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ग़ज़ल इस्लाह के लिए :मनोज अहसास

221 2121 1221 212
हमनें यूँ ज़िन्दगानी का नक्शा बदल लिया
देखा तुझे जो दूर से रस्ता बदल लिया

तुमने भी अपने आप को कितना बदल लिया
नज़रों की ज़द में आते ही चहरा बदल लिया

जब इस सराय फानी का आया समझ में सच
हमनें भरी दुपहर में कमरा बदल लिया

दादी की जलती उंगलियों का दर्द अब नहीं
हामिद ने इक खिलौने से चिमटा बदल लिया

दीवानगी भी ,शाइरी भी,दिल भी, शहर भी
तुमको भुलाने के लिए क्या क्या बदल लिया

कांपी तमाम रात यूँ मुफ़लिस के जिस्म में
बेज़ार होके रूह ने चोला बदल लिया

'अहसास' उसने हमको भुलाया है इस तरह
मिट्टी के इक मकान में घर था,बदल लिया

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Manoj kumar Ahsaas on February 5, 2018 at 7:07am

आदरणीय ब्रज जी

आदरणीय कुशक्षत्रप जी

आदरणीय इंसान जी

आदरणीय कबीर साहब

आदरणीय मुसफिर जी

हार्दिक आभार

ग़ज़ल में शिरकत और सुखन नवाज़ी का बहुत बहुत शुक्रिया

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 6:23pm

आ. भाई मनोज जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 3, 2018 at 7:09pm

जनाब मनोज कुमार 'अहसास' साहिब आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by surender insan on February 3, 2018 at 2:06pm

भाई मनोज जी आदाब। ग़ज़ल का बहुत अच्छा प्रयास हुआ है बधाई स्वीकार करे जी। 

मतले में जो की जगह तो करे तो कैसा रहेगा? गुणीजनों की राय लीजिये इस पर।

हमनें यूँ ज़िन्दगानी का नक्शा बदल लिया
देखा तुझे तो दूर से रस्ता बदल लिया

मक़्ता का सानी अभी मेहनत मांग रहा है।।

सादर ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 3, 2018 at 1:07pm

आद0 मनोज जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने

 शैर दर शैर मुबारक आपको। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 2, 2018 at 10:04pm

बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई आदरणीय मनोज जी..किस शेर की तारीफ करूँ..सभी एक से बढ़कर एक..

कृपया ध्यान दे...

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