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अभिलाषा (व्यंग्य कविता)

चाह नही मेरी कि मैं ,अफसर बन सब पर गुर्राउं।
चाह नही मेरी कि मैं ,सत्ता में दुलराया जाऊं।।
लाल बत्ती की खातिर मैं ,अपनों का न गला दबाऊं।
गरीब जनों की सेवा करके ,आशीर्वाद उन्हीं का पाऊं।।
बड़े हमेशा बड़े रहेंगे ,छोटों को भी बड़ा बनाऊँ।
हर एक बच्चा बने साक्छर ,रोजगार के अवसर लाऊँ।।
मिटे गरीबी आये खुशहाली ,ऐसी मैं एक पौध लगाऊँ।।

.
(नीरज खरे)
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on June 6, 2016 at 7:30am — 3 Comments

कविता (माँ)

हे माँ तेरे चरणों की मैं धूल कहाँ से लाऊंगा,

रग रग में तू बसी हुई मैं भूल कहाँ से पाऊंगा।



तिनका तिनका बड़ा हुआ मैं ममता की इन छाँव में,

बात बात पर मुझे सिखाती किताब कहाँ से लाऊंगा।।



सबसे लड़ती मेरी खातिर गली मोहल्ले गांव में,

अब सब बन गए मेरे दुश्मन कैसे मैं बच पाउँगा



याद है एक दिन तूने मुझको यही पाठ सिखलाया था,

भाव सरल और मधुर वचन का सच्चा पाठ पढ़ाया था।।



दीन दुःखी की सेवा कर फिर जग में नाम कमाया था,

बनकर तेरे जैसा मैं अब कुछ…

Continue

Posted on May 31, 2016 at 9:00am — 5 Comments

जाम रे (व्यंग कविता)

शहर के इस जाम में

पत्नी को बाइक पे टांग के

मैं जा रहा था काम से

तभी अचानक एक विक्रेता

बोला सीना तान के

छांट बीनकर माल खरीदो

बेंचू मैं कम दाम में

मैंने बोला भीड़ बहुत है

फिर आऊंगा आराम से

बोला दीदी कितनी सुंदर

उनके कुछ अरमान रे

तुम तो भइया बहुत काइयां

लगते कुछ शैतान रे

पहले बोलो क्यूं हो खोले

शॉप बीच मैदान में

हंसकर बोला खाकी वर्दी

साथ निभाए शान से

गाउन, मैक्सी,पर्स खरीदो

करते क्यूं परेशान रे

तभी…

Continue

Posted on May 23, 2016 at 3:30pm — 5 Comments

दबी आवाज़ (लघु कथा)

हमेशा खुशमिजाज रहने वाली माँ को आज गंभीर मुद्रा में देखकर मैनें कारण जानना चाहा तो वो बोली- बेटा तुम भाइयों में सबसे बड़े हो इसलिय तुमसे एक बात करना चाहती हूँ| हाँ-हाँ बोलो माँ मैनें उत्सुकता पूर्वक जानना चाहा|माँ ने दबी आवाज़ में कहना प्रारंभ किया-बेटा तुम्हारा अपना मकान लखनऊ में और बीच वाले का वाराणसी मे बना गया है किंतु तुम्हारा तीसरा भाई जो सबसे छोटा है उसका न तो अपना मकान है और न वो बनवा पायगा कियोंकि वो कम किढ़ा लिखा होंने के कारण अछी नौकरी न पा सका|तो क्या हुआ माँ ये आप और बाबूजी का…

Continue

Posted on January 26, 2014 at 8:30pm — 12 Comments

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