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मील के पत्थर ....

मील के पत्थर....

पत्थर पर तो हर मौसम

बेअसर हुआ करता है

दर्द होता है उसको

जिसका सफ़र हुआ करता है

सिर्फ दूरियां ही बताता है

निर्मोही मील का पत्थर

इस बेमुरव्वत पे कहाँ

अश्कों का असर हुआ करता है

हर मोड़ पे मुहब्बत को

मंजिल करीब लगती है

हर मील के पत्थर पे

इक फरेब हुआ करता है

कहकहे लगता है

दिल-ऐ-नादाँ की नादानी पर

हर अधूरे अरमान की

ये तकदीर हुआ करता है

कितनी सिसकियों से

ये रूबरू होता है मगर

पत्थर तो पत्थर है…

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Added by Sushil Sarna on August 10, 2015 at 8:26pm — 12 Comments

ग़ज़ल : घर चलो अब वक्‍त है आराम का

रंग गहरा हो गया है शाम का ।

घर चलो अब वक्‍त है आराम का ।।

आज उनको याद मेरी आ गई ।

कल तलक मैं था नहीं कुछ काम का ।।

घर चलो दहलीज़ होगी मुन्तजि़र ।

फि़क्र में गुज़रे न वक्फा़ शाम का ।।

खो न जाना इन नज़ारों में कहीं ।              

ये फुसूं है चर्खे  नीली फ़ाम का ।।

जब पड़ा था काम उनको याद था ।

अब पडा़ हूं जब नहीं  कुछ काम का ।।

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Ravi Shukla on August 10, 2015 at 6:00pm — 9 Comments

ख्वाब

ख्वाब!

क्या है ये?

एक पल में राजा बना देता है

और दूसरे ही पल ..............

ज्योतिषियों के लिए तो दूर दृष्टी है

और अनाडि़यों के लिए...

फ्री का सनिमा

मेहनतकश के लिए उसकी मंजिल

हमारे और आपके लिए ..........

कभी खुद भी सोच लिया करो!

ख्वाब के रंग कई रुपो में बिखरे हैं

बच्चे, बूढे, जवान

सभी अलग-अलग रुपो में

इसका दीदार करते हैं

कोई परियों के साथ खेलता है तो

किसी को अपना भविष्य नजर आता है

और किसी को उसके परिश्रम का परिणाम

ख्वाब की…

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Added by Pawan Kumar on August 10, 2015 at 5:13pm — 6 Comments

ग़ज़ल: जब-जब किसी परिंदे ने पंख फड़फड़ाए - सुलभ

बहर - 22 12122 22 12122 

जब-जब किसी परिंदे ने पंख फड़फड़ाए

वो बदहवास होकर ख़ंजर निकाल लाए

दुनियाँ की चाल चलनी जिस रोज़ से शुरू की

अपनी निगाह से हम गिर के फिर उठ न पाये

वो जानते हैं उनका भगवान जानता है

कानून से भले ही सब जुर्म बख्शवाये

रोज़े खतम न हों तो, क्या चाँद का निकलना

हम ईद मान लेंगे जब चाँद मुस्कुराये

मंजि़ल थी क़ामयाबी, ऊँचा महल अटारी

ईमान बेच आये, ईंटें ख़रीद लाये

हर फूल के…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 10, 2015 at 3:18pm — 12 Comments

उसके आगे::गज़ल

क्या काफिया,रदीफ़ क्या,अशआर उसके आगे,

क्या शेर,क्या मक्ता,गज़ल बेकार उसके आगे l

क्या आसमान,जुगनू,क्या चांद,क्या सितारे,

मुमकिन भला है किसका दीदार उसके आगे l



क्या गुल,कि क्या गुलिस्तां,कि क्या भला शबनम,

पतझड़ लगी है मुझको बहार उसके आगे l



ये तो अच्छा है कि वो पर्दे में रहती है,

वरना चांद भी हो जाये शर्मशार उसके आगे l



जब भीनिगाहें शोख ले गुजरी वो गलियों से,

सारा मुहल्ला पड़ गया बीमार उसके आगे l



हम भी इसी हालात के…

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Added by Er Anand Sagar Pandey on August 10, 2015 at 11:00am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पुण्य-लाभ (लघुकथा) - मिथिलेश वामनकर

दोनों लगभग एक ही साथ चित्रगुप्त के समक्ष पहुंचे क्योकिं आश्रम में हृदयघात से जब बाबा दुनिया से सिधारे तो  अगाध श्रद्धा रखने वाले भूपेश भाई ने भी सदमे में तत्काल प्राण त्याग दिए.

चित्रगुप्त ने बाबा को स्वर्ग में भेज दिया और भूपेश भाई को नर्क जाने का आदेश दिया.

सुनकर भूपेश भाई सन्न रह गए, लेकिन बाबा के आश्वासन की याद आते ही खुद को सँभालते हुए बोले-

“मुझे नरक क्यों भगवन?”

“क्योकि तुमने कोई पुण्य कार्य नहीं किया वत्स!”

“नहीं भगवन!....जीवन भर आश्रम में दान किया,…

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Added by मिथिलेश वामनकर on August 10, 2015 at 9:00am — 10 Comments

तेरी बातें (कविता)____मनोज कुमार अहसास

पढ़ा है दर्द की आँखों में तराना तेरा

तुझको मालूम हो शायद मेरा बेरंग सफ़र

मैंने हर लम्हा तेरी याद को पेशानी दी

तुझपे कुर्बान रही मेरी अकीदत की नज़र





मैं सुलगता हूँ तेरा साथ निभाने के लिए

हलाकि कुछ भी नही बाकि है जलने को इधर

ख़त्म हो चुकी इक रस्म की सांसो के लिए

ज़बी हर लम्हा ढूंढती है तेरी रहगुजर





तुझको पा लेना किसी हाल में मुमकिन ही न था

तुझको खोने की तमन्नाये उठी पर कैसे

जब थे मजबूर किसी बात की परवाह न थी

आज इन जमते हुए… Continue

Added by मनोज अहसास on August 9, 2015 at 10:39pm — 12 Comments

ग़ज़ल :यूँ ख़फ़ा भी कहाँ थे /श्री सुनील

2122 1212 22

यूँ ख़फ़ा भी कहाँ थे तब हम पर
तुम बहुत जाँ फ़िशाँ थे तब हम पर

उन दिनों खेलते थे तारों से
तुम हुए आस्मां थे तब हम पर

मन मुताबिक़ जहाँ में जी लेंगे
त़ारी कितने गुमां थे तब हम पर.

याद आई गली वो रूस्वाई
चीखते सब दहां थे तब हम पर.

हम तरद्दुद न इश्क़ के मानें
वो जुनूं हाँ जी हाँ थे तब हम पर.

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on August 9, 2015 at 5:46pm — 10 Comments

ट्रॉफी [लघु कथा]

"बधाई कर्नल कपूर i बेटे ने नाम रौशन कर दिया " कमांडेंट साहब ने गर्म जोशी से कर्नल से हाथ मिलाते  हुए कहा

 

"थैंक्यू सर "

 

आकाश देख रहा था अपने पिता को जो गर्व से फूले फिर रहे थे अपने ऑफिसर्स दोस्तों के बीच और सबकी बधाइयाँ ले रहे थे

 

उसके  काव्य संकलन को राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिला था ,हफ्ते भर से टीवी ,अखबारों में उसी के चर्चे थे

 

वो सोचने लगा .. ,' उसके जैसा  नाकारा बेटा जो आर्मी में नहीं गया ,  जिसने हिंदी साहित्य विषय चुना  और…

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Added by pratibha pande on August 9, 2015 at 1:30pm — 10 Comments

गजल(मनन)

गजल
2122 2122 2122
तू कहीं जा ओ यहाँअब खैर ही कब?
तोड़कर दिल वो कहेंगे गैर ही कब?
है बसी बस्ती यहाँ उन बागवां की,
लूटते जो दिल कहें की सैर ही कब?
बैठ तेरे पहलू' मन की बात करते,
नोच बखिया खूब बोले गैर ही कब?
आ कहेंगे हम रहे कबसे रे बुलाते,
रे निभायी है वफ़ा बस बैर ही कब?
है नदी साग़र नहीं जल तो बहुत है,
तिर किनारे तू लगे अब खैर ही कब?
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन
साग़र=प्याला
'=मात्रा-पतन
बागवाँ=बागवाले

Added by Manan Kumar singh on August 9, 2015 at 12:03pm — 7 Comments

एक गजल - सुलभ अग्निहोत्री

बहर - 212 212 212 212

काफिया - अनी, रदीफ - डाल दी

धुंध यादों पे भरसक घनी डाल दी

बन्द कमरे में वो अलगनी डाल दी 

चिथड़ा-चिथड़ा चटाई बिछी देख कर

उसने खा के तरस चांदनी डाल दी

नाम अनचाहे पर्याय भय का बना

हादसों ने अजब रोशनी डाल दी

उम्र के मशवरे चल पड़े स्वप्न भी

ला के आंखों में हीरक कनी डाल दी

वक्त का जायका था कसैला बड़ा

जिक्र भर ने तेरे चाशनी डाल दी

श्याम का नाम तूने लिया क्या…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 9, 2015 at 11:30am — 8 Comments

लघुकथा- रहस्य

लघुकथा- रहस्य   

“ इसी व्यक्ति के साथ बापू गया था . यह कह रहा था कि हम खूब पैसे कमाएंगे . बापू ने भी कहा था कि समुद्र से खूब मछलियाँ पकडूँगा . फिर ढेर सारा पैसा ले कर आऊंगा.” कहते हुए मोहन ने फोटो इंस्पेक्टर को दिया, “ साहब ! मैं वापस समुद्र के किनारे गुब्बारे बेचने जा रहा हूँ. शायद बापू या ये व्यक्ति मिल जाए.” कहते हुए मोहन  जाने लगा तो इंस्पेक्टर ने कहा, “ बेटा ! इसे देख ले. ये कौन है ?”

क्षतविक्षत फोटो में अपने बापू की कमीज पहचान कर मोहन के चीख निकल गई, “ ये तो मेरा बापू है…

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Added by Omprakash Kshatriya on August 9, 2015 at 8:00am — 6 Comments

राहत इन्दौरी साहब की ज़मीन पर एक ग़ज़ल -- दिनेश

2122-1122-1122-22



जिनको परखो, वो दग़ाबाज़ निकलते क्यूँ हैं

वक़्त पड़ने पे सभी लोग बदलते क्यूँ हैं



आज देखा जो उन्हें, हमको समझ में आया

देख कर उनको सितारे भी फिसलते क्यूँ हैं



कारवाँ दिल का लुटा था कभी जिन पर चलकर

जिस्मो-जाँ मेरे उन्हीं राहों पे चलते क्यूँ हैं



दरमियाँ अपने मरासिम जो थे सब टूट चुके

फिर मेरे ख़्वाब तेरी आँखों में पलते क्यूँ हैं



जब सियासत के हर इक रंग से हैं हम वाकिफ

रोज़ सरकारों के जुमलों से बहलते क्यूँ… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 9, 2015 at 6:30am — 18 Comments

गजल (मनन)

गजल

122 122 122

उजाले डराने लगे हैं,

अँधेरे बुलाने लगे हैं।

विभा दीपकों से मिली थी,

जलाते ! बुझाने लगे हैं।

किताबें रखी थीं यहीं तो,

न माने,जलाने लगे हैं।

हुनर की कहूँ क्या?न पूछो,

मरे,कुछ ठिकाने लगे हैं।

नहीं है पता खुद,वहीअब

मुझे कुछ बताने लगे हैं।

न देखूँ, रिसाने लगे वे,

दिखें तो लजाने लगे हैं।

करूँ क्या कभी तो नजर है,

कभी वे बचाने लगे हैं।

भुलाता,न भूले कभी वे,

मुआ याद आने लगे हैं।

रही थीं धुनें चुप… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 8, 2015 at 6:00pm — 3 Comments

पूछताछ /लघुकथा /कान्ता राॅय

" हो तेरी ...भीड़ ! क्या हो रहा है वहाँ बाहर ? लगता है रामचंद्र के छोरे को पुलिस पुछताछ में लगाई हुई है । जरूर कोई कांड करके आया है ये । "



"क्या कह रहे हो रनिया के बापू ... देखूं तो ..! दिन भर छोरे की तारीफ़ करती उसकी महतारी अघाती नहीं थी । जाकर अब जरा मुफ्त में अपना कलेजा ठंडा कर आती हूँ । "



"ठहरो , मै भी चलता हूँ । "



"क्या कांड किया हो दरोगा जी , इस लफंगे ने ?" - मुँछों पर ताव देकर ही मजा लिया जा सकता है... सो लगे रहे चुटकियों से मुँछे उमेठने में… Continue

Added by kanta roy on August 8, 2015 at 6:00pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सावन का 'कजरी' लोकगीत

 रिमझिम सावन की फुहार आज मेरा भैय्या आएगा

आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा

अम्बर पे बादल छाये

सखियों ने झूले पाए

भाभी ने गायी कजरी

बाबा जी घेवर लाए

कर लूँ अब मैं तनिक सिंगार आज मेरा भैया आएगा

आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा

दीवार पे कागा बोले

यादों की खिड़की खोले

अम्मा ने संदेसा भेजा

सुनसुन मेरा मन डोले

मायके से आया तार आज मोरा भैया आएगा

आया तीजो का त्यौहार…

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Added by rajesh kumari on August 8, 2015 at 11:52am — 6 Comments

वो माँ विहीना / लघुकथा / कान्ता राॅय

बचपन में ही माँ का स्वर्गवास हो जाना और पिता का दुसरी शादी ना करने का निर्णय उस नन्हीं सी जान का अपने मामा के यहाँ पालन - पोषण का कारण बनी ।



मामी के सीने पर मूंग दलने के समान होने के बावजूद वो पल - पल बढती हुई ,उससे पिंड छुडाने के आस अब जाकर पूरी हो चुकी थी ।



शहर में पिता के पास पहुँचा दी गई ।

पिता को क्या मालूम बेटियाँ कैसे पाली जाती है !

लेकिन बेटी को मालूम था कि बेटियाँ माँ ,बहन और बेटी कैसे बनती है इसलिए दिन सुहाने से हो चले थे पिता और पुत्री दोनों के… Continue

Added by kanta roy on August 8, 2015 at 11:30am — 13 Comments

थपथपाये हैं हवा ने द्वार मेरे

मित्रों के अवलोकनार्थ एवं अभिमत के लिए प्रस्तुत एक ताज़ा नवगीत

"मौलिक व अप्रकाशित"  -जगदीश पंकज

थपथपाये हैं हवा ने द्वार मेरे

क्या किसी बदलाव के

संकेत हैं ये

फुसफुसाहट,

खिड़कियों के कान में भी

क्या कोई षड़यंत्र

पलता जा रहा है

या हमारी

शुद्ध निजता के हनन को

फिर नियोजित तंत्र

ढलता जा रहा है

मैं चकित गुमसुम गगन की बेबसी से

क्या किसी ठहराव के …

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Added by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on August 7, 2015 at 5:30pm — 9 Comments

गुनगुनाते हुए ज़िन्दगी की ग़ज़ल

२१२  २१२   २१२   २१२

गुनगुनाते हुए ज़िन्दगी की  ग़ज़ल

मैं चला जा रहा राह अपनी बदल

हुस्न को देख दिल जो गया था मचल

आज उसको भी देखा है मैंने अटल

वो  घने गेसू गुल से हसीं लव कहाँ

है मुकद्दर खिजाँ तो खिजाँ से बहल

उनके कूचे में मेरा जनाजा खड़ा

सोचता अब भी शायद वो जाए पिघल

शक्ल में गुल की ये मेरे अरमान हैं

नाजनी इस तरह तू न गुल को मसल

चैन मुझको मिला कब्र में लेटकर

शोरगुल भी नहीं न…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on August 7, 2015 at 2:52pm — 13 Comments

तनाव (लघुकथा)

“रंजना ! ये मोबाइल छोड़ दे. चार रोटी बना. मुझे विद्यालयों में निरिक्षण पर जाना है. देर हो रही है.”

रंजना पहले तो ‘हुहाँ’ करती रही. फिर माँ पर चिल्ला पड़ी, “ मैं नहीं बनाऊँगी. मुझे आज प्रोजेक्ट बनाना है. उसी के लिए दोस्तों से चैट कर रही हूँ. ताकि मेरा काम हो जाए और मैं जल्दी कालेज जा सकू.”

तभी पापा बीच में आ गए, “ तुम बाद में लड़ना. पहले मुझे खाना दे दो.”

“क्यों ? आप का कहाँ जाना है ? कम से कम आप ही दो रोटी बना दो ?” माँ ने किचन में प्रवेश किया.

“हूँउ  ! तुझे क्या…

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Added by Omprakash Kshatriya on August 7, 2015 at 7:30am — 14 Comments

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