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चुनावी हवा सरसराने लगी है...//अलका 'कृष्णांशी'

122 122 122 122

.

सियासत बिसातें बिछाने लगी है
चुनावी हवा सरसराने लगी है...

.

जगा फिर से मुद्दा ये पूजा घरों का
दिलों में ये नफरत बढ़ाने लगी है।
चुनावी हवा.....

.

यहाँ बाँट डाला है रंगो में मजहब
बगावत की आंधी सताने लगी है।

.

कहीं नाम चंदन कहीं चाँद दिखता
ये लाशें जमीं पर बिछाने लगी है

.

नही बात होती है अब एकता की

हमारी उमीदें घटाने लगी है
.

क्युँ इन्सां हुआ जानवर से भी बदतर
हमें शर्म ख़ुद से ही आने लगी है
.

ये क्यों मौन बैठे है आदर्शवादी
के मिट्टी वतन की बुलाने लगी है
.

जहाँ झूठे वादों का बहता है दरिया
जमीं बोझ से चरमराने लगी है

.

सियासत बिसातें बिछाने लगी है
चुनावी हवा सरसराने लगी है...

.

मौलिक एवं अप्रकाशित

अलका 'कृष्णांशी'

Views: 929

Comment

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 8, 2018 at 9:26pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए  धन्यवाद ।सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2018 at 12:41pm

हार्दिक बधाई...

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 4, 2018 at 8:20pm

जी सर अब सही है... मुझे नहीं सूझ रहा था, अभी एडिट करती हूँ। मार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय Samar Kabeer  ji ...... सादर।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 4, 2018 at 8:17pm

आदरणीय नादिर खान जी ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद । क्युँ का क्यूँ हो गया टाइपिंग मिस्टेक है सुधार करती हूँ। सादर।

Comment by Samar kabeer on February 4, 2018 at 7:32pm

आपने जो मिसरे लिखे हैं वो लय में नहीं हैं,इन मिसरों को यूँ कर सकती हैं:-

'हमारी उमीदें घटाने लगी है'

'हमें शर्म ख़ुद से ही आने लगी है'

Comment by नादिर ख़ान on February 4, 2018 at 7:08pm

अदरणीया अल्का जी उम्दा गज़ल के लिए बधाई स्वीकारें  ... 6 वें शेर में  क्यूँ इन्सां 122 नहीं हो सकता  और  शर्म खाने के विषय में आदरणीय समर साहब पहले ही बता  चुकें है..... फिर प्रयास कीजिये शुभकामनाओं के साथ .......

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 4, 2018 at 6:11pm

"इंसानियत को शर्म आने लगी है"
वैसे इसमें मुझे लय गड़बड़ लग रही है

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 4, 2018 at 6:05pm

आदरणीय Samar Kabeer ji  ,नमस्कार , प्रयास को समय देने व् मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार ।
"उम्मीद अम्न की ये घटाने लगी है "

"इंसानियत को शर्म आने लगी है"
यदि अब सही हो तो एडिट किया जाए ?
.... .सादर।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 4, 2018 at 6:03pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद ।सादर।

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on February 4, 2018 at 6:02pm

आदरणीय Mohammed Arif ji  ,नमस्कार ,उत्साहवर्धन करती टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद
आपने सही कहा, पहले भी सियासत ने ही देश के टुकड़े किये थे आज भी वही चल रहा है आम जनता की उम्मीदें सिर्फ भटक रहीं हैं इस पार्टी से उस पार्टी तक।सादर।

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