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दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ

2212       1221      2212     12



दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ,

इस ज़िन्दगी में तुझसे यही सिलसिला करूँ |



दिन भर शराब पी के हुआ,था मैं दरबदर,

अब ढूंढता हूँ चादर ग़मों की सिला करूँ |



नफरत थी जिन दिलों में, भुलाया नहीं मुझे,

दिल में बता खुदा, उनके, कैसे खिला करूँ |



अमन-ओ-अमां के साये ही जिनसे नसीब हो,

ऐसे चमन  जमी दर ज़मीं  काफिला करूँ |



तन्हा है सब सफ़र और तनहा हैं रास्ते,

अब सोचता हूँ तुझसे यहाँ ही मिला…

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Added by Harash Mahajan on August 6, 2015 at 6:03pm — 13 Comments

पास क्या दूर भी नहीं कोई (इमरान खान)

आज किस तरह ज़िन्दगी खोई,

पास क्या दूर भी नहीं कोई.

एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,

रूह जिसको लिपट-लिपट रोई.

रात भर बेकली रही मुझ पर,

और दुनिया सुकून से सोई.

फूल आंगन में अब न तुम ढूंढो,

फस्ल काँटों भरी अगर बोई.

वक़्त अपना कुछ इस तरह बीता,

हमनशीं हो गई गज़लगोई.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by इमरान खान on August 6, 2015 at 4:30pm — 7 Comments

कर सत्य को अंगीकार...

कर सत्य को अंगीकार  ....

आवरण से श्रृंगार किया

माया से किया प्यार

अन्तकाल संसार ने

सब कुछ लिया उतार

अद्भुत प्रकृति है जीव की

ये भटके बारम्बार

लौ लगाये न ईश से

पगला बिलखे सौ सौ बार

शीश झुकाये मन्दिर में

हो जैसे कोई मज़बूरी

अगरबत्ती भी यूँ जलाए

जैसे ईश पे करे उपकार

कपट कुण्ड में स्नान करे

और विकृत रखे विचार

कैसे मिलेगा जीव तुझे

उस पालनहार का प्यार

सत्य धर्म है,सत्य कर्म है

सत्य जीवन आधार

ईश स्वयं…

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Added by Sushil Sarna on August 6, 2015 at 1:13pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
असाधारण- लघुकथा (मिथिलेश वामनकर)

“आप सरकारी नौकरी के साथ समाज सेवा कैसे कर लेते है?”

“जब नौकरी से फ्री होता हूँ तो खाली समय का उपयोग कर लेता हूँ.”

 “आपको झुग्गी-बस्ती में शिक्षा के प्रसार की प्रेरणा कहाँ से मिली?”

“हा हा हा... प्रेरणा व्रेरणा कुछ नहीं भाई.... स्लम एरिया के पास वाले सिग्नल पर बच्चों को सामान बेचते और भीख मांगते देखा, तो स्लम में चला गया... लोगों से बात की तो लगा कुछ करना होगा और असली काम तो वालेंटियर ही कर रहे है.”

“आपको सब पर्यावरण-मित्र कहते है क्योकिं आप इतने बड़े ओहदे पर है फिर…

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Added by मिथिलेश वामनकर on August 6, 2015 at 12:00pm — 22 Comments

एक ग़ज़ल -- सुलभ अग्निहोत्री

बहर - 2212 1212   22 1212

वो भ्रम तुम्हारे प्यार सा बेहद हसीन था

सपनों के आसमान की मानो जमीन था

सारी थकान खींच ली गोदी में लेटकर

बच्चा वो गीत रूह का ताजातरीन था

हर खत में अपनी खैरियत, उसको दुआ लिखी

माँ यह कभी न लिख सकी, कुछ भी सही न था

मन, प्राण, आँख द्वार पर, बेकल बिछे रहे

कुनबा तमाम जुड़ गया, आया वही न था

अँजुरी मेरी बँधी रही और सारा रिस गया

वो प्यार रेत से कहीं ज्यादा महीन…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 6, 2015 at 10:00am — 20 Comments

ठठरी पर ईमानदारी /लघुकथा /कान्ता राॅय

ईमानदारी जरा चोटिल ही हुई थी कि मौके का फायदा उठा कुछ लोगों ने उसे निष्प्राण घोषित कर तुरत - फुरत में ठठरी पर कसने लगे । उन्हे डर था उसके वापस जिंदा हो गतिमान होने का ।

जिन चार कंधों पर उसकी अर्थीं उठाई जा रही थी उनमें सबसे आगे देश के कर्णधार थे उसके पीछे भ्रष्टाचार , देश के सफलतम व्यवसाई और शेयर दलाल थे ।

सबकी आँखें चमक रही थी । सबके मन में लड्डू फूट रहे थे कि पीछे रोती हुई जनता अचानक खुशी के मारे तालियाँ बजाने लगीं ।

तालियों की शोर पर काँधे देने वालों ने चौंक कर देखा तो…

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Added by kanta roy on August 6, 2015 at 9:00am — 25 Comments

तरही ग़ज़ल

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन



सब छोड़ छाड़ हम्द-ओ-सना में लगा रहा

आफ़त पड़ी जो सर प दुआ में लगा रहा



अब उससे नेकियों की तवक़्क़ो फ़ुज़ूल है

जो सारी उम्र जुर्म-ओ-सज़ा में लगा रहा



सीने में अपने झाँक के देखा नहीं कभी

हर सम्त वो तलाश-ए-ख़ुदा में लगा रहा



हिम्मत थी जिसमें ,छीन लिया बढ़ के अपना हक़

मजबूर था जो आह-ओ--बुका में लगा रहा



अच्छाई उसको छू के भी गुज़री नहीं कभी

उसका दिमाग़ सिर्फ़ ख़ता में लगा रहा



मैंने तो जान बूझ के धोया…

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Added by Samar kabeer on August 5, 2015 at 11:30pm — 19 Comments

अँधेरे का राही (लघुकथा)

पहले तो रविन्द्र  ने चाहा,कि न कर दूँ ,क्यूंकि दस बज चुके थे,  और सर्दी भी बढ़ रही थी, पर एक साथ पाँच सवारियां देख कर उस ने फेरा लगाने का मन बना लिया । सुबह से कोई अच्छा फेरा भी तो नहीं लगा था । वह सवारियों को थ्रिविलर में बिठा बस स्टैंड से शहर के सुनसान एरिया की तरफ निकल पड़ा जो कभी रौनक  भरा होता था, पर जब का हस्पताल को  यहाँ से कहीं और शिफ्ट किया तब  ज्यादातर दुकानदारों ने  दुकानों को पक्के तौर पर ताले लगा दिए,और बाकी अब तक बंद हो चुकी थी ।  

हिचकोले खाता थ्रिविलर चारों तरफ फैली…

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Added by मोहन बेगोवाल on August 5, 2015 at 9:30pm — 4 Comments

इस तरह भी नही

अपनो के चहरे न
रूला पाये अपनो को
ग़ैरों के झूठे बोल
तुम्हें शहद से लगे
हमने सच का तुम्हें
आईना जो थमाया
तुम तो बग़ावत के
पलटवार कर चले
चलिये झूठ तो मौत के
साये मे जी रहा है
गर फिर जन्म लेगा
तो इस तरह भी नहीं
मौलिक व अप्रकाशित"

Added by S.S Dipu on August 5, 2015 at 7:04pm — 2 Comments

कायर ( कहानी )

कायर ( कहानी )

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रक्त दान -महा दान

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बढ़ते वजन से परेशान हैं, कैंसर के मरीज को देख -सुन कर भय होता है कि कहीं ये रोग आप को भी न लग जाए. हृदय रोग और हृदय आघात की संभावना कभी भी।

आप इन जोखिमों को कम कर सकते हैं यदि आप १८ से ६५ वर्ष की आयु के स्वस्थ वयस्क हैं। बस आपको करना है नियमित रक्त दान.

४५ कि.ग्राम से अधिक वजन वाले लोग तीन माह के अंतराल पर रक्त दान कर सकते हैं।

स्वेक्षिक रक्त दान से प्राप्त रक्त ही सबसे ज्यादा सुरक्षित रक्त होता है।…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 5, 2015 at 4:54pm — 4 Comments

चढ़ावा - लघुकथा.....

चढ़ावा - लघुकथा

''दादू .... !''

''हूँ .... !''

''हम मंदिर में पैसे क्यों चढ़ाते हैं … ?''

''बेटे , हर आदमी को अपनी नेक कमाई से कुछ न कुछ अपनी श्रद्धानुसार प्रभु के चरणों में अर्पण करना चाहिए। ''

''लेकिन दादू , आप तो कहते हैं कि हमारे पास जो भी है तो प्रभु का दिया है … . । ''

''हाँ तो … । ''

''तो जब सब कुछ प्रभु ही देते हैं तो हम फिर उन्हें पैसे क्यों चढ़ाते हैं ?''

दादू निरुत्तर हो पोते का मुख देखने लगे।

सुशील सरना

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on August 5, 2015 at 3:54pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - बहुत की कोशिशें मैने गमों के पार जाने की ( गिरिराज भंडारी )

1222       1222      1222       1222

*******************************************

बहुत की कोशिशें मैने गमों के पार जाने  की

मुझे फिर घेर लेतीं हैं वही खुशियाँ जमाने की

 

अगर सच है, तो वो सच है ,कभी कह भी दिया कोई

जरूरत क्या पड़ी थी आपको यूँ तिलमिलाने की

 

यक़ीं हो तो यक़ीं रखना नहीं तो बेयक़ीनी रख

तेरी आदत गलत लगती है मुझको, आजमाने की

 

अँधेरा इस क़दर हावी न हो पाता किसी आंगन

रही होती अगर चाहत दिये हर घर जलाने…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 5, 2015 at 2:16pm — 23 Comments

बदरिया कहाँ गई // कान्ता राॅय

सावन की बुनझीसी सखी है तन में लगाए आग .......बदरिया कहाँ गई



गोर बदन कारी रे चुनरिया ,सर से सरकी आज ......बदरिया कहाँ गई



सावन भादों रात अंहारी थर - थर काँपय शरीर ...... बदरिया कहाँ गई



दादूर मोर पपीहा बोले कहाँ गये  रघुनाथ.....बदरिया कहाँ गई



अमुआँ की डारी झूले नर- नारी मैं दहक अंगार ....बदरिया कहाँ गई



उमड़ उमड़े नदी जल पोखर तन में रह गई प्यास...... बदरिया कहाँ गई



सब सखी पहिरय हरीयर चुड़ी मोरा कंगना उदास ......…

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Added by kanta roy on August 5, 2015 at 2:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

कभी कोई मु‍फलिस कहां बोलता है ।

जो बोले तो फिर आसमां बोलता है ।।

ज़माना नहीं, पासबां बोलता है ।

हुआ कौन उसका, मकां बोलता है ।।

अभी लोग  उठकर रवाना हुए हैं ।

ये चूल्‍हों से उठता धुआं बोलता है ।।

 

अगर आंच गैरत पे आये तो बोले ।

वगरना कहां बेजुबां बोलता है ।।

 

दिलासा नहीं काम दे दो मुझे तुम ।

यही बात बोले जहां बोलता है ।।

जमीं उसकी दहकान से…

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Added by Ravi Shukla on August 5, 2015 at 1:30pm — 14 Comments

रंगीन छाता (लघुकथा)

"बेटा आज  तेरा जन्म दिन है ..मंदिर में पूजा करनी है , बाहर बूंदाबांदी है ..गाड़ी में मंदिर ले चलेगा ?" उसने कमरे के बाहर  से ही पूछा

"माँ i  जनम दिन भागा नहीं जा रहा है कहीं .. सोने दो , आज सन्डे है ...और आप भी ये खाली पेट  पूजा का नाटक छोड़ दो "

पीछे से बहू के भुनभुनाने की आवाज़ भी उसने साफ़ सुन ली थी

वो चुपचाप बाहर आ गई ,गाल में ढुलक आये आंसूओं को  उसने जल्दी से पोंछा और छाता ढूँढने  लगी

"चलो दादी मै चलता हूँ ,छाता भी है मेरे पास " अपना रंग बिरंगा बच्चों वाला छाता…

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Added by pratibha pande on August 5, 2015 at 12:30pm — 15 Comments

एक ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सच कहने की हलफ़ उठाई

अपनों से दुश्मनी निभाई

जिसके हाथ तुला दी उसने

पल्ले में पासंग लटकाई

दीपक तले अंधेरा देखा

देखी रिश्तों की गहराई

हम भी बर्फ़-बर्फ़ हैं केवल

जब से पाई है ऊँचाई

शेर कटघरे के अन्दर हो

कुछ ऐसे ही है सच्चाई

अपने ही दुखड़ों में खोये

कैसे पढ़ते पीर पराई

फूट पड़ा आवेग पिघलकर

जब सावन की पाती आई

जिसने कपड़े आप उतारे

उसको कैसी जगत…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 5, 2015 at 11:35am — 18 Comments

कैसे कैसे बिकता है आदमी -- डॉo विजय शंकर

आदमी की कीमत समझता है आदमी

किस किस भाव देखिये बिकता है आदमी ॥



जमीर कीमती है जानता है आदमी

तभी उसका बड़ा खरीदार है आदमी ॥



जब चाहे जहां चाहे खरीद ले कोई

हर जगह हर वक़्त खूब बिकता है आदमी ॥



रिश्ते - दोस्ती में सब देखता है आदमी

बिकते समय कुछ नहीं देखता है आदमी ॥



खरीदार होना चाहिए देशी हो विदेशी

जानवर से भी सस्ते में बिकता है आदमी ॥



गुलामी कुप्रथा थी इक जो खत्म हो गयी

अब तो खुद बिकने को आज़ाद है आदमी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 5, 2015 at 10:30am — 16 Comments

इच्छा (लघुकथा)

लघुकथा – इच्छा  

“ आज ऐसा माल मिलना चाहिए जिसे मेरे अलावा कोई और छू न सके,” कहते हुए ठाकुर साहब ने नोटों की गड्डी अपनी रखैल बुलबुल के पास रख दी और वहां से उठा कर हवेली के अपने कमरे में चल दिए.

“ जी सरकार ! इंतजाम हो जाएगा, ” कहते ही बुलबुल को याद आया कि सुबह ठकुराइन ने कहा था, ‘ बुलबुल बहन ! ठाकुर साहब तो आजकल मेरी और देखते ही नहीं. मैं क्या करूं ? ताकि उन को पा सकूं ? ’

यह याद आते ही उस की आँखों में चमक आ गई. उस ने नोटों से भरा बेग उठाया. फिर गुमनाम राह पर जाते-जाते…

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Added by Omprakash Kshatriya on August 5, 2015 at 9:00am — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बदला (लघुकथा) - मिथिलेश वामनकर

उसने कामवाली को जरा-सा जोर से क्या डांट दिया, पति और बेटे दोनों ने ये कहकर अयोग्य घोषित कर दिया कि उसकी नाहक ही परेशान होने उम्र नहीं है। परिवार के दबाव में स्टोर की चाबी बहू को सौपते हुए उसे लगा था जैसे उसके किचन नाम के किले पर किसी ने सेंधमारी कर ली हो।  वह सोच में डूबी थी कि अचानक बहू के चिल्लाने की आवाज सुनकर बोली-

 “अरे बहू सुबह सुबह क्यों डांट रही है बच्चे को, अब एक दिन स्कूल नहीं जाएगा तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।” दादी की शह पाकर बच्चा दादी के साथ ही लग लिया। पूरा दिन दादी के…

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Added by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 2:30am — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- कुरआन पढ़कर आरती करता रहा - (मिथिलेश वामनकर)

2122--2122--2122--212

इस मकां को बामो-दर से एक घर करती रही

माँ मुसलसल काम अपना उम्र भर करती रही

 

धूप बारिश सर्दियों को मुख़्तसर करती रही

बीज की कुछ कोशिशें मिलकर शज़र करती रही…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 1:00am — 16 Comments

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