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कविता "परेशानी"

सोच रही हूँ आज कौन सा गीत लिखूँ जी
आडी -तिरछी रेखाओं में भाव भरूँ जी।

मन उड़ भागा लेकर भाव के सारे पन्ने।
दिक करते हैं बोल पडौस में गव रहे बन्ने।

कभी किसी कोयलिया ने कुहु टेर लगाई ।
खुशबू पहले बौर की मुझ तक दौड़ी आई।

डाल पे झूले बैठीं सखियाँ झूल रही हैं।
मन की चिड़िया शब्द भी सारे भूल रही है।

काला कौवा बैठ मुंडेरी चीख रहा है।
आता दूर पथिक भी कोई दीख रहा है।

रात चाँदनी साज लिए लो बैंठ गई है ।
नई बहुरिया सास से फिर कुछ ऐंठ गयी है।

अब बारह के टन -टन घण्टे बाज रहे हैं।
छुक-छुक करती रेल के पहिये भाग रहे हैं।

पर सारा मंजर मुझसे बस ये ही कहता है ,

कहो वही जो आज तुम्हारा मन कहता है ।
ममता
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Mamta on August 24, 2015 at 10:13am
आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, हर्ष जी आपके आशीर्वचन प्रेरणादायक हैं।
बहुत -बहुत आभार।
सादर ममता
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 22, 2015 at 4:29pm

प्रकृति का उद्दीपन मनोहारी है .

Comment by Harash Mahajan on August 22, 2015 at 11:35am
आ0 ममता जी आपकी पेशकश बहुत ही अच्छी रही ।
"डाल पे झूले बैठी ......सारे भूल रही है ।"....अति सूंदर !!
Comment by Mamta on August 21, 2015 at 10:45am
ह्रदय तल से आपका आभार! आदरणीया प्रतिभा जी।
सादर ममता
Comment by pratibha pande on August 20, 2015 at 6:14pm

बिल्कुल ,कहो वही जो तुम्हारा मन कहता है और मन बहुत बढ़िया कहता है .बधाई आपको ममता जी इस रचना के लिए  

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