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arunendra mishra
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Dr Ashutosh Mishra commented on arunendra mishra's blog post लौट आओ साजन सावन के पहले - (अरुणेन्द्र मिश्र)
"आदरणीय अरुणेन्द्र जी इस सुंदर गीत के लिए ह्रदय से बधाई स्वीकार करें सादर बधाई के साथ "
May 17
सतविन्द्र कुमार commented on arunendra mishra's blog post लौट आओ साजन सावन के पहले - (अरुणेन्द्र मिश्र)
"भावपूर्ण रचना के लिए बधाई।कई स्थानों पर वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ भी हैं।और नीचे आपका नाम भी है! सादर"
May 15
रामबली गुप्ता commented on arunendra mishra's blog post लौट आओ साजन सावन के पहले - (अरुणेन्द्र मिश्र)
"भाई भाव तो बहुत सुंदर हैं किन्तु मात्राबंद और तुकांतता का निर्वाहन नही हो रहा। पुनः देखने का आग्रह है।"
May 14
arunendra mishra posted blog posts
May 14
arunendra mishra commented on arunendra mishra's blog post तब मन मे बैराग्य हुआ
"आदरणीय, गुरुवरो , धन्यवाद , त्रुटियो हेतु छ्मा ..बहुत सामय से हिन्दी लेखनी एवंम पठ्ने  दोनो से दूर रहा , इसी का परिणाम त्रुटियो के रुप मे दिखाइ देता है..... आपके दिये सुझावो पर अमल का पुरा प्रयास करुन्गा"
May 14
रामबली गुप्ता commented on arunendra mishra's blog post तब मन मे बैराग्य हुआ
"आपके सुंदर भावों के सम्प्रेषण हेतु ही आपको बधाई बंधुवर किन्तु गेयता और प्रवाह के दृष्टिकोण से यह किसी भी प्रकार मुझे कविता या गीत प्रतीत नही होता। इससे बेहतर होता कि आप ने इसे अतुकांत लिखा होता। किन्तु आपका प्रयास और शब्द चयन सराहनीय है। कतिपय…"
May 7
Samar kabeer commented on arunendra mishra's blog post तब मन मे बैराग्य हुआ
"जनाब अरुणेन्द्र मिश्रा जी आदाब,प्रस्तुति अच्छी लगी,बधाई स्वीकार करें,गुणिजनों की बातों पर अवश्य ध्यान दें ।"
May 6
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on arunendra mishra's blog post तब मन मे बैराग्य हुआ
"मेरी समझ में आपकी आयु के हिसाब से कविता बहुत अच्छी है . मेरा एक गीत है = उसने यूँ ही कहा गीत रचता हूँ मैं , आप हैं कि मुझे आजमाने लगे यह हुनर तो मिला है मुझे जन्म से मांजने में इसे पर जमाने लगे . स्नेह ."
May 6

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर commented on arunendra mishra's blog post तब मन मे बैराग्य हुआ
"आदरणीय अरुणेन्द्र मिश्रा जी, संभवतः आपकी किसी पहली प्रस्तुति से गुजर रहा हूँ. इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई. यह भी अवश्य है कि प्रस्तुति तनिक समय चाहती है. वर्तनी और वाक्य विन्यास के साथ साथ कथ्य का स्पष्ट सम्प्रेषण भी अनिवार्य हुआ करता है. आप इस…"
May 6
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May 5
Sushil Sarna commented on arunendra mishra's blog post तब मन मे बैराग्य हुआ
"आदरणीय  arunendra mishra    जी बहुत सुंदर और भावपूर्ण सृजन हुआ है। आदरणीय शाब्दिक दोष प्रवाह में बाधक हैं तथा प्रस्तुति के प्रभाव को क्षीण कर रहे हैं। इस  प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई सर। "
May 5
arunendra mishra posted a blog post

तब मन मे बैराग्य हुआ

जब मेरे ही पूजित पाषाण नेमेरा उपहास किया,तब मन मे बैराग्य हुआ जब पुल्लवित बसंत मे,फ़ूलो ने भवरो का हास कियातब मन मे बैराग्य हुआ जब पुरवइआ के मंद झौको नेमेरे कानो मे तेरे शब्दो का उच्चार कियातब मन मे बैराग्य हुआ जब दोनो हाँथ उठा मैने सपनो  उडान भरने का प्रस्ताव दियातब मन मे बैराग्य हुआ जब संसार की सारी बेडिया तोड तेरी शरण मे भी बंन्धन ही पायातब मन मे बैराग्य हुआ जब तुलसी की माला ले ,तेरे नाम का सहस्र्त जाप कियाऔरफिर भी अपने आप को अनुत्तरित ही पायातब मन मे बैराग्य हुआ मौलिक व अप्रकाशितSee More
May 5
arunendra mishra shared their blog post on Facebook
Oct 11, 2013
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Oct 11, 2013
Albela Khatri and arunendra mishra are now friends
Aug 25, 2013
arunendra mishra commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post कविता : बादल, सागर और पहाड़ बनाम पूँजीपति
"बहुत ही सुन्दर रचना .."
Jul 28, 2013

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Gender
Male
City State
MH
Native Place
Raipur
Profession
Automobile Engineer

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लौट आओ साजन सावन के पहले - (अरुणेन्द्र मिश्र)

वो लम्हे विरह गीत न बन जाये

लौट आओ साजन सावन के पहले

पपिहा पीऊ पीऊ आवाज लगाये

पेडो पर पड गये झुले

कजरी लागे मोहे सौतन

बदरा की बुन्दे जलये तन मन

लगी है प्रित मेरी अब अशुअन से

लौट आओ साजन सावन के पहले

 

जोगन न बन जाये कही ये बिरहन

लौट आओ साजन सावन के पहले

 

 

मुख मलिन , जैसे काली बदरिया

पनघट पे ना रिझाये कोइ सवरिया

सुनी सुनी पडी है पुरी डगरिया

आंगन सुना, सुना भयॊ मेरे मन का…

Continue

Posted on May 14, 2016 at 7:30pm — 3 Comments

तब मन मे बैराग्य हुआ

जब मेरे ही पूजित पाषाण ने

मेरा उपहास किया,

तब मन मे बैराग्य हुआ

 

जब पुल्लवित बसंत मे,

फ़ूलो ने भवरो का हास किया

तब मन मे बैराग्य हुआ

 …

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Posted on May 4, 2016 at 11:05pm — 6 Comments

जीवन तुझसे एक वर माँगू

जीवन तुझसे एक वर माँगू

पाप पुण्य से दूर 

जीवन की समझ माँगू 

एकाकी अगर सत्य हो तो 

तथागत बनने का वर माँगू

आवेश ही एक मात्र  मार्ग हो तो 

दुर्योधन का आवेश पाऊँ

क्षमा ही ध्येय हो तो 

युधिष्ठिर का मन पाऊँ 

समर्पण ही अगर सत्य हो तो 

समर्पण की धुरी पर जो कर्ण पिसा 

मैं भी समर्पित हूँ 

उपेक्षा अगर सत्य हो तो 

एकलव्य सा ध्यान…

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Posted on May 30, 2012 at 9:30pm — 18 Comments

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया 

करुण वेदना , विरह अश्रु , और मौन ने मेरा श्रृंगार किया 

कितनी संवेदना ,कितनी आह

कितने अश्रु , कितनी चाह

कितने आलाप , कितने गान

मिल कर भी

संतॄप्त न कर पाती

उर अरमनों में छिपे स्पंदन को,

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया 

सावन रिक्त , शशि सुप्त

सूरज न उग्र , रौद्र नयन हैं रुष्ट

प्रियतम जब से मैंने प्रेम का आवाहन किया 

करुण वेदना , विरह अश्रु , और मौन ने मेरा…

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Posted on May 25, 2012 at 11:56pm — 9 Comments

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At 8:43pm on April 14, 2012, Admin said…

 
 
 

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गिरिराज भंडारी commented on munish tanha's blog post ग़ज़ल: यही बात दिल देख मेरा जलाये
"आदरणीय मुनीश भाई , खूबसूरत ग़ज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ आपको ।  बफा को वफा कर लेना चाहिये ।"
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गिरिराज भंडारी commented on rajesh kumari's blog post मगर दीवार रिश्तों से कभी ऊँची नहीं होती फिल्बदीह ग़ज़ल (राज )
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