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Dr.Vijay Prakash Sharma
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  • Ranchi
  • India
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Dr.Vijay Prakash Sharma replied to मिथिलेश वामनकर's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-66 की स्वीकृत रचनाओं का संकलन
"महा उत्सव के सफल संचालन और संकलन हेतु बधाइयाँ शुभकामनायें."
May 6, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ.बी.ओ. लाइव महा उत्सव" अंक-66
"आपका हार्दिक आभार जनाब उस्मानी जी।"
Apr 10, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ.बी.ओ. लाइव महा उत्सव" अंक-66
"आपका हार्दिक आभार आदरणीया प्रतिभा जी ""
Apr 10, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ.बी.ओ. लाइव महा उत्सव" अंक-66
"रास्ते निकालने होते रास्ते बनाना पड़ता मार्ग पर बन जाती है पगडण्डी चल देने मात्र से. एक बार , दो बार , बार- बार जीवन की ऊबड़- खाबड़ डगर पर। मिटने लगता है दूरियों का भान समय सापेक्ष में. जरूरत होती है केवल एक सहचर की। लोग आने लगते हैं पीछे…"
Apr 10, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma commented on Dr.Vijay Prakash Sharma's blog post बंटवारा
"साभार धन्यवाद सतविन्द्र कुमार jee."
Feb 29, 2016
सतविन्द्र कुमार commented on Dr.Vijay Prakash Sharma's blog post बंटवारा
"बहुत ही पीड़ादायी है यह बंटवारा .हकीकत पर शानदार तंज."
Feb 25, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma commented on Dr.Vijay Prakash Sharma's blog post बंटवारा
"आ. कांता जी, साभार धन्यवाद."
Feb 25, 2016
kanta roy commented on Dr.Vijay Prakash Sharma's blog post बंटवारा
"खुदगर्जी बढती जा रही है ..... आज के संदर्भ में बड़ी ही तंजदार प्रस्तुति हुई है आपकी आदरणीय डाॅ विजय प्रकाश जी । बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 25, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma posted a blog post

बंटवारा

हमने बाँट ली ज़मीन फिर आसमान अब बाँट लिए चाँद सूरज और तारे फिर बाँटा देश-वेश, रहन- सहन रंग-ढंग, जाति- प्रजाति ख़ुदग़रज़ई बढ़ती जा रही है. अब हमने छुपा दिया है सदभावना को, भाईचारे को किसी गहरी खाई में. हम अब नहीं बाँटना चाहते सहज स्नेह आमने- सामने... (मौलिक व अप्रकाशित)See More
Feb 24, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आ. लक्ष्मण धामी जी, आपने रचना को सराहा, हार्दिक आभार."
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आ. अखिलेश कृष्ण जी, आपने रचना को सराहा, हार्दिक आभार ."
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आदरणीय योगराज भाई, आपने रचना को सराहा, हार्दिक आभार "
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आ. प्रतिभा पांडे जी, आपकी सराहना के बिना रचना अधूरी लगती,हार्दिक आभार"
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आदरणीय जनाब समर कबीर साहेब, आपने रचना को सराहा, हार्दिक आभार."
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आ.सचिन देव जी,हार्दिक आभार"
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"नयना(आरती)कानिटकर- आ. नयना जी,हार्दिक आभार"
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आ. गिरिराज भाई, आपकी सराहना के बिना रचना अधूरी लगती,हार्दिक आभार"
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आदरणीय Tasdiq Ahmed Khan  saheb,  रचना को स्वीकारने हेतु हार्दिक आभार. "
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-64
"आदरणीय सौरभ जी, सहज आत्मीयता से रचना को स्वीकारने हेतु हार्दिक आभार."
Feb 12, 2016
Dr.Vijay Prakash Sharma commented on Dr.Vijay Prakash Sharma's blog post आप कैसे देखते है?
"बहुत बहुत आभार. जनाब Sheikh Shahzad Usmani jee."
Feb 12, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
Ranchi
Native Place
Ranchi
Profession
Professor
About me
डॉ.विजय प्रकाश शर्मा स्नातकोत्तर एवम पी एच. डी (मानवविज्ञान ), रांची शिक्षण- दस वर्षों तक रांची विश्वविद्यालय , गुरूघासीदास विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षण. बाल्यावस्था से ही हिंदी में लेखन-प्रकाशन विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में.आकाशवाणी से प्रसारण . हिंदी कविता -प्रकाशित संग्रह--"सौंफ का शरबत", Email - drvijayprakash@yahoo.co.uk; drvijayprakash.sharma@gmail.com

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बंटवारा

हमने बाँट ली ज़मीन
फिर आसमान
अब बाँट लिए
चाँद सूरज और तारे
फिर बाँटा
देश-वेश, रहन- सहन
रंग-ढंग, जाति- प्रजाति
ख़ुदग़रज़ई
बढ़ती जा रही है.
अब हमने छुपा दिया है
सदभावना को, भाईचारे को
किसी गहरी खाई में.
हम अब नहीं बाँटना चाहते
सहज स्नेह
आमने- सामने..

.
(मौलिक व अप्रकाशित)

Posted on February 24, 2016 at 8:00am — 4 Comments

आप कैसे देखते है?

आप कैसे देखते है?
उसे कैसे स्वीकारते है
दुलार्ते हैं या नकारते हैं
यह आप पर निर्भर है.
आपके समाज पर निर्भर है.
कैकेई भी, कौशल्या भी,
देवकी और यशोदा भी
वाचाल मंथरा भी.
पुरुष की जननी भी
माता और भगिनी भी.
ज्वाला की अग्नि भी.
आप कैसे देखते है?
आधुनिकसमाज सुधारकों के अनुसार
दलित, शोषित, पीड़ित,उपेक्षित
वंचित, कुचलित भी वही है.
आप कैसे देखते है?

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on February 7, 2016 at 4:03pm — 6 Comments

हस्ताक्षर

उकेर दिया है

समय की रेत पर

अपना हस्ताक्षर.

जानता हूँ

ख़त्म हो जाएगा

रेत के बिखराव से

मेरा वज़ूद.

संभावना यह भी

किसी संकुचन क्रियावश

घनीभूत हो रेत

प्रस्तर बन जाय .

तब देख पाओगे

खंडित होने तक

मेरा हस्ताक्षर.

कुच्छ भी तो नहीं है

अनंत.

(विजय प्रकाश)

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on September 5, 2015 at 1:30pm — 12 Comments

अंदर का बनिया

हमारे अंदर का बनिया

सब कुच्छ बेचता है,

राम भी, कृष्ण भी,

धर्म और ईमान भी,

तीर और कमान भी.

अब उसके दुकान में

नये- नये समान हैं,

झूठाई, सपनों की मिठाई,

दंभ के साथ बढ़ती ढिठाई

ईन्हे वो रोज नई नई

जगहों पे सजाता है

ज़ोर से आवाज़ लगाता है

हिंदू हो या मुसलमान,

सिख हो या ख्रिस्तान,

उसके लिए सभी बराबर हैं.

वो बड़ी ईमानदारी से

बेईमानी बेचता हैं

दरअसल जो बिकता है

वही टिकता है.

मौलिक वा…

Continue

Posted on April 15, 2015 at 8:00am — 12 Comments

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At 8:17pm on September 21, 2014, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आपकी मित्रता का स्वागत है आदरणीय !

 
 
 

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