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मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

दिल में प्यार

आँखों में सम्मान रहने दो

मंदीर की आरतियों संग

मस्जिद की अज़ान रहने दो

क्यों लड़ना धर्म के नाम पर

क्यों बेकार में खून बहाना

मज़हब के मोहल्लों में

इंसानों के मकान रहने दो

मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

माना सब एक ही हैं

पर थोड़ी अलग पहचान रहने दो

अगरबत्तियों की ख़ुशबू संग

थोडा लोहबान रहने दो

चढाने दो उसको चादरें

मुझे चढाने दो चुनरियाँ

दोनों मज़हब तो सिखाते हैं प्रेम ही

तो थोड़ी गीता थोडा क़ुरान…

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Added by Ranveer Pratap Singh on September 5, 2017 at 10:59pm — 5 Comments

घर के टीचर (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

हल्कू ने बहुत दिनों बाद अपने बेटे कल्लू की पढ़ाई-लिखाई संबंधित पूछताछ करते हुए उससे अगला सवाल किया- "तुम्हारे इंग्लिश टीचर कौन हैं!"



कल्लू : "वो तो हमारे नसीब में नहीं हैं!"



हल्कू : "क्या कहा?"



कल्लू : "सच कहा। हमें केवल इंडियन टीचर ही पढ़ाते हैं!"



हल्कू : "अबे, मैं अंग्रेज़ी के बारे में पूछ रहा हूं!"



कल्लू : "लेकिन मैंने तो आपके हाथ में केवल देसी देखी है, क्या अब आप अंग्रेज़ी भी लेने लगे?"



हल्कू : " अबे, मैं दारू की नहीं,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 5, 2017 at 7:39pm — 7 Comments

ग़ज़ल ( हाए वो शख़्स निकलता है सितमगर यारो )

ग़ज़ल ( हाए वो शख़्स निकलता है सितमगर यारो )

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(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन )



मुन्तखिब करता है दिल जिसको भी दिलबर यारो |

हाए वो शख़्स निकलता है सितम गर यारो |

उनके चहरे से नज़र हटती नहीं है मेरी

किस तरह देखूं ज़माने के मैं मंज़र यारो |

कूचए यार से जाएँ तो भला जाएँ कहाँ

राहे उलफत में लुटा बैठे हैं हम घर यारो |

आस्तीनों में जो रखते हैं…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 5, 2017 at 6:14pm — 17 Comments

जब तू मिरा है .....,संतोष

जब तू मिरा है तो अपना लगता क्यूँ नहीं

दिल के आइने में साफ़ दिखता क्यूँ नहीं



अब नज़रें मिलती ही नहीं तिरी नज़रों से,

हसीन ख़्वाबों से फिर निकलता क्यूँ नहीं



दुनियाँ मुझे अब क्यूँ थमी सी लगती है

तू भी मौसम सा कुछ बदलता क्यूँ नहीं



ज़बां चुप और धड़कन भी तेज़ है ज़रा

तू नज़रों के इशारे समझता क्यूँ नहीं



ये जिस्म सर्द है बर्फ़ के मानिन्द'संतोष'

तू रगों में गर्म लहू सा दौड़ता क्यूँ नहीं



#संतोष खिरवड़कर

(मौलिक एवं… Continue

Added by santosh khirwadkar on September 5, 2017 at 5:30pm — 6 Comments

तुम ही बताओ न ...

तुम ही बताओ न ...

क्या हुआ

हासिल

फासलों से

आ के ज़रा

तुम ही बताओ न

इक लम्हा

इक उम्र को

जीता है

ख़ामोशियों के

सैलाब पीता है

उल्फ़त के दामन पे

हिज़्र की स्याही से

ये कैसी तन्हाई

लिख डाली

आ के

ज़रा

तुम ही बताओ न

ये किन

आरज़ूओं के अब्र हैं

जो रफ्ता रफ़्ता

पिघल रहे हैं

एक लावे की तरह

चश्मे साहिल से

क्यूँ हर शब्

तेरी…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 5, 2017 at 5:30pm — 8 Comments

तुम ही बताओ न ...

तुम ही बताओ न ...

क्या हुआ

हासिल

फासलों से

आ के ज़रा

तुम ही बताओ न

इक लम्हा

इक उम्र को

जीता है

ख़ामोशियों के

सैलाब पीता है

उल्फ़त के दामन पे

हिज़्र की स्याही से

ये कैसी तन्हाई

लिख डाली

आ के

ज़रा

तुम ही बताओ न

ये किन

आरज़ूओं के अब्र हैं

जो रफ्ता रफ़्ता

पिघल रहे हैं

एक लावे की तरह

चश्मे साहिल से

क्यूँ हर शब्

तेरी…

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Added by Sushil Sarna on September 5, 2017 at 5:30pm — No Comments

वही वंशज है सूरज का - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

1222 1222 1222 1222



न जीवन राख कर लेना किसी की डाह में यारो

हमेशा सुख सभी का हो तुम्हारी चाह में यारो।1।



विचारों की गहनता हो न हो व्यवहार उथला ये

सुना मोती ही मिलते हैं समुद की थाह में यारो ।2।



वही वंशज है सूरज का बुजुर्गों ने कहा है सच

जलाए दीप जिसने भी तिमिर की राह में यारो ।3।



किसी को देके पीड़ा तुम न उसकी आह ले लेना

न जाने कैसी ज्वाला हो किसी की आह में यारो।4।



गगन के स्वप्न तो देखो धरा लेकिन न त्यागो तुम

हवा में… Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 5, 2017 at 4:02pm — 22 Comments

आप क्या हैं इसे जानता कौन है

212 212 212 212

पूछिये मत यहां गमज़दा कौन है ।

पूछिये मुद्दतों से हँसा कौन है ।।



वो तग़ाफ़ुल में रस्में अदा कर गया ।

कुछ खबर ही नहीं लापता कौन है ।



घर बुलाकर सनम ने बयां कर दिया ।

आप आ ही गये तो ख़फ़ा कौन है ।।



इस तरह कोई बदला है लहजा कहाँ ।

आपके साथ में रहनुमा कौन है ।।



आज तो बस सँवरने की हद हो गई ।

यह बता दीजिए आईना कौन है ।।



अश्क़ आंखों से छलका तो कहने लगे ।

ढल गई उम्र अब पूंछता कौन है ।।



यूँ भटकता… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 5, 2017 at 3:17pm — 12 Comments

प्रेम पचीसी --भाग 3 (प्रीत-पगे दोहे)

प्रेम-पचीसी--भाग-3 (प्रीत-पगे दोहे)

दाँत दुखे तो पाड़ दूँ, आँख दुखे दूँ फोड़ ।

घायल मन की पीर का, पास पिया के तोड़ ।। ...1



झाल बदन में उठ रही, जबसे लागी लाग ।

सावन बरसे नैन से, बुझे न फिर भी आग ।। ...2



होना था सो हो गया, अब तो करो उपाय ।

बाहर-भीतर आग है, पीड़ा सही न जाय ।। ...3



रोग लगा सो लग गया, छोड़ो सोच-विचार ।

अंग-अंग काटो भले, ढूँढ़ों कुछ उपचार ।। ...4



ज्यों-ज्यों करती हूँ दवा, त्यों-त्यों बढ़ता रोग ।

बैद बनो तुम साँवरे, कब… Continue

Added by khursheed khairadi on September 5, 2017 at 12:53pm — 7 Comments

नई लकीर (लघुकथा)राहिला

"बेटा !बात हमारी गैरहाजिरी में उसे घर लाने की है।"

"तो मैं क्या करती अम्मी?आप ही बताएं ।उसे इस हाल में छोड़ा जा सकता था क्या?शुभम और रोहित से बोला था मैनें इसे एक दिन के लिए अपने घर पर रख लें, लेकिन उनके पास भी अपनी वाजिब वजहें थीं"

"ये सब मैं नहीं जानती शमा!तुम्हारे अब्बू को जब पता लगेगा की हमारी गैरहाजिरी में तुमने... "

"तो क्या गलत किया अम्मी?"

वह माँ की बात बीच में काट कर बोली।

"एक भी दिन का नागा ना करने वाला लड़का, चार दिन से ना स्कूल आया ना ट्यूशन।तब कहीं जाकर…

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Added by Rahila on September 5, 2017 at 12:29pm — 11 Comments

पूर्वजों की विरासत

हे महान पूर्वजों गर्व करो

हम निखार रहे हैं

वो तमाम सम्पदा

जो सौंपी थी तुमने, हमें बिरासत में...

बहुत घने हो गए थे जंगल

खो जाते थे बेश- कीमती हांथी दांत

गल जाती थी शेर की खाल

हो जाता था सदैव

तुम्हारी सम्पदा का नुक्सान,

सहन नहीं होता था ये हमसे

इसलिए मार दिए हमने हांथी और शेर

काट दिए जंगल,

बना लिए सोफे, बेड, ड्रेसिंग टेबल और मकान,

इनपे बैठे , लेटे अपना चेहरा जब भी संवारते हैं

मकान में सजे हांथी दांत और शेर की खाल ,

पूरी… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 5, 2017 at 11:47am — 2 Comments

बाढ़ / किशोर करीब

बाढ़ ने फिर बाँध तोड़े

लुट गया घरबार फिर से

 

जो संभाले थे बरस भर

टिक न पाए एक भी क्षण

देखते ही देखते सब

ढह गया कुछ बचा ना अब 

 

त्रासदी हर साल की है

क्या कहानी हाल की है?



क्यों नहीं हम जागते हैं?

व्यर्थ ही बस भागते हैं।

क्यों नहीं निस्तार करते

नदियों का विस्तार करते?



पथ कोई हो जिसमें चल के

प्राणदा खुद को संभाले।

 

हम बनाते घर सभी हैं

सोचते क्या पर कभी हैं?

नदी में…

Continue

Added by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on September 4, 2017 at 3:46pm — 3 Comments

तरही ग़ज़ल (है अजब चीज मुहब्बत मुझे मालूम न था)

ख़ुद से हो जाएगी नफरत मुझे मालूम न था

है अजब चीज़ मुहब्बत, मुझे मालूम न था ||



गम से हो जायेगी उल्फ़त मुझे मालूम न था

ऐसी होगी मेरी क़िस्मत मुझे मालूम न था ||



दूध में कोई नहाये कोई भूखा ही रहे

ऐसे होती है सियासत मुझे मालूम न था ||



ख़्वाब में रोज़ ही मिलते थे मग़र, यार मेरे

ख़्वाब होगा ये हक़ीक़त मुझे मालूम न था ||



वहम इक पाल लिया था मेरे दिल ने यूँ ही

थी उसे हँसने की आदत मुझे मालूम न था ||



यार कहता था ग़ज़ल वक़्त… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 4, 2017 at 1:44pm — 20 Comments

गजल(मैंने दिल .)

22 22 22 22

मैंने दिल की बात कही है

उनको लगती खूब खरी है।1



मंदिर-मंदिर भटके हैं सब

बाबाओं की धूम मची है।2



दाढ़ी ने है नाच नचाया

जब-जब लक्ष्मी हाथ लगी है।3



कितने डेरे उजड़े अबतक

डेरों की सरकार चली है।4



भूखे-नंगे बढ़ते जाते

भक्तों की बारात सजी है।5



चुनकर जाते जो संसद में

लगता उनकी साँस टँगी है।6



निर्वाचक ऊँघते, परते हैं

जात-धरम की खाट पड़ी है।7



न्याय बड़ा डंडाधारी है

ले-देकर यह आस… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 3, 2017 at 5:57pm — 8 Comments

गुरु (लघुकथा)

बस खचाखच भरी हुई थी। चुकि मैं पहले आ गया था, इसलिए मुझे सीट मिल गयी थी, बावजूद इसके भीड़ का असर मुझ पर भी हो रहा था।



यकायक मेरी नजर एक ऐसे शख्स पर गयी, जो मुझे बचपन के दिनों में गणित पढ़ाया करते थे। वे भी बस में खड़े खड़े भीड़ के दबाव को झेल रहे थे। लगभग 30 साल पहले, एक हृष्ट पुष्ट युवा को आज एक कमजोर असहाय बुजुर्ग के रूप में देखकर पहले पहचानने में थोड़ी असहजता हुई पर ध्यान से देखने पर मैं उन्हें भली भांति पहचान गया ।



मैं उठा और प्रणाम कर अपनी सीट पर उन्हें बैठने का आग्रह… Continue

Added by नाथ सोनांचली on September 3, 2017 at 2:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल - ढोते फिरेंगे आप मुहब्बत कहाँ कहाँ

बह्र : 221/2121/1221/212



इस दोस्ती के बीच तिजारत कहाँ कहाँ

तुमने लगायी है मेरी कीमत कहाँ कहाँ



तुम मुझ से कह रहे हो कि मैं होश में रहूँ

नासेह दे रहे हो नसीहत कहाँ कहाँ



सब कुछ हमें ख़बर है नुमाइश के दौर में

करता है कौन कितनी सियासत कहाँ कहाँ



हैं आप जो ख़ुदा तो मुझे पूछना है ये

पहुँची है मुफ़लिसों की इबादत कहाँ कहाँ



गंगा में ले के जाइए और फेंक आइए

ढोते फिरेंगे आप मुहब्बत कहाँ कहाँ



तुम पूछ तो रहे हो मगर क्या… Continue

Added by Mahendra Kumar on September 3, 2017 at 12:39pm — 6 Comments

'पार्टियां अभी बाक़ी हैं !' (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी :

'पार्टियां अभी बाक़ी हैं !' (लघुकथा) :



एक दफ़्तर में त्योहार के अवकाश के बाद समोसे-कचौड़ी-आहार-रूपेण बधाईयों का दौर या 'दौरा सा' चला। सब अपने काम फिर से शुरू करने ही वाले थे कि उनमें से एक ने दूसरे से कहा- "कल तो तूने बधाई तक नहीं दी मेरे त्योहार पर! सोशल मीडिया पर मेरे धर्म और रीति-रिवाज़ों की जम कर खिल्ली उड़ा रहा था! उससे तेरे को कोई मेडल या अवार्ड मिल गया क्या?"

"तेरे को मिल गया क्या उन रीति-रिवाज़ों को दोहरा-दोहरा कर?" दूसरे ने कहा।

"तुझे तेरी कट्टरपंथी और पोंगापंथी से… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 3, 2017 at 10:10am — 8 Comments

दूर है वह मग़र जुदा न हुआ

2122 1212 22/(112)

साथी उससे कोई खरा न हुआ

साथ गम ने दिया जुदा न हुआ



रोकती बस रही रज़ा तेरी

हमने चाहा बुरा,बुरा न हुआ



छल कपट से रहा कमाता जिसे

जऱ यूँ ही बह गया तेरा न हुआ



बस बनावट भरा लगा रिश्ता

जिसमें कोई कभी खफ़ा न हुआ



डोर दिल की बँधी रही जिससे

दूर है वह मग़र जुदा न हुआ



जिंदगी को सही समझ न सके

मुश्किलों से जो सामना न हुआ



बंद आँखों ने जो किया दीदार

आँखें खोली वो देखना न… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 3, 2017 at 8:00am — 3 Comments

आदमी मैं कभी बड़ा न हुआ (ग़ज़ल)

2122 1212 22



दर्द से जिसका राब्ता न हुआ

ज़ीस्त में उसकी कुछ नया न हुआ



हाल-ए-दिल उसने भी नहीं पूछा

और मेरा भी हौसला न हुआ



आरज़ू थी बहुत, मनाऊँ उसे

उफ़! मगर वो कभी ख़फ़ा न हुआ



तब तलक ख़ुद से मिल नहीं पाया

जब तलक ख़ुद से गुमशुदा न हुआ



सिर्फ़ इक पल की थी वो क़ैद-ए-नज़र

जाने क्यों उम्र-भर रिहा न हुआ



मुझसे छूटी नहीं ख़ुलूस-ओ-वफ़ा

आदमी मैं कभी बड़ा न हुआ



अपनी ख़ुशबू ख़ला में छोड़ के "जय"

दूर होकर भी वो जुदा… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 2, 2017 at 10:36pm — 10 Comments

प्रेम पचीसी --भाग 2 (प्रीत-पगे दोहे)

प्रेम-पचीसी--भाग 2 (प्रीत-पगे दोहे)

कौन रसायन बह रहा, रग-रग फैली आग ।

स्त्राव हुआ किस ग्रन्थि से, धड़कन गाए राग ।। ...1



दर्पण देखूँ सौ दफ़ा, फिर-फिर बाँछूँ बाल ।

सूरत अपनी देखकर, गाल हुए हैं लाल ।। ...2



मैं मछली सी हो गयी, सागर तेरा ध्यान ।

बाहर निकसूँ तो चली, जाए मेरी जान ।। ... 3



जित देखूँ उत साँवरे, दिखे तिहारा रूप ।

अंधी होकर प्रेम में, पाए नैन अनूप ।। ...4



लज़्ज़त तेरी दीद की, याद मुझे है यार ।

दीदों से आँसू नहीं, टपक… Continue

Added by khursheed khairadi on September 2, 2017 at 6:03am — 6 Comments

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