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तारीख- लघुकथा

अदालत में बैठे बैठे उनकी आंख लग गयी, अभी तक जज साहब नहीं आये थे और लगता था कि आज भी नहीं आएंगे| लगभग साल होने को आये थे लेकिन मामला पहली सुनवाई के बाद आगे नहीं बढ़ पाया था| पता नहीं और कितने महीने या साल लग जायेंगे इसमें, उनको खुद को समझ में नहीं आ रहा था|

शादी के कुछ ही हफ्ते बाद पत्नी ने शिकायत करना शुरू कर दिया और एक दिन वह अपना सूटकेस लेकर निकल गयी| शाम को जब उन्होंने फोन किया तो उसने साफ़ साफ़ कह दिया कि वह उनके साथ नहीं रह सकती| उन्होंने समझाने की बहुत कोशिश की, उसके घर भी गए लेकिन न…

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Added by विनय कुमार on December 8, 2016 at 6:16pm — 8 Comments

अधूरी तिश्नगी ...

अधूरी तिश्नगी ...

कैसे भूल सकती हूँ

वो रात

वो बात

जो एक चिंगारी से

शुरू हुई थी

वो चिंगारी

मेरी रगों में

धीरे धीरे

आग बनकर फैलती गयी

और मैं

चुपचाप उस आग में

जलती रही

मैं

खामोशियों के बियाबाँ में

गूंगी बनी

अपने जज़्बातों से

तन्हा सी

गुफ़्तगू करती रही

अपने खून में

लगी आग को बुझाना

मुझे कहां आता था

निहारती रही

आसमां की तरफ़

कि शायद कोई अब्र…

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Added by Sushil Sarna on December 8, 2016 at 6:11pm — 12 Comments

मुसाफ़िर थोड़े हूँ, मैं रास्ता हूँ (ग़ज़ल)

1222 1222 122



विरह की ठंड से जब काँपता हूँ।

तेरी यादों की चादर ओढ़ता हूँ।



पहुंचना ही नहीं मुझको कहीं पर

मुसाफ़िर थोड़े हूँ, मैं रास्ता हूँ।



न जाने कौन मुझको मिल गया है

कई दिन से मैं ख़ुद से लापता हूँ



बस इक उम्मीद का आलम है ये, मैं

हर आहट पर उचक कर देखता हूँ।



हुआ है ख़ाक कब का जिस्म मेरा

मैं अब तक उसमें दिल को ढूंढता हूँ।



उफनता है तेरी यादों का दरिया

मैं रफ़्ता-रफ़्ता उसमें डूबता हूँ।



(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on December 7, 2016 at 5:08pm — 8 Comments

ग़ज़ल.... अजीब मंजर है बेखुदी का

121 22 121 22 121 22 121 22



न वक्त का कुछ पता ठिकाना न रात मेरी गुज़र रही है ।

अजीब मंजर है बेखुदी का , अजीब मेरी सहर रही है ।।



ग़ज़ल के मिसरों में गुनगुना के , जो दर्द लब से बयां हुआ था ।

हवा चली जो खिलाफ मेरे , जुबाँ वो खुद से मुकर रही है ।।



है जख़्म अबतक हरा हरा ये , तेरी नज़र का सलाम क्या लूँ ।

तेरी अदा हो तुझे मुबारक , नज़र से मेरे उतर रही है ।।



मिरे सुकूँ को तबाह करके , गुरूर इतना तुझे हुआ क्यूँ ।

तुझे पता है तेरी हिमाकत , सवाल…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 7, 2016 at 11:00am — 11 Comments

तरही गजल/राणा

बह्र 2122 2122 2122 212

गर मरे उम्मीद फिर कुछ भी यहां बचता नहीं

छोड़ दें उम्मीद को ये फैसला अच्छा नहीं।



गर्दिशों में जी रही आवाम सारी जब यहाँ

ऐश से तब हुक्मरां का टूटता नाता नहीं।



जिंदगी वो डोर है जिससे बँधा इंसान है

साथ उसका भी मगर होता हमेशा का नहीं।



मर मिटा है आज तू जिसकी हिफाज़त के लिए

बेवफा हमदम वो तेरी मौत पे आया नहीं।



कायदा-ए-जिंदगी भी है जरूरी दोस्तो

कायदे को छोड़ दें तो कुछ भी फिर जीना नहीं।



एक मुफ़लिस गर… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 7, 2016 at 7:09am — 6 Comments

एक ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

प्यार करते हो हमें गर, साथ चलकर देखना।

जल रहे जिस आग में हम, तुम भी जलकर देखना।।



एक गठरी बांधकर, मैंने सवालों की रखी।

दिल में आ जाए कभी, दो एक हल कर देखना।।



रास्ता बाहर का दिखलायेंगे अपने, आपको।

है अगर साहस तो लहरों सा, मचलकर देखना।।



हूँ मैं सोना आग में जलना, ही मेरा काम है।

दर्द मेरा जान जाओगे, पिघलकर देखना।।



जागता है साथ मेरे, ये बिछौना रातभर।

चाहती हूँ एक दिन इसको, बदलकर देखना।।



सामने से… Continue

Added by sarita panthi on December 6, 2016 at 7:12pm — 3 Comments

सांसारिकता (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"पढ़-लिख गये हो, अब क्या करोगे सरकारी नौकरी या प्राइवेट?" बुज़ुर्ग पड़ोसी ने युवक से पूछा।



"नहीं, नौकरी तो नहीं करूंगा!" टेढ़ा सा मुँह बनाकर युवक ने कहा।



"तो क्या दुकान खोलोगे, धंधा-व्यापार करोगे? कौन सा?"



"धंधा! धंधा तो कतई नहीं, इसके लिए पर्याप्त धैर्य मुझमें है ही नहीं!"



"तो फिर क्या बाप की छाती पर ही बैठे रहोगे, पढ़ने-लिखने के बाद भी?" बुज़ुर्ग ने उसको घूरते हुए कहा।



"यह कैसी बात कह रहे हैं आप ? पहले तो मैं दुनियादारी सीखूंगा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 6, 2016 at 7:04pm — 17 Comments

चौथा बन्दर

एक चौथा बन्दर भी है

जिसने हटवा दिए हैं हाथ

उन तीनों बन्दरों के

आँख, कान और मुँह से

अब

वो सुन सकते हैं

बोल सकते हैं

देख सकते हैं

वह सब

जो चौथा बन्दर

सुनता है

बोलता है

देखता है

साथ ही

तीनों बन्दर

लगे हैं अपने जैसे

और भी बन्दर बनाने में

जो वही सुनें

वही बोलें

वही देखें

जो चौथा बन्दर

चाहता है

और जब

कोई बन्दर

कर देता है इंकार

उन तीनों जैसा

बनने से

तो वो तीनों… Continue

Added by Mahendra Kumar on December 6, 2016 at 3:52pm — 18 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण रामानुज

कुंडलिया छंद 

=========

सुख-सुविधा से काटते, जीवन उसके साथ,

जब सजनी के काम में, आप बँटाते हाथ। | 

आप बँटाते साथ, ह्रदय में प्रेम बरसता 

करे सभी सहयोग, उसी के घर समरसता 

रहे सभी जब साथ, फिर न जीवन में दुविधा 

पुत्र बहूँ औ पौत्र, मिलें सबको सुख-सुविधा |

(2)

जीवन के संग्राम में, करते जो संघर्ष,

सुगम रह उसकी बने, जीवन हो उत्कर्ष ।

जीवन हो उत्कर्ष, राह में आगे बढ़ता

करे सत्य ही बात,अकारण कभी न अड़ता

स्वार्थ भावना…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 6, 2016 at 3:50pm — 4 Comments

जीवन काल (कविता)

वक़्त होता है सारथी
पथ होता जीवन काल

राह दिखाते चाँद सूरज
मनुष्य हो जाते बेहाल

डम डम डम डम बजाते जो डमरू
क्या बन जाओगे महाकाल

पृथ्वी के जो एक कण से उपजे
अहँकार न बनेगी कभी ढ़ाल ।

नहीं कोई यहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम
बनाते फिर भी कई पाल

आईने के सामने खड़े हो जाएँ
तो दिख जाये स्वयं की डाल ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 6, 2016 at 10:30am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -चाँद को चाँद भी नहीं कहते -- ( गिरिराज भंडारी )

2122    1212   22 /112

कर के उल्टी, कभी नहीं कहते

ख़ुद की हो गंदगी ...नहीं कहते

 

कितने बे ख़ौफ हो गये हैं सब

चाँद को चाँद भी नहीं कहते 

 

सादगी देख कर भी पागल में

हम उसे सादगी नहीं कहते

 

फाइदा तो लिये उजालों का 

पर उसे रोशनी नहीं कहते 

 

जब से इमदाद-ए-पाक पाये हैं

हम उन्हें आदमी नहीं कहते

 

क़त्ल करतें हैं ले के नाम–ए-ख़ुदा

हम उसे बंदगी नहीं कहते

 

तुम इसे मौत कह…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 6, 2016 at 10:30am — 7 Comments

गर्द में सारा नगर डूबा हुवा है।

बह्र: 2122 2122 2122



रात हो या दोपहर डूबा हुआ है।

गर्द में सारा नगर डूबा हुआ है।।



मौत आनी है यकीनन इस जहाँ में

खौफ में फिर भी बशर डूबा हुआ है।।



लक्ष्य कोई भी तुझे कैसे मिलेगा

तू निराशा में अगर डूबा हुआ है।।



ख़त्म करता जा रहा है दश्त इंसाँ

फ़िक्र में अब हर शजर डूबा हुआ है।।



साथ में कुछ भी नही जाता यहाँ से

मोह में इंसाँ मगर डूबा हुआ है।।



वो दिलासा क्‍या हमें देगा जो खुद ही

'आँसुओं में तर ब तर डूबा हुआ… Continue

Added by नाथ सोनांचली on December 6, 2016 at 4:13am — 8 Comments

ओ मेरे आकाश !

ओ मेरे आकाश !

पिता थे तुम

असीम अपरिमाप

सितारों की पहुँच से भी दूर

और मैं पर्वत की भाँति बौना

अपने उठान का अभिमान लिए

तब नहीं जानता था

यह फर्क

जब तुम मेरे पास थे

अनंत विस्तार लिए

भले ही

आज बन जाऊं मैं ऊंचा

चोमोलुंगमा

यानि कि सागरमाथा

दुनियां का सर्वोच्च हिमशिखर

एवरेस्ट ---

 

ओ मेरे आकाश !

 सदा ही रहोगे तुम

अनंत ऊँचाइयों पर

ऊंचे और उन्नत

कई-कई…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 5, 2016 at 7:30pm — 10 Comments

दुनियादारी- लघुकथा

"आज फिर तेरा मुँह सूखा सूखा लग रहा है, लगता है आज भी कुछ नहीं खाया तूने", माँ ने उसको देखते ही टोका|

"बहुत भूख लगी है माँ, कुछ खिला पहले", उसने बात को टालने की गर्ज से कहा|

"ठीक है तू हाथ मुँह धो ले, कुछ गर्मागर्म बनाती हूँ तेरे लिए", माँ तुरंत रसोई की तरफ लपकी और फिर उसका बोलना चालू हो गया "पता नहीं कब अकल आएगी इस छोरे को"|

जल्दी से गरम पकोड़े उसके सामने रखते हुए वह बोली "चाय भी बना रही हूँ, तू आराम से खा| वैसे आज तूने पैसों का क्या किया, टिफ़िन तो तू ले ही नहीं जाता"|

"बहुत…

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Added by विनय कुमार on December 5, 2016 at 6:59pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कोई राधा हुई दीवानी क्या (ग़ज़ल 'राज' )

2122  1212  22

जिन्दगी की नई कहानी क्या

हर कोई जानता बतानी क्या

 

मौत  के सामने कोई बचपन

या बुढ़ापा भला जवानी क्या

 

होंसलों से उगा शज़र उसको

ख़ास आबो हवा या पानी क्या

 

तिश्नगी इक नदी बुझाती थी

आज सहरा में है निशानी क्या 

 

कृष्ण देखा है आज क्या तुमने

कोई राधा हुई दीवानी क्या

 

फूल अगर हैं वतन के गुलशन के

फिर हरे और जाफ़रानी क्या

 

गर हो नाज़िम ही कान के…

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Added by rajesh kumari on December 5, 2016 at 6:30pm — 21 Comments

हाल अपना भी (ग़ज़ल)

2122 2122 212,

आइए कुछ तो सुनाते जाइए।

हाल अपना भी बताते जाइए। 1

-----

लोग तो बातें बनायेगें बहुत,

झूठ पर भी मुस्कुराते जाइए। 2

-----

आप अपनी बात पर कायम रहें,

निर्धनो के घर बसाते जाइए। 3

-----

आप अनदेखा न यूँ हमको करें,

रूठ बैठा दिल मनाते जाइए। 4

-----

डालकर हम पर नजर बस इक जरा,

प्यार का अरमां सजाते जाइए। 5

-----

आपके सपने हमारे नींद में,

होश खोए है जगाते जाइए। 6

------

ये सँवरना आपके ही है… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 4, 2016 at 1:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल ( वो वादे से अपने मुकर जाएगा )

ग़ज़ल ( वो वादे से अपने मुकर जाएगा )

---------------------------------------------------

फऊलन -फऊलन -फऊलन -फअल

ख़बर थी किसे एसा कर जाएगा |

वो वादे से अपने मुकर जाएगा |

न अब और ले इम्तहाने वफ़ा

ये दीवाना हद से गुज़र जाएगा |

चला तीर तिरछी नज़र का अगर

बचाएँगे दिल तो जिगर जाएगा |

बपा हश्र हो जाएगा उस जगह

वो जिस रास्ते पर ठहर जाएगा |

करेगा सितम के जो दौरान उफ़

निगाहों से उनकी उतर जाएगा…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 4, 2016 at 10:05am — 14 Comments

गजल(चिल्लाना क्या सन्नाटा है...)मच रही चिल्ल-पों पर

22222222
चिल्लाना क्या सन्नाटा है,
कह तो क्यूँ रे हकलाता है?1

जोड़ रहा तू कागज कितने
मुँह पर आज पड़ा चांटा है।2

लूट लिया जिसका धन तूने
फिर से काम वही आया है।3

चोर-सिपाही खेल, बता अब
किसके हित अर्थ जुटाया है?4

हँस-हँस कर का मैल बटोरा,
रोने का मौसम आया है।5

लूट लिये कितनों के सपने
अपना जाकर अब टूटा है।6

उछला-कूदा ढ़ेर जगह,पर
गड़ता जाता अब खूँटा है।7
मौलिक व अप्रकाशित @मनन

Added by Manan Kumar singh on December 4, 2016 at 8:01am — 10 Comments

सब्र है सबसे बड़ा जऱ दोस्तो(तरही ग़ज़ल)/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र :2122 2122 212

---

उसने नगमा एक गाया देर तक

ऐसे ही हमको सुनाया देर तक।



सब्र है सबसे बड़ा जर दोस्तो

आलिमों ने यह सुझाया देर तक।



इश्क है वो रास्ता जो पाक है

सोच कर मन में बिठाया देर तक।



भाग उनके ही भले सब मानते

हो बड़ों का जिनपे साया देर तक।



भूख से तड़पा बहुत है यार वो

इसलिए उसने यूँ खाया देर तक।



भूलने की सोच कर आगे बढ़ा

भूल मैं उसको न पाया देर तक।



साथ चलने की कसम खाता रहा

आस में मुझको… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 6:30am — 15 Comments

मुखौटा

मुखौटा

संसद से सड़क तक

फैले हुए मुखौटे मुँह चिढ़ाते हैं मुझे

और मैं हंसकर उनकी उपेक्षा कर देता हूँ

और मुझसे यह अपेक्षा की भी जाती है !

आखिर वो भी तो मेरी - - - सी स्सस्सस्सीईई

ढाँप लेता हूँ

कम्बल बढ़ने लगी है सर्दी

पहन लेता हूँ मुखौटा

बढ़ने लगी है भीड़ सी--- सीईईईईईईई !

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by somesh kumar on December 3, 2016 at 11:38pm — 3 Comments

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