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घर के टीचर (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

हल्कू ने बहुत दिनों बाद अपने बेटे कल्लू की पढ़ाई-लिखाई संबंधित पूछताछ करते हुए उससे अगला सवाल किया- "तुम्हारे इंग्लिश टीचर कौन हैं!"

कल्लू : "वो तो हमारे नसीब में नहीं हैं!"

हल्कू : "क्या कहा?"

कल्लू : "सच कहा। हमें केवल इंडियन टीचर ही पढ़ाते हैं!"

हल्कू : "अबे, मैं अंग्रेज़ी के बारे में पूछ रहा हूं!"

कल्लू : "लेकिन मैंने तो आपके हाथ में केवल देसी देखी है, क्या अब आप अंग्रेज़ी भी लेने लगे?"

हल्कू : " अबे, मैं दारू की नहीं, अंग्रेज़ी के टीचर याने मासाब के बारे में पूछ रहा हूं, साले तेरा ध्यान किधर है?"

कल्लू : "ध्यान तो दे रहा हूं न पापा! आप 'देसी' के टीचर हो न, 'अंग्रेज़ी' के नहीं! स्कूल में तो ऐसा या वैसा कोई भी टीचर नहीं!"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 9, 2017 at 10:34pm
मेरी इस लघुकथा पर समय देकर अनुमोदन व हौसला अफज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहब, जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहब, जनाब सलीम रज़ा रेवा साहब, जनाब डॉ. आशुतोष मिश्रा साहब, जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब और जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब। यह प्रोत्साहन मुझे और अच्छा प्रयास करने के लिए बहुत ज़रूरी व अहम है।
Comment by SALIM RAZA REWA on September 8, 2017 at 10:50pm
जनाब उस्मानी साहब अच्छी लघुकथा के लिए मुबारकबाद,
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 8, 2017 at 5:18pm

आदरणीय शेख शहजाद जी सार्थक सन्देश देती अच्छी लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई /संबाद के तरीके ने इसे और रोचक बना दिया है सादर 

Comment by Mohammed Arif on September 7, 2017 at 7:31am
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, बहुत ही बेहतरीन कटाक्ष । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 6, 2017 at 6:31pm
मुहतरम जनाब शेख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब ,अच्छी सीख देती लघुकथा हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं
Comment by Samar kabeer on September 6, 2017 at 5:36pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब आदाब,कम शब्दों में बहुत अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बच्चे जो घर में देखते हैं उसी इस्तिलाह को अपना लेते हैं,बहुत ख़ूब वाह, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 6, 2017 at 1:54pm
आद0 शहज़ाद शेख उस्मानी साहब सादर अभिवादन, बहुत हास्य का पुट लिए यह लघुकथा है। कई बार पढ़ने के बावजूद भी मन नहीं भरा। बधाई आपको इस हास्य व्यंग्य लघुकथा पर।

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