For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

'ताड़ना के कारी-अधिकारी' (लघुकथा)

'परखना, पहचानना, ताड़ना या प्रतारणा या उद्धार करना' ... इन विभिन्न अर्थों में संत तुलसीदास जी की चौपाई ”ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।“ में आये 'ताड़न' शब्द पर इंटरनेट-ज्ञान बघारते हुए कुछ पुरुषों में चर्चा क्या हुई, कि उनके बीच नई सदी के रंग-ढंग पर उस पंक्ति पर तुकबंदी और पैरोडी सी शुरू हो गई! .. फिर मज़ाक ने बहस का रूप ले लिया।



"भई अब तो महिला-पुरुष समानता और महिला सशक्तिकरण की बातें हो रही हैं अपने वतन में भी! योजनाएं और क़ानून बन रहे हैं लड़कियों और…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 26, 2018 at 2:59am — 4 Comments

लहरें ( कविता)

आज लहरों ने की बातें मुझसे 

बोलीं 

तुम सोचती हो तुम हो बहादुर 

समय से तुम लडती हो 

मूर्ख हो तुम 

जो यह सोचकर दम भरती हो| 

और वह इठला कर चली गयी 

दूर 

वहीं जहाँ से वह आयीं थी 

किनारे तक 

और वहाँ पड़े चट्टानों से 

टकरा-टकरा कर रही थी 

बातें उनसे, 

कह रहे थे चट्टान उनसे 

रुक जाओ 

करीब आप मेरे ऊपर से 

न यूँ बह जाओ 

रुको कुछ घड़ी 

की हम तपते हैं 

और…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 26, 2018 at 12:00am — 9 Comments

ग़ज़ल



1222 1222 1222 1222



महल टूटा जो ख्वाबों का तो फिर बिखरा नज़र आया ।

गुलिस्ताँ जिसको समझा था वही सहरा नजर आया ।।1

बहुत सहमा है तब से मुल्क फिर खामोश है मंजर।

उतरते ही मुखौटा जब तेरा चेहरा नजर आया ।।2

अजब क़ानून है इनका मिली है छूट रहजन को ।

मगर ईमानदारों पर बड़ा पहरा नज़र आया ।।3

सियासत छीन लेती होनहारों के निवालों को ।

हमारा दर्द कब उनको यहाँ गहरा नजर आया ।।4

वो भूँखा चीखता हक माँगता मरता रहा लेकिन…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 25, 2018 at 10:01pm — 13 Comments

ग़ज़ल...ले ली मेरी जान सलीके से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वो बैठा दिल में आन सलीके से

फिर ले ली मेरी जान सलीके से

यूँ ही पहले थोड़ी सी बात हुई

बन बैठे फिर अरमान सलीके से

पल भर को पहलू में आओ चन्दा

इतना तो कर अहसान सलीके से

काफी है पलकों का उठना गिरना

तू नैन कटारी तान सलीके से

दिल की दुनिया लूट गईं दो आँखें

फिर होती हैं हैरान सलीके से

कोने की उस जर्जर अलमारी में

रख छोड़े कुछ अरमान सलीके से

जिनको थी लाज बचानी कलियों की

बन…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 25, 2018 at 5:00pm — 18 Comments

परख - लघुकथा -

परख - लघुकथा -

नीना जैसे ही चाय की ट्रे लेकर,  उसे देखने आये  लड़के वालों के परिवार की एक मात्र महिला को चाय देने बढ़ी, उस महिला को देख कर नीना के होश उड़ गये। उसे लगा वह अभी चक्कर खा कर गिर जायेगी। अब उसे निश्चित लग रहा था कि यह रिश्ता भी नहीं होने वाला। माँ बापू को आज फिर तगड़ा झटका लगेगा।

हालांकि नीना एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर थी। बस खूबसूरती में औसत थी। रंग भी थोड़ा दबा हुआ था। अतः रिश्ते होते होते रह जाते थे।

नीना के सामने कालेज की वह घटना चल चित्र की तरह घूम गयी। जब वह…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on October 25, 2018 at 3:20pm — 12 Comments

धरती का बोझ- लघुकथा

शोक सभा चालू थी, हर आदमी आता और मरे हुए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात शुरू करता और फिर प्रशासन को कोसते हुए अपनी बात ख़त्म करता. बीच बीच में लोग उस एक व्यक्ति की भी तारीफ़ जरूर करते जिसने कई लोगों को बचाया था लेकिन अपनी जान से भी हाथ धो बैठा था.

उधर कही आसमान में रूहें एक जगह बैठी हुई जमीन पर चलने वाले इस कार्यक्रम को देख रही थीं. उनमें अधिकांश तो उस एक रूह से बहुत खुश थीं जिसने उनके कुछ अपनों को बचा दिया था लेकिन एक रूह बहुत बेचैन थी. उसे यह बात जरा भी हजम नहीं हो…

Continue

Added by विनय कुमार on October 25, 2018 at 11:34am — 12 Comments

इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२

सुनते हैं खूब न्याय  की  सच्चाइयाँ जलीं

कैसा अजब हुआ है कि अच्छाइयाँ जलीं।१।



वर्षों पुरानी बात है जिस्मों का जलना तो

इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं।२।



कितने हसीन ख्वाब  हुये खाक उसमें ही

ज्वाला में जब दहेज की शहनाइयाँ जलीं।३।



सब कुछ यहाँ जला है, तेरी बात से मगर

हाकिम कभी वतन में न मँहगाइयाँ जलीं।४।…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 2:30am — 18 Comments

*शरद-पूर्णिमा*- कविता/ अर्पणा शर्मा, भोपाल

 अंबर और धरणी पर आज,

शारदीय चाँदनी रात खिली,

पूनो का चाँद लेकर आई,

तारों की बारात खिली,

कार्तिक पुरवाई बहे,

मीठी-मीठी ठंड़ खिली ,

चमेली,चंपा, जूही से महके,

सपनों की सौगात खिली,

शुभ्र चमके निहारिका ये ,

दृश्यमान है गात खिली,

गोकुल रास रचाएँ कान्हा,

वंशी की मधुरम तान खिली,

गोपियाँ-राधा झूमें-नाचें,

रक्तिम अधरों पर मुस्कान…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 25, 2018 at 12:00am — 8 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : विरासत

मुझे विरासत में मिलीं

कुछ हथौड़ियाँ

कुछ छेनियाँ

मिला थोड़ा-सा धैर्य

कुछ साहस

थोड़ा-सा हुनर

मैं तराशने लगा

निर्जीव पत्थरों को

बना दिया

सुंदर-सुंदर मूर्तियाँ

जो कई अर्थों में

श्रेष्ठ हैं

ईश्वर द्वारा बनायी गयीं

सजीव मूर्तियों से

जिन्हें नहीं पता रिश्तों की मर्यादा

नही कर पातीं ये भेद

दूधमुँही बच्चियों, युवतियों और वृद्ध महिलाओं में

काश

एक अदद कलम

मुझे मिली होती …

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 24, 2018 at 11:30pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
'रूह का पाखी' (नवगीत राज )

जर्जर तेरा महल हुआ है

बासी आबोदाना 

रूह का पाखी बोल रहा चल 

बदलें आज ठिकाना 



कोने कोने जाल मकड़िया

ढहने को तैयार दुकड़िया

ईंटें होती नंगी सारी

गारे की भी  तंगी भारी 

गाटर हुआ पुराना



पसरी आँगन बीच उदासी

जमी हुई हैं सभी निकासी

धूप हवा आती डर डर कर 

धीमे धीमे ठहर ठहर…

Continue

Added by rajesh kumari on October 24, 2018 at 9:48pm — 12 Comments

"तरही ग़ज़ल नम्बर 4

नोट:-

तरही मुशायरा अंक-100 में 87 ग़ज़लें पोस्ट हुईं,मेरी इस ग़ज़ल में जो क़वाफ़ी इस्तेमाल हुए हैं वो बिल्कुल नये हैं ।

पहले सिल पर घिसा गया है मुझे

फिर जबीं पर मला गया है मुझे

जाल हूँ इक सियासी लीडर का

नफ़रतों से बुना गया है मुझे

कोई बारूद की तरह देखो

सरहदों पर बिछा गया है मुझे

कहदो तक़दीर से बखेरे नहीं

करके वो एक जा गया है…

Continue

Added by Samar kabeer on October 24, 2018 at 5:54pm — 47 Comments

मिलन-लघुकथा

चारो तरफ मची भगदड़ अब धीरे धीरे कम हो चली थी, बस घायल लोगों की चीखें ही चारो तरफ गूंज रही थीं. इस भयानक हादसे में सैकड़ों लोग मरे थे और उससे ज्यादा ही घायल थे. राहत में पहुंचे लोग मृत शरीरों को एक तरफ इकट्ठा कर रहे थे और घायलों को हस्पताल भेजने की तैयारी में भी जुटे थे.

पटरी के एक तरफ पड़े एक युवा के मृत शरीर को लोगों ने उठाकर एक तरफ कर दिया. कुछ ही देर बाद कुछ और लोग एक लड़की के मृत शरीर को भी वहीँ डाल गए. कुछ घंटे बीतते बीतते तमाम लाशें एक दूसरे से गड्डमड्ड पड़ीं थीं और लड़के का हाथ लड़की के…

Continue

Added by विनय कुमार on October 24, 2018 at 12:33pm — 14 Comments

दर्द का आँखों में सबकी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर' ( गजल )

२१२२ /२१२२  /२१२२/ २१२

दर्द का आँखों में सबकी इक समंदर कैद है

चार दीवारी में हँसता आज हर घर कैद है।१।



हो न जाये फिर वो हाकिम खूब रखना ध्यान तुम

जिसके  सीने  में  नहीं  दिल  एक  पत्थर  कैद है।२।



जब से यारो ये सियासत हित परस्ती की हुयी

हो गया  आजाद  नेता  और  अफसर कैद है।३।



राज्य कैसा राम का यह ला रहे ये देखिये

बंदिशों से मुक्त रहजन और रहबर कैद…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2018 at 7:30am — 18 Comments

ग़ज़ल- चींटियाँ उड़ने लगीं, शाहीन कह देने के बाद

2122 2122 2122 212

हर दुआ पर आपके आमीन कह देने के बाद

चींटियाँ उड़ने लगीं, शाहीन कह देने के बाद

आपने तो ख़ून का भी दाम दुगना कर दिया

यूँ लहू का ज़ायका नमकीन कह देने के बाद

फिर अदालत ने भी ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली

मसअले को वाक़ई संगीन कह देने के बाद

ये करिश्मा भी कहाँ कम था सियासतदान का

बिछ गईं दस्तार सब कालीन कह देने के…

Continue

Added by Balram Dhakar on October 24, 2018 at 12:00am — 20 Comments

'माता की माया' (लघुकथा)

'अनौपचारिक आकस्मिक शिखर-वार्ता' :

प्रतिभागी : लोह कलपुर्जे, मशीनें और औज़ार।

अनौपचारिक परिचर्चा जारी गोलमेज पर :

"एक समय था, जब लोग हमारा लोहा मानते थे!"

"हां, बिल्कुल सही! लोहे पर कुछ मुहावरे, कहावतें और लोकोक्तियां भी कहा करते थे बातचीत में!"

"कील, हंसिया, खुरपी, छैनी, हथौड़े से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनों और उनके कलपुर्जों तक हमारी ही धूम थी! अपना लोहा मनवाते थे; दुश्मनों को लोहे के चने चबाने पड़ते थे!"

"चर्मकार, कारीगर, किसान, मज़दूर, इंजीनियर,…

Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 23, 2018 at 9:30pm — 4 Comments

मानव छंद में प्रयास :

मानव छंद में प्रयास :

मेरे मन को जान गयी ।

फिर भी वो अनजान भयी।।

शीत रैन में पवन चले।

प्रेम अगन में बदन जले।।

..................................

देह श्वास की दासी है।

अंतर्घट तक प्यासी है।।

मौत एक सच्चाई है।

जीवन तो अनुयायी है ।।

................................

रैना तुम सँग बीत गई।

मैं समझी मैं जीत गई।।

अब अधरों की बारी है।

तृप्ति तृषा से हारी है।।

सुशील सरना

मौलिक एवं…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 23, 2018 at 8:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल नूर की - मुझ को कहा था राह में रुकना नहीं कहीं

मुझ को कहा था राह में रुकना नहीं कहीं

सदियों को नाप कर भी मैं पहुँचा नहीं कहीं.

.

ज़ुल्फ़ें पलक दरख़्त सभी इक तिलिस्म हैं

इस रेग़ज़ार-ए-ज़ीस्त में साया नहीं कहीं.

.

तुम क्या गए तमाम नगर अजनबी हुआ

मुद्दत हुई है घर से मैं निकला नहीं कहीं.

.

अँधेर कैसा मच गया सूरज के राज में

जुगनू, चराग़ कोई सितारा नहीं कहीं.

.

खेतों को आस थी कि मिटा देगा तिश्नगी

गरजा फ़क़त जो अब्र वो बरसा नहीं कहीं.

.

ये और बात है कि अदू को चुना गया…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on October 23, 2018 at 12:00pm — 18 Comments

"मन मार्जियां "

जुल्म की ये इंतेहा भी कब तलक।

ज़िंदगी के इम्तेहा भी कब तलक॥

आज़ या कल बिखर ही जाऊंगा।

वक़्त होगा मेहरबाँ भी कब तलक॥

ऐब ही जब ऐब तुझमें हैं भरे मैं ।

तुझमें ढूँडू ख़ूबियाँ भी कब तलक॥…

Continue

Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on October 23, 2018 at 11:30am — 1 Comment

मुआवज़ा - लघुकथा -

मुआवज़ा - लघुकथा -

 देश भक्त पार्टी के एक नामी नेता  रेल हादसे पर  विरोध जताने अपने समर्थकों की भारी भीड़  लेकर डी  एम साहब के दफ़्तर पहुंच गये और जम कर नारेबाज़ी शुरू कर दी। थोड़ी  देर में साहब  ने नेताजी को दफ़्तर में बुला  लिया।

"क्या हुआ भैया जी, इतना शोरगुल किसलिये। हम लोग तो खुद ही रात दिन इसी काम में लगे हुए हैं।"

"जनाब, हम जन प्रतिनिधि हैं।लोगों को सब जानकारी देनी पड़ती है कि प्रशासन क्या कर रहा है। इतना समय हो गया, आप लोगों की ओर से कोई पुख्ता खबर नहीं आई मीडिया…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on October 23, 2018 at 10:59am — 8 Comments

गजल(था कभी...)

2122 2122 2122 212
था कभी कितना नरम वह! हर कदर आखर हुआ
जब हवाओं ने छुआ तब पात वह जर्जर हुआ।1

सूख जाती है सियाही आजकल जल्दी यहाँ
ख्वाहिशों के फ़लसफों पे आदमी निर्झर हुआ।2

मिट्टियों की कौन करता है यहाँ पड़ताल भी
हर शज़र गमला सजा आकाश पर निर्भर हुआ।3

जो उड़ाता था वहाँ बेपर घटाओं को कभी
देखते ही देखते वह आजकल बेपर हुआ।4

वक्त की मदहोशियाँ क्या-क्या करा देतीं यहाँ
गर्द के बस ढ़ेर जैसा एक दिन अकबर हुआ।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 23, 2018 at 10:00am — 5 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
yesterday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
Monday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Friday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service