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बंदगी एक स्वतंत्र देश की
2212 2212
अपना गगन अपना चमन!
अपनी धरा अपना वतन!
रातें गयीं तम भी गया,
ऐसा लगा बदला चलन।
खुली हवा साँसें गहन,
होगा नया सब कुछ वहन।
आसां नहीं आशा रही,
खींचे गये खाँचे गगन।
धूमों पटा तेरा गगन,
तू तो रहा अपने मगन।
रेखा लगा धरती गगन,
उसने तलाशा निज गगन।
तेरा गगन तू दूर अब,
तेरी धरा कितना क्षरण!
जीवन लिया तेरी दया,
बाँटे उसीने तो मरण।
खोजा कभी दंभी कहाँ?
कर दो उसे झंडा दफ़न।
सेते नहीं उनको कभी,
जो बाँटते चलते कफ़न।
बस थी यही अपनी कहन,
अपने तिरंगे को नमन!
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on August 12, 2015 at 10:47pm
आदरणीय मिथिलेश जी,लक्ष्मण जी तथा आनंद जी,आभार आपका
Comment by Er Anand Sagar Pandey on August 12, 2015 at 12:32pm
बेहद ही सुन्दर रचना आदरणीय मनन जी l
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 12, 2015 at 11:51am

आ0 मनन भाई इस सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 12, 2015 at 11:43am

बढ़िया प्रस्तुति हुई है...हार्दिक बधाई आदरणीय मनन जी 

कृपया ध्यान दे...

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