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Mamta
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Profile Information

Gender
Female
City State
Bangalore
Native Place
Meerut
Profession
lecturer

Comment Wall (10 comments)

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At 11:20am on August 23, 2017, Mamta said…
सभी को नमन! आदरणीय संचालक महोदय मैं बालसाहित्य समूह की सदस्यता चाहती हूँ कृपया मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिए । धन्यवाद
सादर ममता
At 8:06am on February 2, 2016, Mamta said…
आदरणीय सभी, आप सबके लघुकथा रंग पर सुझावों व मार्गदर्शन हेतु ह्रदय से आभार ।
सादर ममता
At 11:21am on August 12, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
आदरणीया ममता जी रचना का प्रकाशन ओबीओ के नियमानुसार प्रधान संपादक महोदय द्वारा किया जाता है. उनके अनुमोदन /अप्रूवल के बाद ही रचना प्रकाशित होती है। सादर।
At 10:36am on August 12, 2015, Mamta said…
आदरणीय मिथिलेश जी नमस्कार! एकप्रश्न मन में है कि कोई भी रचना अगर छपी नहीं है तो इसका प्रमुख कारण क्या हो सकता है ? और
अगर उसमें संशोधन किया जाए तो क्या पुनः प्रेषित की जा सकती है? कृपया शंका निवारण कीजिए।
सादर ममता
At 9:16am on August 11, 2015, Mamta said…
आदरणीय मिथिलेश जी,सौरभ जी,आदरणीया प्राची जी,कान्ता राय जी,नीरज शर्मा जी आप सभी का ह्रदय तल से आभार !
मुझे बहुत कुछ सीखना है आप सभी से।सो कृपा बनाए रखें इस अभिलाषा के साथ पुनः धन्यवाद!
सादर ममता
At 3:45pm on July 23, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

स्वागत है.

At 8:34pm on July 22, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीया ममता जी, रचना आपके पेज पर पोस्ट हो गई है. रचनाएँ ब्लोग्स के माध्यम से पोस्ट की जानी है, रचना भेजने के लिए लिंक
http://www.openbooksonline.com/profiles/blog/new

आप अपनी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ इस लिंक के माध्यम से पोस्ट कर सकती है. इस लिंक से रचना के विषय, रचना और टैग के बॉक्स आयेंगे. टैग बॉक्स में रचना की विधा यथा लघुकथा, गीत, ग़ज़ल, कविता आदि लिखने है सादर

At 6:52pm on July 22, 2015, Mamta said…
धन्यवाद! वामनकर जी। अभी तक मालूम नहीं था कि रचनाएँ कैसे भेजूँ अभी ही पता चला है सो एक लघुकथा प्रेषित कर दी है मार्ग दर्शन कीजिए।
सादर ममता
At 6:42pm on July 22, 2015, Mamta said…
बोध
फैंसी ड्रैस का आयोजन था।वृद्धाश्रम के सभी वृद्ध तरह - तरह की वेशभूषा में सजे थे। कोई किसान,कोई सब्जी बेचने वाला,कोई पुजारी ,कोई माली तो कोई संत। उन्हीं में से एक वृद्धा ने कटोरा हाथ में लिया व अपनी वेशभूषा के अनुरूप वह भीख माँगने लगी।
फैंसी ड्रेस का माहौल ही बदल गया। सबके हाथ पीछे हट गए,आँखे पनीली हो गईं,ह्रदय करूण भाव से भर गया ।सभी के मन के एक कोने में एक बोध , एक पछतावा, एक पश्चाताप सा जाग गया।सब यही सोच रहे थे ओह! ये हमने क्या कर दिया।सबकी संवेदना ने विचारों पर ताला लगा दिया ये दृश्य सबकी बर्दाश्त के बाहर था । सब ये भूल गए कि वे फैंसी ड्रेस के आयोजन में बैठे हैं।अचानक से जज बनी यौवना उठी व वृद्धा के हाथ से कटोरा छीन कर केवल यही बोल पाई मुझे माफ कर दीजिए,मुझे माफ कर दीजिए! और अपनी सास के पाँवों में गिर कर वह बोली माताजी अब मैं आपको यहाँ नहीँ रहने दूँगी।

सादर ममता
At 12:29am on July 13, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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लघुकथा "मजबूरियाँ"

म्याऊँ -म्याऊँ बहुत देर से एक करुण पुकार कानों में सुन कर अम्माँ खीज कर बोलीं ,अरी गिन्नी ,"ज़रा बाहर जाकर देखियो ये कौन सी चुड़ैल बिल्ली चिल्ला रही है ? मरी को डंडा मार के भगा दे ....। "अरे अम्माँ जी ये तो वही है जिसने कल ही छत पर पाँच सुंदर से बच्चे दिए हैं बिचारी भूखी है शायद ...",गिन्नी लगभग चीख़ती सी बोली । बिल्ली की प्रसवपीडा के बाद की स्थिति को सोच वह विह्वल हो उठी थी । अंदर आ अम्माँ से फिर बोली ,"अम्माँ इसे कुछ खाने को दे दूँ ,ज़रा पेट तो देखो काली नदी के किनारों की तरह सिमट कर मिल रहा… Continue

Posted on August 19, 2017 at 1:08pm — 7 Comments

तलवार (लघुकथा)

जैसे ही कई वर्ष पुरानी तलवार को उस वीर ने म्यान से बाहर खींचा तैसे ही उस जंग लगी तलवार के सोये अरमान फिर से जाग उठेऔर उसने चाहा कि उसे फिर एक बार पहले सा सम्मान,प्रेम प्राप्त हो जो पहले उसे राजा के हाथ में आने के बाद मिलता था। उसे याद हो आये वो दिन जब युद्ध में सिपाहियों को पाट पाट कर वो अचानक ही अपने राजा की प्रधान प्रेयसी बन जाती थी। उसके मुख पर एक कुटिल मुस्कुराहट छाई व मन में एक आकांक्षा जागी वही युद्ध, वही सम्मान! काश ! वीर ने उसे बुझे मन से देखा व सान धरने वाले के पास ले गया। उसने…

Continue

Posted on January 8, 2016 at 10:30am — 11 Comments

गीत

नये साल की भोली शिशु सम ,

मधुर निराली भोर

प्यारी व चित चोर।



सुबह सवेरे पंछी जगते,

अलसाई गति से पग धरते

नापें गगन का छोर।

मधुर निराली भोर,

प्यारी व चित चोर।



अँखियाँ काजल वारी कारी

बरसावें मधु कभी दें गारी,

चमकें नई नकोर।

मधुर निराली भोर,

प्यारी व चित चोर।



मनहर दिन मदमाती रातें

मधुकर की मनमोहक बातें,

कलियाँ हुईं विभोर

मधुर निराली भोर,

प्यारी व चित चोर।



ओस लपेटे भीगी गात लिए,

सतर… Continue

Posted on January 1, 2016 at 4:01pm — 8 Comments

कविता "परेशानी"

सोच रही हूँ आज कौन सा गीत लिखूँ जी

आडी -तिरछी रेखाओं में भाव भरूँ जी।



मन उड़ भागा लेकर भाव के सारे पन्ने।

दिक करते हैं बोल पडौस में गव रहे बन्ने।



कभी किसी कोयलिया ने कुहु टेर लगाई ।

खुशबू पहले बौर की मुझ तक दौड़ी आई।



डाल पे झूले बैठीं सखियाँ झूल रही हैं।

मन की चिड़िया शब्द भी सारे भूल रही है।



काला कौवा बैठ मुंडेरी चीख रहा है।

आता दूर पथिक भी कोई दीख रहा है।



रात चाँदनी साज लिए लो बैंठ गई है ।

नई बहुरिया सास से…

Continue

Posted on August 19, 2015 at 3:30pm — 5 Comments

 
 
 

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