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March 2015 Blog Posts

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो 

मेरे आँखों की पानी तुम हो 

मेरे ख्वाबों की रानी तुम हो 

मेरे दर्द की कहानी तुम हो 

हाँ तुम हो ,

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो |

तुझसा कोई न आये

गर आये तो फिर न जाये 

तेरे बिन जिया न जाये 

ये दिल पाये जिसे पाये ,तुम हो 

हाँ तुम हो 

मेरी ज़िन्दगी तुम हो ,मेरी बंदगी तुम हो |

हर जगह से था मैं हारा 

था मैं वक़्त का मारा

मुझे मिला…

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Added by maharshi tripathi on March 13, 2015 at 10:42pm — 11 Comments

किसको बतायें -एक कोशिश - डॉo विजय शंकर

सम्हाल सके न इश्क किसको बतायें
हम काबिल ही न थे किसको बतायें |

जगहंसाई अपनी क्योंकर करायें
तुम बेवफा निकले किसको बतायें |

तुम खेल गये खेल था तुम्हारे लिये
हम समझे क्या उसे किसको बतायें |

लगा दुनियाँ जीत ली संग तुम्हारे
पर हम हर पल हारे किसको बतायेँ |

इक काँटा चुभे उसकी फितरत है
फूल भी चुभता है किसको बतायें

वजह भी बेवफाई की होती है
वजह वो खुद हम थे किसको बतायें |

Added by Dr. Vijai Shanker on March 13, 2015 at 9:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘आस्था’ शापिंग मॉल (लघु कथा)

“इस सन्डे कहाँ पार्टी करें कोमल”? नील  ने पूछा. “यू लाइक  मॉल चलते हैं” “अरे यार, फिर वहीँ.... बोर हो गए हमेशा मॉल मॉल  में जाते कोई नई जगह... “फिर उस भूतिया महल में चलें? है हिम्मत’? बीच में ही बात काटती हुई आस्था बोली| “ना बाबा ना मैं तो नहीं जा सकती तू जा सकती है”?

“मैं भूतों में विश्वास नहीं करती हम आज के युग में जीते हैं क्या पुराने लोगों जैसी  घिसी पिटी बातें  करते हो  और फिर हमारे साथ विश्वास भी तो है उस पर विश्वास करना चाहिए  सब भूतों को ठिकाने लगा देगा  हाहाहा”..…

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Added by rajesh kumari on March 13, 2015 at 7:30pm — 24 Comments

हक़ के लिये लड़ते सभी झगड़ा कभी थमता नहीं |

११२१२      ११२१२       ११२१२       ११२१२     कामिल - मुतफ़ाइलुन 
हक़ के लिये लड़ते सभी झगड़ा  कभी थमता नहीं | 
शक है वहीँ डर है कहीं प्रिय   पास है समता  नहीं | 
जब साथ है हर बात है कटु…
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Added by Shyam Narain Verma on March 13, 2015 at 12:03pm — 17 Comments

दीवारों में दरारें-2 सोमेश कुमार

साल पहले विद्यालय दफ्तर में

“सर, मैं अंदर आ सकती हूँ ?”

“बिल्कुल !” मि.सुरेश एक बार उस नवयुवती को ऊपर से नीचे तक देखते हैं और फिर उसकी तरफ प्रश्नसूचक निगाह से देखते हैं |

“सर ,मुझे इस स्कूल में नियुक्ति मिली है |” वो बोली

“बहुत बढ़िया !बैठो अभी प्रधानाचार्य आते हैं तो आपको ज्वाइन करवाते हैं |” प्रफुल्लतापूर्वक मि.सुरेश बोले

“वैसे कब और कहाँ से की है बी.एड.?” उन्होंने अगला सवाल किया

“इसी साल,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से - -“उसने बड़ी सौम्यता से जवाब…

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Added by somesh kumar on March 13, 2015 at 11:18am — 17 Comments

ग़ज़ल ..22 22 22 22 22 2 ....सीला माँ (शीतला माता )

ताप घृणा का शीतल करदे सीला माँ

इस ज्वाला को तू जल करदे सीला माँ

 

इस मन में मद दावानल सा फैला है

करुणा-नद की कलकल करदे सीला माँ

 

सूख गया है नेह ह्रदय का ईर्ष्या से

इस काँटे को कोंपल करदे सीला माँ

 

प्यास लबों पर अंगारे सी दहके है

हर पत्थर को छागल करदे सीला माँ

 

सूरज सर पर तपता है दोपहरी में

सर पर अपना करतल करदे सीला माँ

 

दूध दही हो जाता है शीतलता से

भाप जमा कर बादल करदे सीला…

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Added by khursheed khairadi on March 13, 2015 at 11:13am — 15 Comments

ज़िन्दगी और कविता

मैं तो शब्द पिरो रही थी यूँ ही

सोच रही थी ख्यालों में खोकर

क्या ऐसे ही चलती है ज़िन्दगी

जैसे अनजाने बनती हैं कवितायें

झरने की तरह प्रवाह सी बहती

बस हर शब्द बरसता है बूँद सा

टपकता है मन के बादलों से कही

और जुड़ जुड़ कर बनता जाता है

एक मिसरा..एक शेर..एक मतला

कभी दर्द में डूबा हुआ सियाह लफ्ज़

कभी खुशी की चाशनी में डूबा हुआ.

कभी मिलन की आस में शरमाया हुआ

कभी विरह की तड़प में टूटता हुआ शब्द

एहसासों की चादर में…

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Added by Nidhi Agrawal on March 13, 2015 at 9:30am — 10 Comments

हालात

सपनो  को बेच  रहा वादों  की मंडी में

शोर बहुत है बस्ती में सुनता नहीं कोई

 

वो वहीँ खड़ा  चल चित्र दिखा रहा

रंगीन चश्मे की दुनियां समझता नहीं कोई 

 

बाहँ थाम कर जिसे उसने आगे बढ़ाया

कन्धों पर चढ़ गया वो  देखता नहीं कोई

 

मशाल लेकर भीड़ में आगे चला था जो

वो अब बदल गया टोकता नहीं कोई

 

चार दीवारें खड़ी कर बन गया मकां

आपस में लड़ते रहे,मोहब्बत जगाता नहीं कोई

  

झंडे किताब के चर्चे  यों  ही होते…

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Added by Shyam Mathpal on March 13, 2015 at 9:07am — 10 Comments

तुमने पुकारा ही नहीं मुझको

मैं तो प्रेम रस से 
बादलों की तरह 
भरा हुआ 
बेचैन था 
तुम पर बरसने को
मगर 
तुमने पुकारा ही नहीं मुझको
सूखी 
प्यासी 
व्याकुल 
दरकती हुयी जमीन बनकर
मेरा बरस जाना 
जरूरी थी
क्योंकि 
मैं भरा चुका था 
अन्दर से 
पूरी तरह
मेरी हदों से बाहर 
निकला प्रेम रस
आँखों की कोरों से फूटकर
अश्रुधार बनकर
और बरसता रहा
उम्र भर

उमेश कटारा 
मौलिक व अप्रकाशित

Added by umesh katara on March 13, 2015 at 7:24am — 19 Comments

बजट....(लघुकथा)

“ यह कुकिंग गैस के, यह राशन वाले के, यह बच्चों की स्कूल फी और अभी तो बिजली का बिल आने वाला है. न जाने इस बार....” सुनीता माह का बजट बना ही रही थी कि, तपाक से घर में झाडू-पौंछा कर रही लक्ष्मीबाई पूछ बैठी..

“ बीबी जी.. आप हर माह बिजली के बिल को लेकर क्यूँ परेशान हो जाती हो..?”

“अरे!! बिजली का बिल ही तो झटके मार देता है, पूरे महीने के बजट पर. क्यूँ तुम लोग भी तो खूब टी.व्ही. पंखे चलाते हो, तुम्हे फर्क नहीं पड़ता क्या..?”

“ अरे!! बीबी जी.. टी.व्ही. पंखा ही क्या. हम तो खाना भी…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on March 12, 2015 at 6:22pm — 36 Comments

ग़ज़ल : वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२

 

वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

जाने कितने टुकड़ों में किस किस के साथ गया हूँ

 

हल्के आघातों से भी मैं टूट बिखर जाता हूँ

इतनी बार हुआ हुँ ठंडा इतनी बार तपा हूँ

 

जाने क्या आकर्षण, क्या जादू होता है इनमें

झूठे वादों की कीमत पर मैं हर बार बिका हूँ

 

अब दोनों में कोई अन्तर समझ नहीं आता है

सुख में दुख में आँसू बनकर इतनी बार बहा हूँ

 

मुझमें ही शैतान कहीं है और…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2015 at 4:40pm — 24 Comments

'मेहमान' 'जान' गोरखपुरी

ना हाथों में कंगन,

न पैरों में पायल,

ना कानो में बाली,

न माथे पे बिंदियाँ

कुदरत ने सजाया है उसे!!

न बनावट,ना सजावट

न दिखावट,ना मिलावट

गाँव की मिट्टी ने सवारा है उसे!!

ये बांकपन ,ये लड़कपन

चंचल अदाओं में भोलापन,

जवानी के चेहरे में हय!....

हँसता हुआ बचपन!!

वख्त ने जैसे....संजोया है उसे!!

उसकी बातें सुनती हैं तितलियाँ

उसीके गीत गाती हैं खामोशियाँ

हँसी पे जिसकी फ़सल लेती है…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 12, 2015 at 3:38pm — 20 Comments

कोकून :हरि प्रकाश दुबे

अपने कोकून को

तोड़ दिया है मैंने अब

जिसमे कैद था, मैं एक वक़्त से

और समेट लिया था अपने आप को

इस काराग्रह में ,एक बंदी की तरह !

निकल आया हूँ बाहर , उड़ने की चाह लिए

अब बस कुछ ही दिनों में, पंख भी निकल आयेंगे

उड़ जाऊंगा दूर गगन में कहीं , इससे पहले की लोग

मुझे फिर से ना उबाल डालें , एक रेशम का धागा बनाने के लिए

और उस धागे से अपनी , सतरंगी साड़ियाँ और धोतियाँ बनाने के लिए !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

“मौलिक व अप्रकाशित…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 12, 2015 at 3:30pm — 26 Comments

मेरी पहली कोशिश

जिंदगी की कहानी सुनाता रहा

दर्द दिल के सभी मै छिपाता रहा

प्यार था या नहीं ये पता ही नहीं

बात क्या थी जिगर में दबाता रहा

जज़्ब होते रहे अश्क भीगे अधर

मुसकुरा कर  निगाहें चुराता रहा

तोड़कर वो चली पारसा दिल मेरा

आइना कांच…

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Added by Nidhi Agrawal on March 12, 2015 at 1:00pm — 22 Comments

गीतिका8+8....बरगद पीपल

बरगद पीपल पनघट छूटे 

बालसखा सब नटखट छूटे 

गोपालों की शोख़ ठिठोली 

चौपालों के जमघट छूटे 

बालू के वो दुर्ग महल सब 

तालाबों के वो तट छूटे 

झालर संझा वो चरणामृत 

मंदिर के चौड़े पट छूटे 

मॉलों में क्या कूके कोयल 

अमराई के झुरमुट छूटे

 

धूम कहाँ वो बचपन वाली 

टोली के सब मर्कट छूटे 

हमसे छूटा  गाँव हमारा 

जीने का अब जीवट छूटे

मौलिक व अप्रकाशित  

Added by khursheed khairadi on March 12, 2015 at 12:32pm — 22 Comments

घनाक्षरी - लक्ष्मण रामानुज

महिला दिवस पर रचित -

घनाक्षरी – 16-15 वर्ण

कंधें से कंधा मिला काम करे जो खेत में,

भोर में उठ, देर रात तक जगती है |

 

खुद का वजूद भूल मान रखे आदमी का,

सर्वस्व समर्पण को तैयार रहती है |

 

शादी कर अनजान घर बसाने, कोख में,

नौ माह तक पीड़ा भी सहती रहती है |

 

फिर भी स्वयं का नही कोई वजूद मानती,

नाम बच्चें को भी वह बाप का ही देती है |

 

सर्दी गर्मी वर्षा सहती अंग भी झुलसाती,

दूजे…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 12, 2015 at 12:30pm — 18 Comments

बनाता खेत की रश्में - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222  1222 1222 1222

************************

बनाता  खेत  की  रश्में  चला  जो  हल नहीं सकता

लगाता  दौड़  की  शर्तें  यहाँ   जो  चल  नहीं सकता

***

पता  तो  है  सियासत  को  मगर  तकरीर करती है

कभी तकरीर  की  गर्मी  से  चूल्हा जल नही सकता

*****

भरोसा  आँख  वालों से  अधिक  अंधों को जो कहते

तुम्हें धोखा  हुआ  होगा कि सूरज  ढल नहीं  सकता

****

असर  कुछ  छोड़ जाएगी  मुहब्बत  की झमाझम ही

किसी के शुष्क  हृदय  को भिगा बादल   नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 12, 2015 at 12:03pm — 26 Comments

दोहे (गंगा माँ )

गंगा माँ की गोद में,बसा कानपुर धाम

सरसैया के घाट पर, उगती सहर तमाम  ॥

 

महा आरती मात की, कर लो हृदय लगाय

  कट जायें संकट सभी ,सुंदर सरल उपाय ॥

 

हिमगिर के उर से बही,पसरी वसुधा गोद

लहराती वो चल पड़ी,भरती मन आमोद ॥

 

मोक्षदायनी याद में , कहाँ भागीरथ आज

उनका तप बल याद कर,सफल बना लो काज ॥

 

गंगा गीता गाय को , प्यार करें भगवान

मानव इसको भूल…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 12, 2015 at 11:30am — 20 Comments

विचित्रदूनिया

यह है
विचित्रदूनिया
जहाँ सच को मिलती सज़ा
झूठ लेता है मज़ा
यहाँ काटा जाता है
बर्बरिक का सर
ईशा ही चढ़ता है
सूली पर
सुकरातऔर मीरा को
पिलाते है जहर
मारा जाता है
जूलियस सीज़र.
हर पाक दामन को
गंदा करते हैं
कीचड़ डाल कर
जब टूटते है
सामाजिक रिश्ते
बदनाम होते है
फरिश्ते.

मौलिक वा अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on March 12, 2015 at 11:25am — 9 Comments

दीवारों में दरारें

दीवारों  में दरारें-1  

दीवारे  और दरारें-1  

“कभी सोचा था कि ऐसे भी दिन आएँगे |हम लोग इनके फंक्शन में शामिल होंगे !”मि.सुरेश ने कोलड्रिंक का सिप लेते हुए पूरे ग्रुप की तरफ प्रश्न उछाला |

“मुझे लग रहा है इस वाटिका की सिचाईं नाले के गंदे पानी से करते हैं |कैसी अज़ीब सी बदबू आ रही है !”नाक पे हाथ रखते हुए राजेश डबराल बोले |

“पैसे आ जाने से संस्कार नहीं बदलते जनाब !इन्हें तो गंदगी में रहने की आदत है|” मि.सुरेश ने जोड़ा |

“सी S S ई |किसी ने सुन लिया…

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Added by somesh kumar on March 12, 2015 at 10:30am — 11 Comments

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