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दुनियादारी- लघुकथा

"आज फिर तेरा मुँह सूखा सूखा लग रहा है, लगता है आज भी कुछ नहीं खाया तूने", माँ ने उसको देखते ही टोका|
"बहुत भूख लगी है माँ, कुछ खिला पहले", उसने बात को टालने की गर्ज से कहा|
"ठीक है तू हाथ मुँह धो ले, कुछ गर्मागर्म बनाती हूँ तेरे लिए", माँ तुरंत रसोई की तरफ लपकी और फिर उसका बोलना चालू हो गया "पता नहीं कब अकल आएगी इस छोरे को"|
जल्दी से गरम पकोड़े उसके सामने रखते हुए वह बोली "चाय भी बना रही हूँ, तू आराम से खा| वैसे आज तूने पैसों का क्या किया, टिफ़िन तो तू ले ही नहीं जाता"|
"बहुत अच्छे बनाती है तू पकोड़े, इतना बढ़िया कहीं नहीं मिलता", उसने जल्दी जल्दी खाते हुए कहा|
"ठीक है, इतना मस्का मत लगा, और लाती हूँ", एक बार उसके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए माँ फिर से किचेन में घुस गयी|
"ले, चाय भी पी, और बता आज पैसे कहाँ गए", माँ उसके सामने बैठ गयी|
"माँ, आज रग्घू के पास पैसे नहीं थे, उसने बोला कि सुबह से कुछ खाया नहीं है तो मैं क्या करता", उसने चाय पीते हुए कहा|
उनकी बात सुन रहे पिताजी ने अपने हाथ का अखबार नीचे रखा और उसको घूरते हुए कहा "कब समझेगा तू, जिसे देखो वही बेवकूफ बना के चल जाता है| अरे इस तरह से रहेगा तो दुनिया लूट लेगी तुझको"|
माँ ने एक बार कड़ी निगाहों से पिताजी को देखा और उठ कर उसका सर सहलाने लगी "कोई जरुरत नहीं है तुझे दुनियादारी सीखने की, तू जिंदगी भर बस ऐसे ही रहना"|
उसने एक बार निगाह उठाकर माँ की तरफ देखा और मुस्कुरा उठा| पिता ने एक लंबी सांस छोड़ी फिर से अखबार उठा लिया, उनको भी पता था कि वह कभी नहीं समझेगा|
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on December 7, 2016 at 9:18pm

बहुत बहुत आभार आ नीता कसार जी 

Comment by विनय कुमार on December 7, 2016 at 9:18pm

बहुत बहुत आभार आ शेख शहज़ाद भाई उत्साह बढ़ाने के लिए

Comment by Nita Kasar on December 6, 2016 at 8:02pm
परोपकार करने के संस्कार व संवेदनशीलता बच्चे में परिवार से ही आती है संवेदनशील कथा के लिये बधाई आद० विनय सिंह जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 6, 2016 at 7:19pm
वाह . बहुत ही उम्दा कथानक पर बढ़िया दृश्य सहजता के साथ शाब्दिक किया है आपने। कई बार बाप तो कई बार माँ या परिवार का कोई सदस्य या मित्र ही तथाकथित दुनियादारी यूं सिखाने लगता है। ज़रूरत है अपने जमीर की बात मानने की। बहुत बढ़िया प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीय विनय कुमार सिंह जी।
Comment by विनय कुमार on December 6, 2016 at 3:40pm

बहुत बहुत आभार आ मिथिलेश वामनकर जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 6, 2016 at 2:49pm

आदरणीय विनय कुमार सिंह जी,बहुत ही शानदार लघुकथा लिखी है आपने, इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें. सादर 

Comment by विनय कुमार on December 6, 2016 at 12:27pm

बहुत बहुत आभार आ सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी

Comment by विनय कुमार on December 6, 2016 at 12:27pm

बहुत बहुत आभार आ सुनील कुमार शाहाबादी जी

Comment by नाथ सोनांचली on December 6, 2016 at 3:54am
आदरणीय विनय कुमार सिंह जी आदाब, बेहतरीन लघुकथा पढने को मिलज। दिल से हार्दिक बधाई निवेदित है।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 5, 2016 at 10:17pm
नमस्कार आदरणीय विनय कुमार जी बहुत सुंदर और प्रेरक कथ्य से सजी लघुकथा बधाई आपको।

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