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राहें (सुरेश कुमार ' कल्याण ')

कंटीली राहों से
सीखा है जीना मैंने,
रात की गहराईयों से
सीखा है पीना मैंने।
बात करता हूं मैं
गुजरे वक्त की,
पत्थरों के पथ पर
पाया है नगीना मैंने।
पत्थरों से टकराकर
पत्थरों पे सिर झुकाया है मैंने।
अपनी विनम्रता की आंच से
पत्थरों को पिघलाया है मैंने।
वो हीरे मिले हों
या वो लोहा था,
सागर की लहरों के बीच
मोतियों को पाया है मैंने।

मौलिक व अप्रकाशित
सुरेश कुमार ' कल्याण '

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 24, 2016 at 7:56am — 6 Comments

वो धूप [ अतुकांत ]

चलो तलाशें 

तुम्हारे मेरे बीच की 

गुम हो गई धूप

कितनी कुनमुनी खिली खिली 

और बातून थी वो 

बोलती रहती थी 

या कहूँ कि बस 

वो ही बोलती थी 

किसी भी सूरज की 

नहीं  थी मोहताज़  

पसरी पड़ी रहती थी 

हमारे बीच  वो  डीठ   

जिद्दी इतनी कि

हर जगह चलती थी साथ 

कभी आँखों में चढ़कर 

तो कभी गालों पर 

बारिश कोहरे को चीर 

चमकती थी बेख़ौफ़ 

सर्द ठण्ड में गर्म बिछौना

और गर्मी…

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Added by pratibha pande on May 23, 2016 at 7:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल

2122-2122-212

                 ग़ज़ल   

इस तरह सब पे इनायत कीजिए

बोल कर मीठा इबादत कीजिए    

 

यूँ न दुनिया से बगावत कीजिए

दिल मिला सब से मुहब्बत कीजिए

 

चाँद छत पे आ गया तुम को नज़र

पेश अपनी अब शराफत कीजिए

 

नफरतें सारी ये मिटटी में मिलें

प्यार को ऐसी इमारत कीजिए

 

बोल भारत की जमीं तुमसे रही

माँ समझ कर कुछ तो इज्जत कीजिए 

मुनीश “तन्हा” नादौन 9882892447  (मौलिक…

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Added by munish tanha on May 23, 2016 at 7:17pm — 4 Comments

जाम रे (व्यंग कविता)

शहर के इस जाम में

पत्नी को बाइक पे टांग के

मैं जा रहा था काम से

तभी अचानक एक विक्रेता

बोला सीना तान के

छांट बीनकर माल खरीदो

बेंचू मैं कम दाम में

मैंने बोला भीड़ बहुत है

फिर आऊंगा आराम से

बोला दीदी कितनी सुंदर

उनके कुछ अरमान रे

तुम तो भइया बहुत काइयां

लगते कुछ शैतान रे

पहले बोलो क्यूं हो खोले

शॉप बीच मैदान में

हंसकर बोला खाकी वर्दी

साथ निभाए शान से

गाउन, मैक्सी,पर्स खरीदो

करते क्यूं परेशान रे

तभी…

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Added by NEERAJ KHARE on May 23, 2016 at 3:30pm — 5 Comments

नालायकी (लघुकथा)

"अब मुँह लटकाये क्यों बैठी हो? पहले ही कहा था कि हवा में न उड़ो, न उड़वाओ बेटे को!"



"........."



"कुछ कह रहा हूँ, सुना कि नहीं? कितना समझाया था कि ज़्यादा लाड़-दुलार ठीक नहीं। फ़रमाईशें पूरी करके उसे बिगाड़ो नहीं! झूठी तारीफ़ें कर उसे हवा में उड़ना मत सिखाओ! मान का ताप ऐसे नहीं बढ़ाओ, पसीने छूट जाएंगे! मान झूठी शान से नहीं मिलता, अच्छे काम से मिलता है समझीं। फैशन परस्ती, आडम्बर से नहीं!"



पति देव चिल्लाये जा रहे थे, पत्नी सिर झुकाये सुनती जा रही… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 23, 2016 at 1:22pm — 2 Comments

हमें कहाँ हर वक्त याद रहता है मज़हब अपना

सज़दे में सर झुकता है मेरा
राह चलते जहाँभी दरगाह मिली
तुम्हारे मन भी तो इज़्ज़त है
मेरे शंकर और मेरे राम की
जब उर्स होता है तो मैं भी
आती हूँ चादर चढ़ाने को
दशहरे में तुम भी जाते हो
रावण जलाने को
हमें कहाँ हर वक्त याद रहता है
मज़हब अपना
हाँ सियासत नहीं भूलती
मैं हिन्दू तू मुसलमान है
अब ये अलग बात है कि
मैं अगर इज़्ज़त हूँ
अपने भारत की
तो तू भी 
हिन्द का सम्मान है ।
तनूजा उप्रेती

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Tanuja Upreti on May 23, 2016 at 1:10pm — 2 Comments

पगली लड़की

मैले-कुचले कपड़ो में सड़के के किनारे प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी,उसे तो समझ में भी नहीं आ रहा था कि उसके शरीर में परिर्वतन क्‍यों आया, क्‍यों हो रही है ये पीड़ा उसे,क्‍यों बढ़ा है उसके उदर आकार, मगर प्रकृति ने जो मानव जीवन के नियम बना दिये जो क्रिया बना दिया वह होगा जाने या अंजाने, अमीर या गरीब, मानसिक परिपक्‍त या अर्ध विक्षिप्‍त , तभी एक जीव उसके शरीर से बाहर आया एक उसी के तरह के उस छोटे जीव को देख कर आश्‍चर्य चकित रह गयी। उसे क्या पता था कि समाज में कुछ ऐसे…

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Added by Akhand Gahmari on May 22, 2016 at 9:41pm — 2 Comments

दुर्मिल सवैया

दुर्मिल सवैया.

 

 

बदली - बदली मुख फेर लिया जब सूरज लालमलाल हुआ,

वन शुष्क हुआ हर एक हरा सच शुष्क भरा हर ताल हुआ,

तन शुष्क हुआ मन शुष्क हुआ हर ओर भयंकर हाल हुआ,

जब घाम बढ़ा तब सत्य कहूँ यह हाल बड़ा विकराल हुआ ||

 

 

तन ताप लिए तन आग लिए सब व्याकुल हैं तन प्यास लिए,  

दिन मानव के खग के वन के पशु के कटते बस आस लिए,

सब सोच रहे अब ग्रीष्म टले बरसे बदली मृदु भास लिए,  

निकले फिरसे बरसात लिए दिन सावन भादव मास लिए…

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Added by Ashok Kumar Raktale on May 22, 2016 at 3:40pm — 6 Comments

नज़्म - मेरी परी

हाँ वो ख्वाब हैं 

वो ख्वाब ही हैं जब तुम 

तख़य्युल के परों से उड़ते 

चाँद का नूर चुरा लाती हो 

और तोड़ कर बादलों के रेशमी टुकड़े 

गूंध कर उनको चांदनी में फिर 

किसी अनजान ज़मीं पर उसके 

महल तामीर किये हैं तुमने 

और उन महलों में बसा रखें हैं वो सारे मंज़र 

जो हक़ीक़त में बदल जाएं तो 

दर्द दुनिया से चले जाएं हमेशा के लिए

हाँ वो ख्वाब हैं जब तुम 

चेहरे पे हवाओं की शोखियाँ…

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Added by saalim sheikh on May 22, 2016 at 11:37am — 3 Comments

इक जान हो जाएगी ....

इक जान हो जाएगी ....

बड़ा अज़ीब मंज़र होगा

जब बहार आएगी

हर गुलशन

गुलों की महक से

लबरेज़ होगा

सब कुछ नया नया होगा

हर गुल में

तू मेरा अक्स ढूंढेगी

हर पंखुड़ी में कसमसाती

मैं तेरी उठान देखूँगा

कितना सुखद अहसास होगा

जब मेरी नज़रों के लम्स

तेरे जिस्म से गुफ़्तगू करेंगे

तेरा हिज़ाब

तुझसे अदावत करेगा

तेरे लबों पे

तिलभर हंसी की जुम्बिश…

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Added by Sushil Sarna on May 21, 2016 at 10:00pm — 4 Comments

नूरानी चेहरे ( लघुकथा) _शेख़ शहज़ाद उस्मानी

दंगों और भगदड़ से पीड़ित लोगों को मस्जिद में पनाह देने के बाद मौलवी साहब की आंखें यह देखकर फटी जा रहीं थीं कि औरतों ने स्वयं ही बच्चों की अलग पंक्ति बना दी थी और स्वयं पृथक पंक्तिबद्ध शांतिपूर्वक बैठ गईं थीं। पुरुष भी थोड़ा फासला रखकर पंक्तियों में ऐसे बैठ गए थे जैसे कि मानो नमाज़ अदा कर रहे हों। महिलाओं ने भी मुस्लिम औरतों की तरह पल्लू सिर व छाती पर लेकर वैसी ही मुद्रा बना ली थी। सभी अपने धार्मिक मंत्रोच्चारण कर रहे थे। पंडित जी यह सब देख कर मुस्करा रहे थे। उनको संतोष था कि अब सब ठीक है। मौलवी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 21, 2016 at 9:50am — 13 Comments

प्यास

पानी नहीं है , प्यास लगी है 

मुन्ने को देखो प्यास लगी है 

घर के सारे  घड़े खाली पड़े है 

बाहर के नल भी सूखे पड़े है 

मुन्ने को मैं कैसे समझाऊं

प्यास उसकी मैं कैसे बुझाऊं 

गर्मी भी तो बढ़ रही है 

बस्तियां जैसे जैसे गढ़  रहीं है 

वन उपवन हमने काट दिए है 

और जाने कितने विनाश किये है 

अब भुगत रहे मासूम यह बच्चे 

कौन समझें यह तो अक्ल के कच्चे 

अक्ल वाले सब कहाँ गए…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 20, 2016 at 11:00pm — 1 Comment

मंजिल

मित्रों-सहयोगियो, तुम
रूको तो सही,
भागते हो किधर? कुछ
सुनो तो सही।

आसमां के तारों को,
तुम देखो तो सही।
चांद नजर आएगा,
तुम पहचानो तो सही।

चांद ही मेरी मंजिल है,
कदम बढाओ तो सही।
मंजिल मिल जाएगी हमें,
हिम्मत जुटाओ तो सही।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 19, 2016 at 5:12pm — 14 Comments

दिल पे दस्तक

दिल पे दस्तक जो दूँ तो बुला लिजिए

दूर रहने की अब ना सजा दिजिए

मेरे नयनो की आप रोशनी हो बनी

आप बिन कुछ ना देखूँ है खुद से ठनी

ज्योति को यूँ ना दृग से जुदा किजिए

दिल पे दस्तक .......

मद में ही मै भटकता रहा दर-बदर

रास आई तन्हाई मुझे इस कदर

इस तन्हाई को अपना पता दिजिए

दिल पे दस्तक .......

दिल में दर्दे हिज्र की अब तामीर हो रही

ख्वाब में आपके मेरा जिक्र भी नही

दश्ते-बेकसी से अब तो फना किजिए

दिल पे दस्तक…

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Added by Pawan Kumar on May 19, 2016 at 11:30am — 8 Comments

भूख (लघु कथा )

ठाकुर सरकार,  माफ़ कर दें . मेरी बिटिया अभी नासमझ है .तीन दिन से चूल्हा नहीं जला सरकार .’

‘क्यों चूल्हे को क्या हुआ ?’

‘सरकार, उनका पुलिस चोरी के शक में पकड़ ले गयी , वही कुछ कमा कर लाते थे, घर् में कुछ था ही नहीं तो चूल्हा कैसे जलता?’

‘और---- तेरी बिटिया ने भी तो चोरी ही की है , तुम सब घर भर चोर हो तो माफी कैसी ?’

‘नहीं सरकार, उन्होंने चोरी नहीं की, पुलिस साबित नहीं कर पायी ‘

‘मगर तुम्हारी बेटी तो चोरी करती पकड़ी गयी .’

’हाँ सरकार मगर-----‘

‘अब…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 18, 2016 at 9:30pm — 28 Comments

ग़ज़ल -- पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--2122--212



पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया

ज़लज़ला कुछ बेबसों के सारे गौहर ले गया



ज़िन्दगी के खुशनुमा लम्हों से वो महरूम है

शाम को जो साथ अपने घर में दफ़्तर ले गया



हौसला, हिम्मत, ज़वानी, ख़्वाहिशें, बे-फिक्र दिल

वक़्त का दरिया मेरा सब कुछ बहा कर ले गया



सारी दुनिया जीत कर भी हाथ खाली ही रहे

वक़्त-ए-रुख़सत इस जहाँ से क्या सिकन्दर ले गया



छु न पाये हाथ उसके जब मेरी दस्तार को

तैश में आकर वो काँधे से…

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Added by दिनेश कुमार on May 18, 2016 at 5:30pm — 29 Comments

इंतज़ार ....

इंतज़ार ....

ये बादे सबा

आज किसकी सदा लाई है

कुछ कम्पन्न है

कुछ नमी है

कुछ भीगी सी तन्हाई है

शायद ! अधूरे अहसासों ने

ज़हन में करवट ली है

लफ्ज़ लबों की हदों पर

तिश्नगी के अज़ाब में

डूबे नज़र आते हैं

इन साँसों की बेचैनियों में

जाने किस अजनबी का ख़ुलूस

करवटें लेता है

ये मेरी तदब्बुर में

किसके लम्स रक्स करते हैं

कोई तो नाख़ुदा होगा

जो मेरी हयात के सफ़ीने को

साहिल तक ले जाएगा

दबे पाँव आकर

मेरी…

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Added by Sushil Sarna on May 18, 2016 at 4:32pm — 16 Comments

गज़ल - जिन्दगी का सफ़र खूब है

जिन्दगी का सफर खूब है,

मैं हूँ तनहा , मगर खूब है.

 

जिन्दगी कट रही शान से ,

ये सुहाना सफ़र खूब है .

 

क्या कहूँ मैं शबे-वस्ल को,

वो जगा रात भर खूब है.

 

प्यार की इंतिहा हो गई,

बेकरारी उधर खूब है .

 

हर दिशा में चमकता रहा ,

ये गणित का सिफर खूब है.

 

खार के साथ हैं फूल भी, ,

 कंटकों की डगर खूब है

 

मानता हूँ मैं "आभा"तुझे,

वाह! तेरी नज़र खूब…

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Added by Abha saxena Doonwi on May 18, 2016 at 8:30am — 11 Comments

घर

166
लोहा ईंट और कंक्रीट का 
व्यवस्थित संग्रह , या
बाॅंस और मकोर के तने की कमानी पर
सागौन के पत्तों का विग्रह?
संगमर्मर और मोजेक से चमकते फर्श पर 
सजे फर्नीचर, कालीन व अन्य चीजें,
या
पीली मिट्टी  और गोबर से लिपे
समतल, चैकोर या गोल गोल भूमि तल,
कामकाजी वस्तुओं को  बाहों में लिये
आॅंगन के किनारे लगे आम पर गाती कोयल?
केवल रात काटने के लिये एकत्रित…
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Added by Dr T R Sukul on May 17, 2016 at 11:00pm — 10 Comments

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