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गजल
2122 2122 2122
तू कहीं जा ओ यहाँअब खैर ही कब?
तोड़कर दिल वो कहेंगे गैर ही कब?
है बसी बस्ती यहाँ उन बागवां की,
लूटते जो दिल कहें की सैर ही कब?
बैठ तेरे पहलू' मन की बात करते,
नोच बखिया खूब बोले गैर ही कब?
आ कहेंगे हम रहे कबसे रे बुलाते,
रे निभायी है वफ़ा बस बैर ही कब?
है नदी साग़र नहीं जल तो बहुत है,
तिर किनारे तू लगे अब खैर ही कब?
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन
साग़र=प्याला
'=मात्रा-पतन
बागवाँ=बागवाले

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2015 at 10:21pm
अभी लैपटॉप ठीक नहीं है,मोबाईल में ही कम करना पड़ता है।अतः मित्रों मई रचनाओं पर विशेष टिप्पणी नहीं हो पा रही है जिसके लिए खेद जाहिर करता हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2015 at 10:18pm
आदरणीय आशुतोष जी प्रेरणा देने की लिए वंदन
Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2015 at 10:17pm
आदरणीय गिरिराज भाई सादर धन्यवाद आपको
Comment by Manan Kumar singh on August 11, 2015 at 10:16pm
आदरणीय समर भाई का बहुत आभार
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 11, 2015 at 5:43pm

आदरणीय मनन जी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2015 at 10:20am

आदरणीय मनन भाई , गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Samar kabeer on August 10, 2015 at 11:32pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

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