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आबोहवा (लघुकथा)

बस स्टैंड पर बस से उतरते ही सुखिया का चेहरा खिल उठा। पिताजी टैक्सी वाले से बात करने लगे, तो उसने टोकते हुए कहा- "नहीं बापू, हम पैदल ही चलेंगे, हम शहर घूमते हुए चलेंगे, सामान भी कोई ज़्यादा नहीं है न!"

" न बेटा, टैक्सी वाले ने बताया है कि मानस भवन तो बहुत दूर है! शहर बाद में घुमा देंगे!"-

पिताजी ने कहा।

फिर दोनों टैक्सी पर सवार हो गए। जैसे ही टैक्सी ने रफ़्तार पकड़ी, सुखिया पहले तो सपनों में खो गया, फिर गाड़ियों की आवाज़ों और होर्न के शोरगुल ने उसे बेचैन कर दिया। पिताजी ने उसे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 17, 2016 at 10:00pm — 16 Comments

कितनी ज़्यादा ख़ुशी पे पाबंदी (ग़ज़ल)

2122 1212 22



क्या लगी मैक़शी पे पाबंदी

यूँ लगे, ज़िन्दगी पे पाबंदी



जो लगा दे तो मर ही जाऊँ मैं

गर कोई शाइरी पे पाबंदी



ग़म की सीमा रही नहीं कोई

कितनी ज़्यादा ख़ुशी पे पाबंदी



वो लगाते ज़ुबान पर ताला

और फिर ख़ामुशी पे पाबंदी



बम-पटाखों पे कोई रोक नहीं

आजकल छुरछुरी पे पाबंदी



खेल लो खेल ख़ूब क़ुदरत से

क्यूँ लगे त्रासदी पे पाबंदी



मेरे दुश्मन हैं इंतज़ार में "जय"

कब लगे दोस्ती पे… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 17, 2016 at 6:58pm — 11 Comments

धर्म का ग्राफ / कविता

मन्दिर में मूर्ति का
रंग बदल रहा है
धर्मवर्धन के लिए
कर्म का ग्राफ भी बदल रहा है
धर्मानुयायी अपने - अपने चीथड़े उतार
मंदिर के चारों ओर टाँग कर
धर्म -कांड में लीन हो गये है
अब मटमैले मंदिर में 
पाप की मटियाली छायाएँ
चूने के पानी-सी  बुदबुदाती 
मंदिर के चेहरे से  धीमे - धीमे
उतर रही है ,टप ,टप ,टप .....

मौलिक और अप्रकाशित

Added by kanta roy on May 17, 2016 at 4:57pm — 8 Comments

चोचले (लघुकथा )राहिला

"देख जरा कैसी मशहूर होकर देश-विदेश में चर्चा का विषय बन गई अपनी शादी । और तो और पूरे दो लाख खर्च किये मालिक ने हमारी शादी पर।"

"हूंहsss...।"उसने बुरा सा मुंह बनाया ।

"क्यूं तुझे खुशी ना हो रही?तू टी.व्ही. पर आयेगी,अखबार में छपेगी ।"

"देखो..,अगर तुम ये सोचकर खुश हो रहे हो कि हमारी शादी हो जायेगी और मैं हमेशा के लिये खूंटा गाड़ कर सिर्फ तुमसे बंधी रहूंगी तो ये ख्याल अपने दिलोदिमाग से निकाल दो ।मैं इन इंसानो के चोचलों में अपनी आजादी, अपना जन्म सिद्ध अधिकार नहीं खो सकती ।… Continue

Added by Rahila on May 17, 2016 at 3:53pm — 13 Comments

ग़ज़ल~मुहब्बत की राहों में

(122 122 122 122)

ये सोचा है समझा है परखा बहुत है।
मुहब्बत की राहों में धोखा बहुत है

ये मदमस्त तेरी निगाहें कसम से
तिलिस्म इनमें कोई तो रक्खा बहुत है।

जो छिपता है मुझसे उसे क्या है मालूम?
उसे मैंने छिप छिपके देखा बहुत है

न जन्नत की बातें न दैर-ओ-हरम ही
दिवानों को तेरा झरोखा बहुत है।

किसी रोज मिलने कभी तुम भी आओ
तेरे शहर ने मुझको देखा बहुत है।

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 17, 2016 at 12:42pm — 14 Comments

ग़ज़ल 212 – 212 – 212 – 212

212 – 212 – 212 – 212 ग़ज़ल

किस तरह आप से मैं कहूं प्यार है

जिक्र से ही हुआ दिल जो गुलज़ार है

आपका साथ है और क्या चाहिए

आप ही का बना दिल तलबगार है

जान लो तुम  मुहब्बत तो  है इक बला

इस से बचना बड़ा ही तो दुशवार है

रोग उसको अचानक ही समझो लगा

अब बना घूमता वो तो अख़बार है

जब हकीकत समझ आई तो देर थी

जो हुआ सो हुआ अब तो इकरार है

हुस्न ने लूट लाखों लिए सोच कर

हो गया इक नया जख्म सरकार है

मुनीश…

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Added by munish tanha on May 17, 2016 at 10:30am — 6 Comments

युग है , उसी को समर्पित -क्षणिकाएँ- डॉo विजय शंकर

1 .

भगवान है ,

कैसे भी पूजो

चलता है ,

ये तो शैतान है

जिसको

पूजने के तरीके

निराले है।



2 .

झूठ है ,

सब जानते हैं

झूठ का सच

सब जानते हैं

फिर भी किस कदर

अनजान बनते हैं ..............



3 .

आदमी आज का

कल पुर्जों सा ,

जीवन उसका , यांत्रिक ,

संवेदनशीलता से मुक्त ,

मशीनें बेहद सेंसिटिव,

सम्भाल के , कलयुग है …………



4 .

वफ़ा के प्रतीक कुत्ते

गली गली मिल जाते… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on May 17, 2016 at 10:20am — 14 Comments

गुंचा गुंचा गुलाब हो जाये

२१२२    १२१२    २२/112

गुंचा गुंचा गुलाब हो जाये 

सारा पानी शराब हो जाये 

उसके वालिद को देख इश्क मेरा 

हड्डी वाला कबाब हो जाये

क्या जरूरत है खोलने की लब 

जब नजर से जबाब हो जाये

मेरी नजरों के रुख पे पड़ते ही

हाथ उसका नकाब हो जाये

साथ उनके गुजारे जो लम्हे

लिख सकूँ तो किताब हो जाये

साक़िया बात कल की कल होगी

आज का तो हिसाब हो जाये

आज जीभर…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 17, 2016 at 9:30am — 20 Comments

तराजू (गीत)

चल तौल तराजू रिश्तों को 

कुछ अपने पराये नातो को ...



एक तरफ चढा ले माँ को ही 

सबसे प्यारा ये रिश्ता है 

कचरों के डिब्बों में फिर क्यों 

शिशुओं को फेंका जाता है

चल ...........



एक तरफ भाई और बंधू ले 

फिर जर जमीन पर क्यों झगड़े है 

पैसा धन दौलत पर से  क्यों 

सर अपनों के काटे जाते है

चल .........



एक तरफ जीवन साथी ले 

ये जनम जनम का नाता है

तो तलाक फिर क्यों होते है 

संग रहकर भी दुश्मन बनते है

चल…

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Added by babita choubey shakti on May 16, 2016 at 10:00pm — 3 Comments

महाकाल दर लगो सिहस्थ (आल्हा छंद)

महाकाल दर लगो सिहस्थ है जनमन रहो हर्षाय

उज्जैनी नगरी देखो आज दुल्हनिया सी रही सुहाय

पितृ मिलन खो रेवा आई महाकाल रहे हर्षाय

शिप्रा रानी चरण पखारे., मिलन अनोखा रही कराय

एक और से गोरा रानी, लेय बलैेया नजर उतार

दूजी और गणराज हर्ष के, बहनी को है रहे निहार

कुम्भ मिलन खो सभी देवता सज धज आये खेवनहार

मित्र सुदामा राह तकत है, मित्र मिलन की प्यास जगाये

सांदीपनी घर मनमोहन आये शिक्षा रही यही पे पाय...

ब्रह्म बिष्णु नारद संग, राधे संग श्याम सरकार

सियाराम…

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Added by babita choubey shakti on May 16, 2016 at 9:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल (गुलशन के लिए )

ग़ज़ल (गुलशन के लिए )

------------------------------

2122 --2122 --212

जो चुने तिनके नशेमन के लिए ।

जल गए वह रात गुलशन के लिए ।

ख़ार मुरझाते नहीं गुल की तरह

क्यों नहीं चाहूँ मैं दामन के लिए ।

उनको ही शायर समझता है जहाँ

जिन के ईमां बिक गए धन के लिए ।

रास्ते तन्हा कभी कटते नहीं

लाज़मी साथी है जीवन के लिए ।

क्या पता कब दिल पे कर जाए असर

मैं वफ़ा रखता हूँ दुश्मन के लिए…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 16, 2016 at 9:28pm — 6 Comments

आवारगी – ( लघुकथा ) -

आवारगी – ( लघुकथा )  -

 मुंबई जाने वाली एक्सप्रेस गाडी में टिकट चैक करने पर टी सी गोस्वामी जी को दो लडके बारह तेरह साल की उम्र के बिना टिकट मिले!

"कहां जा रहे हो"!

"शहर"!

"कौनसे शहर"!

"मालूम नहीं, जहां तक गाडी लेजाय"!

"टिकट क्यों नहीं लिया"!

"साब टिकट के पैसे नहीं थे!तीन दिन से कुछ खाया भी नहीं है!गॉव में सूखा और अकाल है!भुखमरी फ़ैली है!सोचा था शहर जाकर कहीं ढावा या होटल में वर्तन धोने का काम कर लेंगे तो रोटी तो मिलती रहेगी"!

"अब बिना…

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Added by TEJ VEER SINGH on May 16, 2016 at 7:06pm — 16 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल2122-1212-22
अब तो चेहरा गुलाब लगता है
ना पढ़ी वो किताब लगता है
दर से तेरे खुदा असर पाया
रात दिन अब सबाब लगता है
जब से डूबी है सोहनी इसमें
मुझको कातिल चिनाब लगता है
खुश वो दिखता बहुत है अब सबको
जख्म गहरा जनाब लगता है
प्यार के नाम पर करे झगड़ा
सोच के ही इताब लगता है
मुनीश 'तन्हा'....नादौन...9882892447
मौलिक व अप्रकाशित

Added by munish tanha on May 16, 2016 at 6:04pm — 2 Comments

फ़रेबी रात …

फ़रेबी  रात …

छोडिये साहिब !

ये तो बेवक्त

बेवजह ही

ज़मीं खराब करते हैं

आप अपनी अंगुली के पोर

इनसे क्यूं खराब करते हैं

ज़माने के दर्द हैं

क्योँ अपनी रातें

हमारी तन्हाई पे खराब करते हैं

ज़माने की निगाह में

ये नमकीन पानी के अलावा

कुछ भी नहीं

रात की कहानी

ये भोर में गुनगुनायेंगे

आंसू हैं,निर्बल हैं

कुछ दूर तक

आरिजों पे फिसलकर

खुद-ब-खुद ही सूख जायेंगे

हमारे दर्द हैं

हमें ही उठा लेने दीजिये…

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Added by Sushil Sarna on May 16, 2016 at 4:31pm — 6 Comments

ग़ज़ल- काम आईँ नही दवाएँ क्यूँ

2122 1212 22



बेअसर हो गईं दवाएँ क्यूँ

काम आईं नहीं दुआएँ क्यूँ



हम ग़लत फ़हमियों में आएँ क्यूँ

दोस्त है वो तो आज़माएँ क्यूँ



आँख तक आँसुओं को लाएँ क्यूँ

ज़ब्त की एहमियत गिराएँ क्यूँ



साँस दर साँस एक ही सरगम

दूसरा गीत गुनगुनाएँ क्यूँ



जिसके सीने में दिल हो पत्थर का

उसकी चौखट पे गिडगिडाएँ क्यूँ



वक्त आने पे जान जाएगा

इश्क़ क्या है उसे बताएँ क्यूँ



हो गईं क्या समाअतें कमज़ोर

कोई सुनता नहीं सदाएँ…

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Added by Rahul Dangi Panchal on May 16, 2016 at 12:00am — 12 Comments

ग़ज़ल~ तेरे आगे

(1122।1212।1212)



तेरे आगे मेरा जो हाल था सो है।

तेरी चाहत तेरा मलाल था सो है।



तू मेरी ज़िन्दगी बनेगी एक दिन

दिलेफित्ना का ये खयाल था सो है।



तेरी हसरत तेरी दिवानगी जुनून

तू मुझे साहिबे-कमाल था सो है 



यूँ गमों ने की बारिशें बहुत मगर

जो रगों में मेरे उबाल था सो है।



न रही तेरे दिल में पहले सी वफ़ा

न सही, मुझको ये बवाल था सो है



वही क़ातिल वही गवाह और सितम

वही मुंसिफ वही सवाल था सो है।



(मौलिक व्… Continue

Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 15, 2016 at 9:57pm — 8 Comments

​ग़ज़ल ..भूख के चर्चे हुये हैं मुफलिसी की बात है...

2122        2122       2122      212



हो बड़े मगरूर अपनी जीत मेरी हार में

हम लुटा देते हैं हस्ती प्रेम के व्यापार में

भूख के चर्चे हुये हैं मुफलिसी की बात है

वांच ली सारी किताबें क्या रखा है सार में

गीत बैठे तक रहे हैं झनझनाहट तार की

क्या जुगलबंदी हुई है राग सुर औ प्यार में

बाँध कर सिर पे कफ़न हैं चल पड़े कुछ…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 15, 2016 at 8:30pm — 10 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122 212

सैर करना हो रहा हावी बला की वार पर

चौखटें कब लाँघती वह बिलबिलाती द्वार पर।1



ध्यान केंद्रित कीजिये आचार फिर आहार पर

शर्करा कम लीजिये नजरें रखें जी खार पर।2



तेल-घी कुछ कम चपोड़ें सादगी सबसे भली

दाल-रोटी सब्जियाँ फल बात बनती चार पर।3



रात को बिस्तर लगाना जल्द होना चाहिए

ध्यान रहना चाहिए रोजी तथा व्यापार पर।4



त्यागिये बिस्तर सबेरे ताजगी देती हवा

भागिये मैदान में कर रोग- बाधा द्वार पर।5

मौलिक व… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 15, 2016 at 7:00pm — 6 Comments

मिलन / गद्यगीत पर एक प्रयास

जैसे ही धरती को छूने आकाश नीचे सरक कर आया कि अपने में सिमटती धरती घुटनों पर झुक गई।

ऊँचे - ऊँचे पहाड़ों में ,निस्पंद- सा देवदार अपने ही साये में सिमटकर खड़ा रहा। पहाड़ों को भी अब अपनी अलंध्यता गलत साबित हो रही थी । उल्लासमय वातावरण में

मायावी संगीत-सी , अलग - अलग ताल ,अलग - अलग रंगों में सपने ,एक अविस्मृत अद्भुत मायाजाल -सी फैला गई । मोह - पाश का बँधन और मुक्ती की यातनामय चाहना , धूप के संग -संग पल -छिन उजालों के रंगों का भी बदलना , मन की अतल गहराईयों से निकलकर उगते चाँद पर सिन्दूरी रंग… Continue

Added by kanta roy on May 15, 2016 at 11:39am — 9 Comments

लौट आओ साजन सावन के पहले - (अरुणेन्द्र मिश्र)

वो लम्हे विरह गीत न बन जाये

लौट आओ साजन सावन के पहले

पपिहा पीऊ पीऊ आवाज लगाये

पेडो पर पड गये झुले

कजरी लागे मोहे सौतन

बदरा की बुन्दे जलये तन मन

लगी है प्रित मेरी अब अशुअन से

लौट आओ साजन सावन के पहले

 

जोगन न बन जाये कही ये बिरहन

लौट आओ साजन सावन के पहले

 

 

मुख मलिन , जैसे काली बदरिया

पनघट पे ना रिझाये कोइ सवरिया

सुनी सुनी पडी है पुरी डगरिया

आंगन सुना, सुना भयॊ मेरे मन का…

Continue

Added by arunendra mishra on May 14, 2016 at 7:30pm — 3 Comments

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