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ग़ज़ल - गज़ब का छा रहा हूँ मैं (मिथिलेश वामनकर)

1222---1222---1222---1222

 

ग़ज़ल से पा रहा हूँ मैं, ग़ज़ल ही गा रहा हूँ मैं

ग़ज़ल के सर नहीं बैठा, ग़ज़ल के पा रहा हूँ मैं

 

किसी की नीमकश आँखों का तारा हूँ जमानों से

नयन से गीत सा उतरा, गुहर बन गा रहा हूँ मैं

 

यकीं नासेह पर मत कर, भरोसे का नहीं रहबर

मगर कब मानता है दिल, कसम फिर खा रहा हूँ मैं

 

तुम्हारी आरज़ू हूँ मैं, तमन्ना तुम मेरे दिल की

दुआ बन के रही हो तुम, अकीदत सा रहा हूँ मैं

 

जिधर दुनिया हकीक़त की, रवानी है तबीयत की 

पकड़ कर हाथ जीवन का, उधर ही जा रहा हूँ मैं

 

सितारों से भरी इक रात में जो ख्वाब देखा है

फ़क़त उस ख्वाब में तुम हो नुमायाँ या रहा हूँ मैं

 

भुलावा जिंदगी को दे रहा हूँ बस यही कहकर

ज़रा सा जिंदगी ठहरों कि खुशियाँ ला रहा हूँ मैं

 

खयालों ने पसारे पाँव क्यूं औकात से ज्यादा

धुआँ बन के नजारों पर गज़ब का छा रहा हूँ मैं

 

सभी ने लाख समझाया, मुहब्बत रोग है दिल का

निहायत नातवाँ दिल पर, कहर खुद ढा रहा हूँ मैं

 

मुक़र्रर मत कहो गज़लें, उठी बेज़ार दिल से जो

ग़मों को अलविदा मेरा, जहां से जा रहा हूँ मैं

 

अरुज़ी भी नहीं कोई, न शायर हूँ कलामों का

ग़ज़ल आवाज़ देती है, तो कहता- “आ रहा हूँ मैं”

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 18, 2015 at 7:26pm
आदरणीय सोमेश भाई जी आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार। ये सब मंच से ही पाया है। सादर।
Comment by somesh kumar on March 18, 2015 at 11:39am

अरुज़ी भी नहीं कोई, न शायर हूँ कलामों का

ग़ज़ल आवाज़ देती है, तो कहता- “आ रहा हूँ मैं”

ये तो आप का बड़प्प्न है कि मंच पर एक से एक उम्दा रचना देने के बाद भी आप इतनी विनम्रता से स्वयं को सामान्य कहते हैं |सुंदर प्रस्तुति पर बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 18, 2015 at 11:13am
आदरणीय शिज्जु भाई जी हार्दिक आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 18, 2015 at 9:46am

बहुत बढ़िया वाह आदरणीय मिथिलेश जी बहुत बहुत बधाई हो इस गज़ल के लिये


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 18, 2015 at 4:19am

आदरणीय गिरिराज सर के मार्गदर्शनानुसार संशोधन सहित ग़ज़ल...

 तुम्हारी  आरजू हूँ मैं , तमन्ना तुम मेरे दिल की

 दुआ बन के रही हो तुम , अक़ीदत सा रहा हूँ मैं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 18, 2015 at 1:11am
आदरणीय सूबे सिंह सुजान जी सराहना हेतु हार्दिक आभार।
Comment by सूबे सिंह सुजान on March 17, 2015 at 11:43pm
वाह वाकई सुंदर कहा है

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 17, 2015 at 10:58am
आदरणीय गिरिराज सर ग़ज़ल पर आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया पाकर धन्य हुआ। आपके मार्गदर्शन अनुसार संशोधन करता हूँ। हार्दिक आभार। नमन।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 17, 2015 at 10:55am
आदरणीय मोहन सेठी जी हार्दिक आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 17, 2015 at 10:54am
आदरणीय उमेश जी हार्दिक आभार।

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