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वो धूप [ अतुकांत ]

चलो तलाशें 

तुम्हारे मेरे बीच की 

गुम हो गई धूप

कितनी कुनमुनी खिली खिली 

और बातून थी वो 

बोलती रहती थी 

या कहूँ कि बस 

वो ही बोलती थी 

किसी भी सूरज की 

नहीं  थी मोहताज़  

पसरी पड़ी रहती थी 

हमारे बीच  वो  डीठ   

जिद्दी इतनी कि

हर जगह चलती थी साथ 

कभी आँखों में चढ़कर 

तो कभी गालों पर 

बारिश कोहरे को चीर 

चमकती थी बेख़ौफ़ 

सर्द ठण्ड में गर्म बिछौना

और गर्मी में ठंडी छाँव 

थी वो धूप

उससे पहले कि

चुप्पी की सीलन आदत बन जाये

चलो ढूंढ लाते हैं उसे  

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment by kanta roy on June 23, 2016 at 7:45pm
हर जगह चलती थी साथ
कभी आँखों में चढ़कर
तो कभी गालों पर
बारिश कोहरे को चीर
चमकती थी बेख़ौफ़ ------ अद्वितीय पंक्तियाँ है यहाँ ।

धूप की कुनमुनाहट को बेहतरीन शब्दों से बड़ी कोमल चित्रांकन किया है आपने ।


उससे पहले कि
चुप्पी की सीलन आदत बन जाये
चलो ढूंढ लाते हैं उसे -----वाह ! क्या खूबसूरत भाव गढ़े है आपने । शब्द हृदय को छूकर निकल गये है ।
बातूनी की चूप्पी भी बहुत खलती है कभी कभी , इसलिए चुप होना सदा के लिए आदत ना बन जाये उसका ढूंढ लाना जरूरी हैै ।
बहुत बहुत बधाई आपको इस भावपूर्ण रचना के लिए ।
Comment by shree suneel on June 2, 2016 at 9:06pm
इस ख़ूबसूरत कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई आपको आदरणीया प्रतिभा पांडे जी..
Comment by pratibha pande on May 26, 2016 at 6:35pm

आपको कविता अच्छी लगी  हार्दिक  धन्यवाद  प्रिय राहिला जी , शोध की बात भी आपने खूब कही  वाह 

Comment by pratibha pande on May 26, 2016 at 6:28pm

  हार्दिक आभार आदरणीय बशर भारतीय जी 

Comment by pratibha pande on May 26, 2016 at 2:23pm

 रचना पर उपस्थित होकर स्नेहिल हौसला अफजाई के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीय सुशील सरना जी ..सादर 

Comment by pratibha pande on May 26, 2016 at 2:19pm

  हार्दिक  आभार  आदरणीय समर कबीर जी ,  सादर 

Comment by Rahila on May 26, 2016 at 11:59am
इस धूप पर चुप्पी और ऊब के बादल क्यूं छा जाते है?ये शोध का विषय है यदि आप को पता चले तो सांझा करियेगा कविताओं के जरिये । बहुत ही खूबसूरत कविता आद. प्रतिभा दी! खूब बधाई ।सादर
Comment by बशर भारतीय on May 26, 2016 at 10:45am
'वो धूप' वाह धूप की चंचलता मन मोह गई अच्छी कविता है आ.प्रतिभा पाँडे जी बधाई आपको
Comment by Sushil Sarna on May 25, 2016 at 3:25pm

उससे पहले कि
चुप्पी की सीलन आदत बन जाये
चलो ढूंढ लाते हैं उसे


वाह आदरणीया प्रतिभा जी गज़ब के अहसासों को संजोए इस हृदयस्पर्शी प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by Samar kabeer on May 25, 2016 at 2:58pm
मोहतरमा प्रतिभा पांडे जी आदाब,बहुत सुंदर अतुकांत कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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