देखा मुझे तो प्यार मुझसे कर गया,

2122. 2122. 2122. 212



इक नज़र देखा मुझे तो प्यार मुझसे कर गया,

देखकर सारे ज़माने की अदावत फिर गया,



टूटते हैं बेसबब जिस भी तरह पत्त्ती यहाँ,

वो नज़र से ख़ुद किसी के बेवजह ही गिर गया,



दर्द लेकर प्यार का ज़ख़्मी बना आशिक़ नया,

बन शराबी लड़खड़ाते उस तरफ़ से घर गया,



जानकर उसकी ख़ताओं की वजह,अहसास से,

आँख भरता हो दुखी का दिल मिरा बस भर गया,



लोग कहते थे उसे है साहसी कितना बड़ा,

प्यार के अंजाम के पहले निडर भी डर गया ।…



Continue

Posted on September 16, 2016 at 11:00pm — 10 Comments

एक नज़्म: सूनापन

सूनापन



एक ख़ला है, ख़ामोशी है,

जिधर देखो उदासी है,

समय सिफ़र हो गया,

आंसू निडर हो गए,

घेरे हैं लोग,पर कोई साथ नहीं,

सर पर किसी का हाथ नहीं,

शाम खाली गिलास सा,

टेबल पर औंधे मुंह पड़ा है,

मन में चिंता दीमक की तरह,

मन को खाये जा रही  है,

दिल की गली ऐसी सूनी है,

मानो दंगे के बाद कर्फ़्यू लगा हो,

शरीर सूखे पेड़ की तरह खड़ा तो है पर,

पीसा के मीनार सा, झुक सा गया है,

कब तक और कहाँ तक

इस सूनेपन, इस अकेलेपन का

बोझ…

Continue

Posted on September 1, 2016 at 6:30pm — 8 Comments

Comment Wall (2 comments)

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At 9:22pm on October 7, 2016, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

मित्र आपका ह्रदय से स्वागत है , सादर  .

At 4:59pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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