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ग़ज़ल - गज़ब का छा रहा हूँ मैं (मिथिलेश वामनकर)

1222---1222---1222---1222

 

ग़ज़ल से पा रहा हूँ मैं, ग़ज़ल ही गा रहा हूँ मैं

ग़ज़ल के सर नहीं बैठा, ग़ज़ल के पा रहा हूँ मैं

 

किसी की नीमकश आँखों का तारा हूँ जमानों…

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Added by मिथिलेश वामनकर on March 16, 2015 at 11:00pm — 35 Comments

जिंदगी को सौ बार जिया होता --डॉo विजय शंकर

इक बार जिंदगी में प्यार किया होता

खोने का मजा भी आ गया होता ,

जिंदगी भर जोड़ते रहे योगी बन के

कुछ बाँट दिया होता कुछ भोग लिया होता ,

रिश्तों को , दोस्तों को , तराजू पे तौलते रहे

कभी तो तराजू को आराम दिया होता ,

दुनिया कुछ नहीं , इक खूबसूरत नज़ारा है

जी भर के इसको , देख लिया होता ,

कुछ कह लिया होता ,कुछ सुन लिया होता

कुछ खो दिया होता ,कुछ पा लिया होता ,

कुछ भी तो साथ यहां से जाता नहीं

जो कुछ था यहीं , भुना लिया होता ,

जिंदगी को नसीहतें… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on March 16, 2015 at 9:10pm — 28 Comments

रात की रानी : नवगीत : हरि प्रकाश दुबे

रात की रानी अस्पताल में,

तुम फिर से मुस्कराया करो !!

 

बिस्तर पर लेटी राज दुलारी ,

पर उसको चोट लगी है भारी ,

लौटा दो फिर से उसकी हँसी,

उसे धीरे से गुदगुदाया करो !

रात की रानी अस्पताल में,

तुम फिर से मुस्कराया करो !!

 

तरह - तरह के मर्ज पड़े है,

जाने कितने दुःख-दर्द पड़ें हैं,

पीड़ा कम हो जाए उनकी,

ऐसा मरहम लगाया करो !

रात की रानी अस्पताल में,

तुम फिर से मुस्कराया करो !!

 

कुछ…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 8:33pm — 28 Comments

ग़ज़ल ------------------गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२ २१२२  २१२

दर ब दर भटके बिचारी ज़िन्दगी
मौत से भी देखो हारी ज़िन्दगी

आसुओं में रही यूँ वो तर ब तर
इसलिए तो लगती खरी ज़िन्दगी

मांगती ही रहती है साँसे सदा
हर बशर की है भिखारी ज़िन्दगी

ख़त्म गर्भों में हुई जो धडकनें
अब कहाँ है वो कुंवारी ज़िन्दगी

बोझ ढोता  ही रहा परिवार का
एक बच्चे ने भली  सँवारी ज़िन्दगी

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on March 16, 2015 at 8:00pm — 14 Comments

जीवन - एक गीतिका

पद भार : २४ मात्रा 

जीवन की सरिता नीर बहाने लगती है

मुझसे जब मेरे तीर छुड़ाने लगती है

 

बोझ उठा कर इन जखमों का जब थक जाती

सागर की लहर मुझे समझाने लगती है

 

छिप जाती हूँ मैं जब दुनिया से कोने में  

वो मुझ को सहेली बन सताने लगती है

 

आंसू मेरे जब छिपने लगते आँखों में

वो मुझ पर जीभर प्यार लुटाने लगती है

 

भागती हूँ जीवन से मैं तोड़कर सब कुछ

अपने अधिकार मुझ पर जताने लगती…

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Added by Nidhi Agrawal on March 16, 2015 at 7:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल : सदा पर्वत से ऊँचा हौसला रखना

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२

 

पड़े चंदन के तरु पर घोसला रखना

तो जड़ के पास भूरा नेवला रखना

 

न जिससे प्रेम हो तुमको, सदा उससे

जरा सा ही सही पर फासला रखना

 

बचा लाया वतन को रंगभेदों से

ख़ुदा अपना हमेशा साँवला रखना

 

नचाना विश्व हो गर ताल पर इनकी

विचारों को हमेशा खोखला रखना

 

अगर पर्वत पे चढ़ना चाहते हो तुम

सदा पर्वत से ऊँचा हौसला रखना

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 16, 2015 at 5:25pm — 20 Comments

क्षणिकाएँ

प्रणाम      

 

देश के वीरों को प्रणाम

उन शहीदों को सलाम

हमारे कल के लिए नव कोपलों का बलिदान

माताओं ने किये बेटे कुर्बान

बहिनों ने दिया सुहाग का दान

सदियों सदा याद रखेगा हिंदुस्तान

 

संतान

 

देश के लिए जान दे

देश भक्ति का ज्ञान दे

राष्ट्र भाषा को मान दे

माँ ऐसे संतान दे.

 

आंसू

 

आंसुओं को यों ही पीते रहे

होंठों…

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Added by Shyam Mathpal on March 16, 2015 at 4:00pm — 18 Comments

मन भावन पैगाम (दोहे )

मन भावन पैगाम सब ,रक्खे बड़े सम्हाल 

आते जब भी सामने,कहते सारा हाल ॥

स्नेह पगे जो शब्द हैं,करते अब मनुहार 

इक-इक पाती प्रेम की,कहती बात हजार ॥

आखर में जब तुम दिखो,भर आती है लाज 

आवेदन ये प्रेम का ,भर जाते  है आज ॥

बिना कहे सब बोलती,हृदय की ये बात

आमंत्रण देती रहीं ,सपनों की बारात ॥

पाती में मिलते रहे ,सूखे सुमन गुलाब

मन मंदिर ले बाचती, खुशबू भरी…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 16, 2015 at 12:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल

रचना पूर्व प्रकाशित होने के कारण ओ बी ओ नियमों के आलोक में प्रबंधन स्तर से हटा दी गयी है.

एडमिन 

२०१५०३१९०७ 

 

Added by Naveen Mani Tripathi on March 16, 2015 at 11:30am — 13 Comments

तुमने किया छल! -कृष्णा मिश्रा

तुमने किया छल

भावविभोर विह्वल

जल-थल मन

मन जल-थल !

हर प्रतिमा में ढूंढूँ

बिम्ब तुम्हारे..

अनंतपथ में ढूंढूँ

पदचिन्ह तुम्हारे..

अहा! रहते

तुम सम्मुख सदा..

करते अभिनय नयनों में...

नयनों से ओझल!

तुमने किया छल....

सांझ-सकारे जोहूँ

मै बाट तुम्हारा..

पर सामर्थ्य कहाँ

हृदय में,प्राण में?

भर सकूँ ओज तुम्हारा..

नित्य नए पात्र का

करता मै…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 16, 2015 at 10:35am — 18 Comments

पल पल ........'इंतज़ार'

पल पल मुझ से रूठा है

हर पल यूँ तो झूठा है

सच और झूठ का ताना बाना

जीवन का रूप अनूठा है

इक पल में वो अपने दीखे

दो पल में कई सपने दीखे

कुछ पल में सब बिखर गये

यूँ साथ हमारा छूटा है

क्या पल पल मुझसे रूठा है

या जग सारा ये झूठा है !

मैं दीया हूँ तू बाती है

दुनिया क्यूँ तुझे जलाती है

मुझ पे भी कालिख आती है

प्यार के झोंके जब

आग बुझाने आते हैं

बेदर्द नहीं सह पाते हैं 

हाथ बढ़ा ढक लेते हैं

आग को और भड़काते…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 16, 2015 at 4:30am — 11 Comments

आसमां को भी कभी सर पर उठाकर देखिये : ग़ज़ल : हरि प्रकाश दुबे

2122--2122--2122--212

इक यही सूरत बची है आज़्मा कर देखिये

दोस्ती अब दुश्मनों से भी निभाकर कर देखिये

 

आँख से रंगीन चश्में को हटाकर देखिये

जिंदगी के रंग थोड़ा पास आकर देखिये

 

रोज खुश रहने में दिल को लुत्फ़ मिलता है मगर

जायका बदले ज़रा सा ग़म भी खाकर देखिये

 

कल बड़ी मासूमियत से आईने ने ये  कहा

हो सके तो आज मुझको मुस्कराकर देखिये

 

छोड़ कर इन ख़ामोशियों को चार दिन तन्हाँ कहीं

आसमां को भी कभी सर…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 3:30am — 16 Comments

एक ग़ज़ल,,,

दिलॊं कॆ हौसले देखें घटाओं से ज़रा कह दॊ ।।

जलाये हैं चरागों को हवाओं से ज़रा कह दॊ ।।  (1)

तुम्हॆं मॆरी इबादत की कसम है ऐ मिरे क़ातिल,

अभी टूटा नहीं हूं मैं ज़फ़ाओं से ज़रा कह दॊ।। (2)

घनी ज़ुल्फ़ॆं मुझॆ बांधॆं इरादा तॊड़ दॆं मॆरा,

नहीं पालॆं भरम क़ातिल अदाऒं सॆ ज़रा कह दॊ !! (3)



मिलूँगा मैं गरीबों की दुआ में रोज तुमको अब,

बुला लेंगी मुझे अपनीं वफाओं से ज़रा कह दॊ ।। (4)



शहर सारे हुये पत्थर दिलों में रंज है…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 16, 2015 at 12:30am — 7 Comments

गजल ...सोया जिन्न

  222    222    2

बातो  के लच्छे लाये

यारो दिन अच्छे लाये

 

भारत को फिर से तुमने

दिन में नक्षत्र दिखाये  

 

संसार पसारे  आँचल

तुमने बहु नाच नचाये

 

पहले नजरे की ऊंची

अब फिरते आँख चुराये 

 

हम अपना दर्द सुनाते

तुम अपनी जाते गाये

 

दूरागत ढोल सुहाने

जब जाना तब पछताये

 

थे रंक, बनाया राजा

तुम हम पर ही गुर्राये

 

ईश्वर देखेगा तुमको

हम नत…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 15, 2015 at 9:00pm — 12 Comments

माना होता खुदा को एक हमने

2222 1222 1222

लोगों को लूटने का फ़लसफ़ा होता ||

तो अपने नाम पर बाबा लगा होता ||

तूं तूं - मैं मैं न होती इस कदर हम में ,

तेरा मेरा अगर इक रास्ता होता ||

माना होता खुदा को एक हमने तो ,

फिर घर न कोई किसी का जला होता ||

उनको आया नज़र फर्के- लिबासां ही ,

काश !ये इक रंग का खूं भी दिखा होता ||

फिर मैं भी मानता परवाह है उसको ,

ग़र आंसू पोंछ बांहो में कसा होता ||

समझौता कर लिया हालात से…

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Added by Nazeel on March 15, 2015 at 8:00pm — 11 Comments

एक गीत- निर्मल नदीम

मेरे घर का सूना आँगन सूना - सूना ही रह जाता

अगर तुम्हारे पग पायल की मधुर मधुर झंकार न होती।



तुमने पाँव रखा जैसे ही

मुर्दे दिल में जान आ गयी;

ज़र्द फूल के रुखसारों पर

लाली बनकर ख़ुशी छा गयी,

यह चांदनी जलन बन जाती, ठण्डी छाँव चुभन बन जाती,

अगर न तुम जुल्फ़ें लहराती, शीतल पड़ी फुहार न होती।



जलने लगे स्वतः दीपक सब

लगा महकने कोना - कोना,

कंकड़ - पत्थर, हीरे - मोती,

लगे मृत्तिका सच्चा सोना,

मुक्त गगन के चाँद सितारे, उतर गए आँगन में… Continue

Added by Nirmal Nadeem on March 15, 2015 at 6:18pm — 16 Comments

ग़ज़ल -- आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई ....

212-212-212-212



आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई

ज़िन्दगी में मेरी कुछ कमी रह गई



ज़ख़्म नासूर मेरे सभी बन गए

दिल में अब आँसुओं की नदी रह गई



ज़ेहन के आईनों पर था पर्दा पड़ा

मुझ से कमज़ोरी मेरी छुपी रह गई



आस्तीनों में ख़ंजर छुपाए हुए

दोस्ती तो फ़क़त नाम की रह गई



बागबाँ ही चमन का है दुश्मन बना

सहमी सहमी यहाँ हर कली रह गई



अब न चिड़ियों का घर में बसेरा रहा

चहचहाहट की पीछे सदी रह गई



अब के बेमौसमी जो हुईं… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 3:59pm — 12 Comments

ग़ज़ल -- मैंने ग़ज़लों में उतारी ज़िन्दगी...

2122-2122-212



'इम्तिहानों में गुज़ारी ज़िन्दगी'

इस तरह हमने सँवारी ज़िन्दगी



सर्दियों की धूप थी पहले मगर

फ़स्ल-ए-बाराँ अब हमारी ज़िन्दगी



बाज के पंजों ने मसला देर तक

एक चिड़िया आज हारी ज़िन्दगी



मैकदे की राह दिखलाई इसे

बाम-ए-ग़म से यूँ उतारी ज़िन्दगी



सर पे चढ़ कर बोलता इसका नशा

सबको अपनी जाँ से प्यारी ज़िन्दगी



जो बनाते दूसरों का आशियाँ

वो रहें सड़कों पे सारी ज़िन्दगी



इसके मजमे की कोई सीमा… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 1:19pm — 10 Comments

रुख़सती पे उनकी...............

रुख़सती पे उनकी आँखों में नमी अच्छी लगी

ज्यूं दूर बादलों को धरा की गमी अच्छी लगी

तबस्सुम देख के मचली लबों पे एक दूसरे के

पाक इरादों में छिपी उनकी कमी अच्छी लगी

असीम…

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Added by anand murthy on March 15, 2015 at 11:30am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
"कहूँ कुछ और कुछ निकले जुबां से “ एक तरही ग़ज़ल ( गिरिराज भंडारी )

१२२२        १२२२      १२२ 

शिकायत हो न जाये आसमाँ से

अँधेरा अब उठा ले इस जहाँ से   

 

अगर चुप आग है, तो कह धुआँ तू  

शनासाई ये कैसी इस मकां से 

 

तेरे कूचे के पत्थर से हसद है

शिकायत क्यूँ रहे तब कहकशाँ से

 

सुकूने ज़िन्दगी अब चाहता हूँ  

बहुत उकता गया हूँ इम्तिहाँ से

 

कभी थे फूल से रिश्ते मगर अब   

तगाफ़ुल से हुये हैं वे गिराँ से

 

परिंदों के परों ने की बग़ावत

सवाल अब पूछ्ना…

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Added by गिरिराज भंडारी on March 15, 2015 at 10:00am — 25 Comments

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