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अमर हो गए ...

अमर हो गए ...

मेरी हिना

बहुत लजाई थी

जब तुम्हारे स्पर्श

मेरे हाथों से

टकराये थे

मेरा काजल

बहुत शरमाया था

जब

तुम्हारी शरीर दृष्टि ने

मेरी पलक

थपथपाई थी

मेरे अधर

बहुत थरथराये थे

जब तुम्हारी

स्नेह वृष्टि ने

मेरे अधर तलों को

अपने स्नेहिल स्पर्श से

स्निग्ध कर दिया था

मैं शून्य हो गयी

जब

प्रेम के दावानल में

मेरा अस्तित्व

तुम्हारे अस्तित्व के…

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Added by Sushil Sarna on February 3, 2018 at 4:35pm — 6 Comments

एक व्यंग रचना

कभी है ऊपर कभी नीचे, यह साँप सीडी का खेल

बजट में मंत्री खेलते हैं, यह साँप सीडी का खेल |

आँकड़ों का खेल है सबकुछ, आँकड़े सब जादुई का

टैक्स घटाया सेस बढ़ाया, यह साँप सीडी का खेल |

 

एक थैली का मॉल निकाल, रखा दूसरी थैली में

नया बोतल शराब पुरानी, यह साँप सीडी का खेल |

सब चीजों का भाव बढ़ गए, फिर भी बजट गरीबों का

उलटी गंगा बही खेल में, यह साँप सीडी का खेल |

आशाओं के दीप जलाकर, उस पर पानी डाल…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on February 3, 2018 at 4:34pm — 2 Comments

विरह गीत

साजन मेरे मुझे बताओ, कैसे दीप जलाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

इंतिजार में तेरे साजन, लगा एक युग बीता

हाल हमारा वैसा समझो, जैसे विरहन सीता

सूनी सेज चिढ़ाए मुझको, अखियन अश्रु बहाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज सजाऊँ

वे सुवासित मिलन की घड़ियाँ, लगता साजन भूले

बौर धरे हैं अमवा महुआ, सरसो भी सब फूले

सौतन सी कोयलिया कूके, किसको यह बतलाऊँ

घर आँगन है सूना मेरा, किस विधि सेज…

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Added by नाथ सोनांचली on February 3, 2018 at 11:30am — 20 Comments

भीड़तंत्र - लघुकथा

 इंडिया गेट पर गुलाब सिंह अपने औटो से  जा रहा था। तभी वहाँ तैनात हवलदार रोशन ने उसे रोक दिया।

"आज इधर से वाहनों के लिये मार्ग बंद है। केवल पैदल यात्री ही जा सकते हैं"।

"भाई, आज अचानक ऐसा क्यों"?

"इस में इतना चोंकने वाली क्या बात है। आज मंत्री जी की रैली है"।

"वह किसलिये"?

 "मंत्री जी के दामाद को गिरफ़्तार ना किया जाय, इसलिये"।

"ऐसा क्या किया है उनके दामाद ने"?

 "उनका दामाद दरोगा है, उसने अपने ही मातहत एक हवलदार की पत्नी के साथ बलात्कार किया…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 3, 2018 at 11:00am — 16 Comments

चुनावी हवा सरसराने लगी है...//अलका 'कृष्णांशी'

122 122 122 122

.

सियासत बिसातें बिछाने लगी है

चुनावी हवा सरसराने लगी है...

.

जगा फिर से मुद्दा ये पूजा घरों का

दिलों में ये नफरत बढ़ाने लगी है।

चुनावी हवा.....

.

यहाँ बाँट डाला है रंगो में मजहब

बगावत की आंधी सताने लगी है।

.

कहीं नाम चंदन कहीं चाँद दिखता

ये लाशें जमीं पर बिछाने लगी है

.

नही बात होती है अब एकता की

हमारी उमीदें घटाने लगी है

.

क्युँ इन्सां हुआ जानवर से भी…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on February 3, 2018 at 10:30am — 13 Comments

ग़ज़ल (मुझको अपना बना कर दगा दे गया )

ग़ज़ल (मुझको अपना बना कर दगा दे गया )

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(फाइलुन-- फाइलुन--फाइलुन--फाइलुन)

 

कोई उल्फ़त का बहतर सिला दे गया |

मुझको अपना बनाकर दगा दे गया |

 

जो खता मैं ने की ही नहीं प्यार में

उफ़ मुझे वो उसी की सज़ा दे गया |

 

दास्ताँ मैं तबाही की कैसे कहूँ

वो मुझे प्यार का वास्ता दे गया |

 

दूर यूँ मौत से कब हुई ज़िंदगी

कोई जीने की मुझको दुआ दे गया…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 2, 2018 at 10:43pm — 10 Comments

लघुकथा :साथी

गौरी, पिता के स्नेहिल परिधि में एक साथी की परिभाषा का 'प' समझ पाई। उसी पिता के आँगन में एक लंबा सा साथ निभाने के लिए उसके बचपन को बांटने के लिए भाई के रिस्ते ने साथ दिया। तब वह साथी की परिभाषा के दूसरे पायदान पर 'रि' रूपी रिस्ते को समझने की कोशिश भर कर रही थी। पिता का वह आँगन गौरी की परवरिश के साथ-साथ, बेटी के पराये होने का एहसास भी कराता रहता था। उसकी शिक्षा-दीक्षा की इतिश्री मानकर पिता ने जीवन के लिए, फिर से एक साथी की तलाश शुरू कर दी। जो बेटी भाग्य विधाता होगा। पिता से भी ज्यादा अच्छे से…

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Added by Vijay Joshi on February 2, 2018 at 12:30am — 2 Comments

ज़िन्दगी की सच्चाई पन्नों पर

ज़िन्दगी की सच्चाई पन्नों पर

हरकीरत हीर जी कौन हैं -- यह मुझे पता नहीं, मैं उनसे कभी मिला नहीं, परन्तु हरकीरत हीर जी क्या हैं, यह मैं उनकी रचनाओं में ज़िन्दगी की सच्चाई से भरपूर संवेदनाओं के माध्यम बहुत पास से जानता हूँ।

ज़िदगी के उतार-चढ़ाव में गहन उदासी को हम सभी ने कभी न कभी अनुभव किया है, परन्तु भावनाओं को कैनवस पर या पन्ने पर यूँ उतारना कि…

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Added by vijay nikore on February 1, 2018 at 10:13pm — 10 Comments

कविता : शून्य बटा शून्य

उसने कहा 2=3 होता है

 

मैंने कहा आप बिल्कुल गलत कह रहे हैं

 

उसने लिखा 20-20=30-30

फिर लिखा 2(10-10)=3(10-10)

फिर लिखा 2=3(10-10)/(10-10)

फिर लिखा 2=3

 

मैंने कहा शून्य बटा शून्य अपरिभाषित है

आपने शून्य बटा शून्य को एक मान लिया है

 

उसने कहा ईश्वर भी अपरिभाषित है

मगर उसे भी एक माना जाता है

 

मैंने कहा इस तरह तो आप हर वह बात सिद्ध कर देंगे

जो आपके फायदे की है

 

उसने…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 1, 2018 at 8:45pm — 6 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए :मनोज अहसास

221 2121 1221 212

हमनें यूँ ज़िन्दगानी का नक्शा बदल लिया

देखा तुझे जो दूर से रस्ता बदल लिया

तुमने भी अपने आप को कितना बदल लिया

नज़रों की ज़द में आते ही चहरा बदल लिया

जब इस सराय फानी का आया समझ में सच

हमनें भरी दुपहर में कमरा बदल लिया

दादी की जलती उंगलियों का दर्द अब नहीं

हामिद ने इक खिलौने से चिमटा बदल लिया

दीवानगी भी ,शाइरी भी,दिल भी, शहर भी

तुमको भुलाने के लिए क्या क्या बदल लिया

कांपी तमाम रात…

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Added by मनोज अहसास on February 1, 2018 at 6:12pm — 6 Comments

आहट की प्रतीक्षा में ...

आहट की प्रतीक्षा में ...

जाने

कितनी घटाओं को

अपने अंतस में समेटे

अँधेरे में

चुपचाप

बैठी रही

कौन था वो

जो कुछ देर पहले

देर तक

मेरे मन की

गहन कंदराओं में

अपने स्वप्निल स्पर्शों से

मेरी भाव वीचियों को

सुवासित करता रहा

और

मैं

ऑंखें बंद करने का

उपक्रम करती हुई

उसके स्पर्शों के आग़ोश में

मौन अन्धकार का

आवरण ओढ़े

चुपचाप

बैठी रही

आहटें

रूठ गयीं…

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Added by Sushil Sarna on February 1, 2018 at 3:23pm — 13 Comments

भीतर-बाहर

भीतर-बाहर

हाँफती धुमैली साँसों की धड़कन

लगता है यह गाड़ी अचानक

किन्हीं अनजान अपरिचित

दो स्टेशनों के बीच

ज़बर्दस्ती

रोक दी गई है, कब से…

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Added by vijay nikore on February 1, 2018 at 9:06am — 13 Comments

कविता -संघर्ष

हौसलों की बैसाखी से

हर मंज़िल को पार किया है

दया-सहानुभूति को

हरदम दर किनार किया है

जब-जब घिरे बादल विपत्ति के

बिजलियाँ चमकीं विचलन की

ख़ुद को मैंने धारदार किया है

बाधाओं को परास्त करता गया

बीज सफलता के बोता गया

भय के काँटों को लाचार किया है

गिरा नहीं , लड़खड़ाया नहीं

इरादा कभी मेरा डगमगाया नहीं

जीवन सुनामी को पार किया है

किया सदैव साहस का आलिंगन

धैर्य का उपवन सजाया है

संघर्षों का मैंने श्रृंगार किया है ।…

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Added by Mohammed Arif on February 1, 2018 at 8:30am — 9 Comments

दूर दामन से तेरे गर्दिश-ए-अय्याम रहे - SALIM RAZA REWA

2122 1122 1122  22/112

ये हमारी है दुआ शाद तू गुलफा़म रहे

दूर ही तुझसे सदा गर्दिश-ए-अय्याम रहे

-

सारी दुनिया में तेरे इल्म की महके ख़ुश्बू

जब तलक चाँद सितारें  हों तेरा नाम रहे

-

इस तरह तेरे तसव्वुर में मगन हो जाऊँ

मुझको अपनों से न ग़ैरों से कोई काम रहे

-

जब तेरी दीद को हम शहर में तेरे पहुंचें

अपने दामन से न लिपटा कोई इल्ज़ाम रहे

-

तेरी ख़ुशहाली की हरपल ये दुआ करते हैं 

तेरे  दामन  में  ख़ुशी  सुब्ह रहे शाम रहे …

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Added by SALIM RAZA REWA on February 1, 2018 at 7:30am — 26 Comments

फितरत नहीं छिपती है - (गजल)- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१ १२२२ २२१ १२२२



नफरत के बबूलों को आँगन में उगाओ मत

पाँवों में स्वयं के अब यूँ शूल चुभाओ मत।१।



ऐसा न हो यारों फिर बन जायें विभीषण वो

यूँ दम्भ में इतना भी अपनों काे सताओ मत।२।



फितरत नहीं छिपती है कैसे भी मुखौटे हों

समझो तो मुखौटे अब चेहरों पे लगाओ मत।३।



माना कि तमस देता तकलीफ बहुत लेकिन

घर को ही जला डाले वो दीप जलाओ मत।४।



ढकने को कमी अपनी आजाद बयानों पर

फतवों के मेरे  हाकिम  पैबंद  लगाओ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2018 at 6:00am — 15 Comments

ग़ज़ल (मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ )

(मफ़ाईलुन -मफ़ाईलुन- फ़ऊलन)



मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ |

शुरूए आशनाई कर रहा हूँ |

चुरा कर वो नज़र कहते यही हैं

मैं उनसे बेवफ़ाई कर रहा हूँ |

दिया है सिर्फ़ शीशा एब जू को

मैं कब उसकी बुराई कर रहा हूँ |

जमी जो धूल दिल के आइने पर

उसी की मैं सफ़ाई कर रहा हूँ |

सितमगर सिर्फ़ हक़ माँगा है अपना

मैं कब बेजा लड़ाई कर रहा हूँ |

परख लेना कभी भी वक़्ते मुश्किल

नहीं मैं ख़ुद नुमाई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2018 at 12:30pm — 13 Comments

विधाता छंद-रामबली गुप्ता

न किंचित स्वार्थ हो हिय औ', भुला कर वैर जो सारे।

अमीरी औ' गरीबी के, मिटा कर भेद सब प्यारे!

करें सहयोग हर जन का, सभी के काम जो आते।

सदा वे श्रेष्ठ जन जग में, सुयश-सम्मान हैं पाते।।1।।

धरे हिय धैर्य औ' साहस, निरन्तर यत्न जो करते।

न किंचित राह की बाधा, न मुश्किल से किन्हीं डरते।

सहें हर यातना पथ की, शिखर पर किन्तु चढ़ते हैं।

वही प्रतिमान नव बन कर, अमिट इतिहास गढ़ते हैं।।2।।

सदा सुरभित सुमन बन कर, दिलों में जो यहाँ खिलते।

भुला कर…

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Added by रामबली गुप्ता on January 31, 2018 at 11:54am — 7 Comments

माँ की चिंता

/माँ की चिंता//

''माँ तुम आज फिर,अब तक जाग रही हो? कितनी बार समझा चुकी हूँ कि ठंडी रातों में इतनी देर तक जागना तुम्हारी सेहत के लिए ठीक नहीं है।"

फिर से अस्थमा का दौरा पड़ सकता है। तुम समझने का नाम ही नहीं लेती हो!

आई बड़ी समझाने वाली। 'बेटी, मेरी चिंता छोड़, जीना ही कितने दिन है।' और "जिसकी बेटी देर रात तक काम से लौटे उस माँ को नींद कहाँ से आएगी।"

माँ दरवाजे पर ही टकटकी लगाये बैठी थी।

'बेटी तेरा काम क्या है?' कहाँ काम पर जाती है?' किसके घर काम पर जाती...

बेटी ने बीच…

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Added by Vijay Joshi on January 30, 2018 at 9:37pm — 5 Comments

लघुकथा वसन्तोत्सव

कड़कड़ाती ठंड में वसुधा की कँपकपि असहाय हो रही थी। सूरज को इसकी खबर हुई तो वह बहुत दूर अपनी वार्षिक यात्रा पर था। शीघ्र लौट कर सब ठीक करने का आश्वासन दिया। तो उसके लौटने की खबर से ही, ठंड ने अपना दायरा समेटना शुरू कर लिया।

वसुधा अपने नैसर्गिक रूप में पुनः खिलखिलाने लगी। वसुधा नव यौवना सी मुस्कान लिए साजन से मिलन के सतरंगी सपने सजाने लगी। हाथों में मेहँदी रंग रचने लगा।

पतझर से प्रकृति ने धरा पर रांगोली सजाई। तो वन उपवन में अमलताश ,पलाश, शिरीष , ने वसुधा के लिए वंदनवार सजाएं।…

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Added by Vijay Joshi on January 30, 2018 at 9:00pm — 3 Comments

झूठी कसम तो आपकी खाई न जाएगी

221 2121 1221 212

सच्ची  जो बात है  वो छुपाई न जाएगी ।

झूठी कसम तो आप की खाई न जाएगी ।।

बस हादसे ही हादसे मिलते रहे मुझे ।

लिक्खी खुदा की बात मिटाई न जाएगी ।।

चेहरे हैं बेनकाब यहाँ कातिलों के अब।

लेकिन सजाये मौत सुनाई न जाएगी ।।

ज़ाहिद खुदा की ओर मुखातिब न कर मुझे ।

काफ़िर हूँ मैं नमाज़ पढ़ाई न जाएगी…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 30, 2018 at 6:00pm — 7 Comments

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