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(1122।1212।1212)

तेरे आगे मेरा जो हाल था सो है।
तेरी चाहत तेरा मलाल था सो है।

तू मेरी ज़िन्दगी बनेगी एक दिन
दिलेफित्ना का ये खयाल था सो है।

तेरी हसरत तेरी दिवानगी जुनून
तू मुझे साहिबे-कमाल था सो है 

यूँ गमों ने की बारिशें बहुत मगर
जो रगों में मेरे उबाल था सो है।

न रही तेरे दिल में पहले सी वफ़ा
न सही, मुझको ये बवाल था सो है

वही क़ातिल वही गवाह और सितम
वही मुंसिफ वही सवाल था सो है।

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Krish mishra on May 17, 2016 at 12:44pm
आ.मिथिलेश सर ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और हौसलाअफजाई पाकर मन हर्षित हुआ।व्यस्तताओं में रचनाकर्म से जुड़ नही पा रहा हूँ,आगे और सक्रिय होने के लिए प्रयास रहेगा।सादर आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 17, 2016 at 12:36pm

आदरणीय कृष्ण भाई जी, बहुत दिन बाद आपकी ग़ज़ल पढने का अवसर मिला है. बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

Comment by Krish mishra on May 16, 2016 at 9:43pm
हार्दिक आभार आ.राहुल डांगी जी।
Comment by Rahul Dangi Panchal on May 16, 2016 at 9:33pm
बहुत सुन्दर
Comment by Krish mishra on May 16, 2016 at 9:13pm
आ.समर सर ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और हौसलाअफजाई पाकर मन हर्षित हुआ।व्यस्तताओं में रचनाकर्म से जुड़ नही पा रहा हूँ,आगे और सक्रिय होने के लिए प्रयास रहेगा।सादर आभार।
Comment by Krish mishra on May 16, 2016 at 9:08pm
आ.राहिला जी ग़ज़ल पर मुक्त ह्रदय से उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार।
Comment by Samar kabeer on May 16, 2016 at 2:52pm
जनाब जान गोरखपुरी साहिब आदाब,बहुत दिन बाद आपकी ग़ज़ल से रूबरू होने का मौक़ा मिला है, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Rahila on May 16, 2016 at 9:45am
हर शेर काबिले तारीफ़ है और पूरी ग़ज़ल बेहतरीन,ज्यादा जानकारी नही है मुझे इस विधा में, लेकिन आपकी रचना के भाव खूब पसंद आये । बहुत बधाई आदरणीय सर जी ।सादर

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