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ग़ज़ल - नींद वाली थीं कभी रातें नहीं -- गिरिराज भंडारी

2122 2122 212

आप सीमायें अगर लांघें नहीं

बाड़ हम भी आपकी फांदें नहीं



वो समर के वास्ते तैयार हैं

हाथ मेरे आप यूँ बांधें नहीं



हक़ हलाली की कोई रोटी दिखा

भीख से जी कर तो यूँ नाचें नहीं



शेर बन के सामने आजा कभी

गीदड़ों सी पीठ पर घातें नहीं



चैन खातिर दिन तरसता रह गया

नींद वाली थीं कभी रातें नहीं



दिल पढ़ें , नज़रें पढ़ें , आँसू पढ़ें

अस्लिहा के बाब यूँ बांचें नहीं

अस्लिहा – हथियारों , बाब – अध्याय



आप…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 13, 2015 at 8:30am — 18 Comments

गीत -मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

122122122122

मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

कि बदलाव पल पल यहाँ हो रहा है



नये लोग आये नई बात की है

नये ही विचारों की बरसात की है

बहुत कुछ बदलना,बहुत कुछ है करना

अभी आए हैं बस शुरूआत की है

हम आगे बढ़ेंगे,कदम ना रूकेंगे

सितारों से आगे जहाँ हो रहा है .......



सभी साथ लेकर हम आगे बढ़ेंगे

कि दुर्गम कठिन राह को तोड़ लेंगे

न अब तक हुआ जो वो करके रहेंगे

अगर आप विश्वास हम पर करेंगे

तभी तो हरिक मुश्किलों से लड़ेंगे

नकारात्मक… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on August 12, 2015 at 11:34pm — 8 Comments


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ग़ज़ल -- उछाल के बिजली के तार पर (मिथिलेश वामनकर)

221 2121 1221 212

 

अपनी ख़ुशी उछाल के बिजली के तार पर

रौशन किया है देखिये घर  जोरदार पर

 

आसान लग रहा है अगर तै सफ़र मियां…

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Added by मिथिलेश वामनकर on August 12, 2015 at 11:00pm — 26 Comments

तमीज से गुजर मियाँ - सुलभ

गजल

====

बहर - 212 1212 1212 1212

काफिया - अर, रदीफ - मियाँ

किस्म-किस्म के जहर हैं हमपे बेअसर मियाँ

उम्र बीती आदमी का झेलते जहर मियाँ

दर्द बाँटने अगर तू आया है अवाम का

आसमान से जरा जमीन पर उतर मियाँ

सब तुम्हारे गुम्बदों की शान से सिहर गए

झोपड़ी मेरी तबाह कर गए कहर मियाँ

चाह मंजिलों की थी न जीत की ललक रही

वक्त ही गुजारना था, तय किए सफर मियाँ

अंधड़ों से लड़ता एक दीप मिल ही जाएगा

देख अपने…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 12, 2015 at 6:39pm — 17 Comments

ग्रीटिंग कार्ड (लघु कथा)......

 ग्रीटिंग कार्ड (लघु कथा).......

आज सुशील अपने बेटे के बर्थडे पर बहुत खुश था। कवि होने के नाते उसने अपने पितृभाव को तो कागज़ पर उतार दिया था लेकिन फिर भी सोचा कि इसके साथ अगर एक ग्रीटिंग कार्ड भी दे दिया जाए तो बेटा खुश हो जाएगा। ग्रीटिंग कार्ड की बड़ी सी शॉप में जाकर वो कार्ड देखने लगा। कुछ देर के बाद दुकानदार ने पास आकर कहा '' सर, क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूँ। '' सुशील ने युवा जोड़ों की भीड़ में सकपकाते हुए कहा '' अरे हाँ , देखिये दरअसल मुझे बाप द्वारा बेटे को बर्थडे पर दिए…

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Added by Sushil Sarna on August 12, 2015 at 3:50pm — 22 Comments

तरक्की [ लघु कथा ]

"'अरे छोरा छोरी आ जाओ  देखो कित्ती सारी चीज़ें मिली हैं आज..."कम्मो भिखारन अपनी जर्जर झुग्गी में कदम रखते हुए चिल्लाई

तीनों बच्चों ने उसे घेर लिया.

"सारा दिन बगल में टीवी देखना है बस्स ..माँ भीख मांगती फिरे ...., वो आज झंडे वाला दिन है ना , देखो क्या क्या मिला है ....लड्डू ,पूड़ी नमकीन ....."कम्मो झोले में से खाने के सामान की छोटी छोटी पौलीथीन की थैलियाँ निकालने  लगी .

कचरे से मिले एंड्राइड फोन के कवर पर हाथ फिराता, बारह साल का पप्पू बोला "अम्मा, तू धीरे धीरे ,एक एक करके…

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Added by pratibha pande on August 12, 2015 at 11:30am — 16 Comments

चल उम्मीदें बेच के आएं - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2222    2222    2222    222

*******************************

माना केवल रात ढली है  हमको उनका दीद हुए                  दर्शन

पर लगता है सदियाँ गुजरी अपने घर में ईद हुए /1

*******

हमने तो कोशिश की वो भी हमसे जुड़ते यार मगर

रिश्तों के पुल  बरसों पहले  उनसे  ही तरदीद हुए /2        रद्द करना / तोडना 

*******

भीड़ जुटाई…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2015 at 10:54am — 19 Comments

मोमबत्तियाँ (लघुकथा)

सीले हुए ,पुराने अधखुले तुडेमुडे गत्ते के डिब्बों में बन्द मोमबत्तियाों को दुकानदार ने झींकते हुए बार निकाला और मन ही मन जाने क्या-क्या खुदबखुद बडबडाने लगा । उसे ऐसे परेशान होता देख खुले डब्बे के मुँह से झाँककर एक मोमबत्ती बोली,'बेचारा!' फटाक से दूसरी बोली,'क्यों तुम्हें अपने ऊपर तरस नहीं आता ! कभी सोचा भी है कि कितने साल हो गए हमें इस मौसम में बाहर आते और मौसम खत्म होने पर बिना बिके अन्दर जाते।' नहीं याद वे दिन जब हमारी ज़रूरत बहुत थी, शान बहुत थी। हर दिन हमारा प्रयोग हुआ करता था और हम कभी…

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Added by Mamta on August 12, 2015 at 9:30am — 15 Comments


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हिन्दी गज़ल - अब हृदय में आपका आना मना है ( गिरिराज भंडारी )

2122   2122   2122

आप रो देंगे बहुत संभावना है

अब हृदय में आपका आना मना है

 

अब क्षितिज पर फिर उजाला दिख सकेगा

यों, अँधेरा इस पहर काफी घना है

 …

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Added by गिरिराज भंडारी on August 12, 2015 at 7:53am — 25 Comments


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प्यार की आंच से ये फिर से पिघलते क्यूँ हैं (तरही ग़ज़ल 'राज ')

पुरख़तर इश्क की राहें हैं तो चलते क्यूँ हैं

चोट खाकर ही मुहब्बत में सँभलते क्यूँ हैं

 

प्यारा के दीप इन आँखों में यूँ जलते क्यूँ हैं

चाँदनी रात में अरमान मचलते क्यूँ हैं

 

रात में ख़्वाब इन आँखों पे हुकूमत करते

सुब्ह होते ही ये हालत बदलते क्यूँ हैं

 

बेवफाई से हुए  इश्क में जो दिल पत्थर

प्यार की आंच से ये फिर से पिघलते क्यूँ हैं

 

दूर से खूब लुभाते हैं ये तपते सहरा

तिश्नगी में ये मनाज़िर हमे छलते क्यूँ…

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Added by rajesh kumari on August 11, 2015 at 7:49pm — 17 Comments

ग़ज़ल : जब तलक हो तुम सलामत

2122       2122    2122    212

जब तलक हो तुम सलामत जिंदगी मेरी रहे

जिस खुशी में तुम रहो खुश वो खुशी मेरी रहे

 

फेर ले रुख चॉंद अपना मै अभी मसरूफ हूँ

वस्‍ल की सारी लताफ़त दिलकशी मेरी रहे

 

खूबसूरत रात है ये खूबसूरत चॉंदनी

चॉंद बेशक हो तुम्‍हारा रोशनी मेरी रहे

 

आशिकी भी है कयामत आबशारे इख्तिलाफ़

राहते जां है वही जो नाखुशी मेरी रहे

 

मैं गलत हूँ या सही ये बात सारी दरगुज़र

चाहती है वो मुझे ये…

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Added by Ravi Shukla on August 11, 2015 at 6:00pm — 8 Comments

क़ायदे मे

मालामाल धन् सॆ नही
चरित्र सॆ हॊता है
सन्त हमॆशा अपने
क़ायदे मॆ रहता है
जिस कि अज़ान पर
हक़ हर जाती का हो
मस्जिद मॆ समझो वहीं
सच्चा मुसलमान रहता है
क्या इत्तना भी हमे
तजुरबा नही रहा
कि बिलो मे
सदा साँप रहता है
मन्दिर् बहुत हैं गुरुद्वारे
से आगे थोड़ा जाकर
याद रखना खुदा हमारे
दिलों मॆ रॆहता है
खुद कॊ खुदा बताकर
जो हिम्मत नही हारे
सच कब तक झूठ के
फंदों मे रहता है।
मौलिक व अप्रकाशित"

Added by S.S Dipu on August 11, 2015 at 5:58pm — 3 Comments

उलझन - लघुकथा

"उलझन"

"क्या करने गया था उधर मंदिर की सीढ़ियो पर!"

"अभी साल भर पहले जो हुआ शहर में, याद नही!

"हाजी का बेटा होकर काफिर वाला काम!"

"चंद रोज पहले गुजरे अपने अब्बा के नाम का भी नही सोचा।"

"इस बार तो बीचबचाव हो गया, कोई फसाद हो जाता तो!".........

सभी हमदर्द अपनी अपनी कह चल दिये और वसीम आ खड़ा हुआ अपनी उलझन लिये अब्बु की तस्वीर के सामने।

"कैसे कहूँ अब्बा मैं इन लोगो से कि कल तक मस्जिद की अजान से मोहब्बत करने वाला आज मंदिर से आती आरती की आवाज से भी प्यार करने लगा है।… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on August 11, 2015 at 5:34pm — 6 Comments

लघुकथा - टूटे फ़ूटे लोग –

लघुकथा -  टूटे फ़ूटे  लोग –

"महाराज, यह मेरा त्यागपत्र है, कृपया  स्वीकार कर लीजिये"!

" चित्रगुप्त जी, यह कैसी अनहोनी कर रहे हो!आपके बिना यह कार्य कौन देखेगा!हमारे पास  दूसरा कोई अनुभवी व्यक्ति भी नहीं है"!

"महाराज, अब यह काम करना मेरी सामर्थ्य  का नहीं है"!

"चित्रगुप्त जी,विस्तार से समझाइये ,आखिर मामला क्या है"!

"महाराज,पृथ्वी लोक से, विशेषकर भारतीय उप महाद्वीप से जो मृत लोग आ रहे हैं, उनके शरीर  विकृत अवस्था में आ रहे हैं!कुछ शरीर बिना चेहरे के भी आते हैं…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 11, 2015 at 5:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल- लहरें पतवार के संग किलकती रहीं - सुलभ

बहर - 212 212 212 212

लहरें पतवार के संग किलकती रहीं

मन के पाँवों में पायल सी बजती रहीं

पालकी बैठ सपने गए साथ में

रास्ते भर उमंगें लरजती रहीं

शोखियों की सहेली बनीं चूडि़याँ

लाजवन्ती निगाहें बरजती रहीं

सपनों में रातरानी ने घर कर लिया

कल्पनायें दुल्हन बन के सजती रहीं

देह भर में खिलीं क्यारियाँ-क्यारियाँ

चाहतें ओढ़ घूंघट मचलती रहीं

तितलियों सी निगाहें उड़ीं दूर तक…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 11, 2015 at 3:00pm — 10 Comments

भेड़िया, गिद्ध और कुत्ता

भेड़िए जैसे झपटते बच्चे

गिद्ध जैसे ताकते हुए

कुत्तों  की मानिंद

खाना छीनते हुए बच्चे

एक कूड़े के ढेर पर

मैंने देखे थे वो

भेड़िये ,गिद्ध और

कुत्ते जैसे बच्चे

इंसान का शेर या हाथी

जैसा होना सुहाता है

किन्तु भूख जब उसे भेड़िया,

गिद्ध या कुत्ता बना देती है

  और जब शिकार बचपन हो

तो आँखें शर्म से झुक जाती हैं

तब इस असमान बंटवारे पर

लज्जा आती है ,घृणा होती है

किसी ने तो खाना

बस फैंक…

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Added by Tanuja Upreti on August 11, 2015 at 12:07pm — 11 Comments

गजल(मनन)

बंदगी एक स्वतंत्र देश की

2212 2212

अपना गगन अपना चमन!

अपनी धरा अपना वतन!

रातें गयीं तम भी गया,

ऐसा लगा बदला चलन।

खुली हवा साँसें गहन,

होगा नया सब कुछ वहन।

आसां नहीं आशा रही,

खींचे गये खाँचे गगन।

धूमों पटा तेरा गगन,

तू तो रहा अपने मगन।

रेखा लगा धरती गगन,

उसने तलाशा निज गगन।

तेरा गगन तू दूर अब,

तेरी धरा कितना क्षरण!

जीवन लिया तेरी दया,

बाँटे उसीने तो मरण।

खोजा कभी दंभी कहाँ?

कर दो उसे झंडा… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 11, 2015 at 9:30am — 4 Comments

ग़ज़ल :- मैं शर्मिंदा नहीं अपने किये पर

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन



भले लिख दो,मिरा ग़म हाशिये पर

मैं शर्मिंदा नहीं अपने किये पर



अँधेरा इस क़दर फैला हुवा था

नज़र सबकी थी छोटे से दिये पर



मिरा कुछ बोझ हल्का हो गया है

मिरे बच्चों ने भी अब ले लिये पर



तुम्हारे हुस्न पर मिसरा लिखा था

कई शर्तें लगी थीं क़ाफ़िये पर



मिरी ग़ज़लो प सर धुंते हैं अपना

ये देंगे दाद मेरे मर्सिये पर



सभी शाइर समझ बैठे हैं उसको

किसी को शक नहीं बहरूपिये पर



"समर",ये लफ़्ज़ बे… Continue

Added by Samar kabeer on August 10, 2015 at 11:15pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- ‘चलो अपनी सुनाते हैं’ (मिथिलेश वामनकर)

1222—1222—1222—1222

 

घरौंदें, आस में अक्सर यही जुमलें सुनाते हैं 

‘परिन्दें, शाम होती है तो घर को लौट आते हैं’

 

वों तपते जेठ सा तन्हां हमेशा छोड़ जाते…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on August 10, 2015 at 9:00pm — 28 Comments

फँसाने आँखो के

फँसाने आँखो के
सूखे पड़े हए है
वक़्त के आगे
बेबस खड़े हुए है
यारों तुम भी हँस लो वरना
उन जैसे हो जाओगे
गाते हुए चेहरे जो
ख़ामोश पड़े हुए है
देर रात की सड़कों पर
धूमें तो मालूम हुआ
कुछ लोग पत्थरों पर
बिन चादर सोये हुए है
मालूम है हमें भी
हक़ीक़त उन चेहरों की
मुस्कुराकर हाथ मिलाने का
जो बोझ लिए हुए है
मौलिक व अप्रकाशित"

Added by S.S Dipu on August 10, 2015 at 8:47pm — 6 Comments

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