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हमारे अंदर का बनिया
सब कुच्छ बेचता है,
राम भी, कृष्ण भी,
धर्म और ईमान भी,
तीर और कमान भी.

अब उसके दुकान में
नये- नये समान हैं,
झूठाई, सपनों की मिठाई,
दंभ के साथ बढ़ती ढिठाई
ईन्हे वो रोज नई नई
जगहों पे सजाता है
ज़ोर से आवाज़ लगाता है

हिंदू हो या मुसलमान,
सिख हो या ख्रिस्तान,
उसके लिए सभी बराबर हैं.

वो बड़ी ईमानदारी से
बेईमानी बेचता हैं
दरअसल जो बिकता है
वही टिकता है.

मौलिक वा अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on April 16, 2015 at 11:12pm

आ. सौरभ जी, बहुत आभार. जी ध्यान रखूँगा.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2015 at 5:50pm

सही बात जो बिकता है वही टिकता (दिखता) है.. .

शुभकामनाएँ आदरणीय ..

रचना पोस्ट करने के वक्त अक्षरी-दोषों पर भी अवश्य ध्यान रहे, आदरणीय .. .

सादर

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on April 16, 2015 at 9:44am

कविता को पसंद करने के लिए -बहुत आभार श्री कृष्ण मिश्रा जी.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on April 16, 2015 at 9:41am

आभार सह धन्यवाद श्री हरी प्रकाश दूबे जी, टंकण में कृष्ण ही होना चाहिए. ठीक करने की कोशिश करता हूँ.

Comment by jaan' gorakhpuri on April 15, 2015 at 11:02pm

इस बेहतरीन कविता के लिए ढेरों बधाईयां प्रेषित है आ० विजय प्रकाश जी!

Comment by Hari Prakash Dubey on April 15, 2015 at 10:30pm

आदरणीय डॉ o विजय प्रकाश शर्मा जी, इस सुन्दर प्रयास ,सुन्दर रचना  पर हार्दिक बधाई आपको  सादर  !

सब कुच्छ बेचता है,/// क्या यहाँ  कुछ आना  चाहिये ?
राम भी, क्रिस्न भी,/////  कृष्ण ज्यादा  सार्थक  रहेगा ?.....सादर 

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on April 15, 2015 at 6:47pm

बहुत -बहुत आभार आ. गोपाल नारायण जी.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 5:35pm

उसके लिए सभी बराबर हैं.

वो बड़ी ईमानदारी से
बेईमानी बेचता हैं---------------------अच्छे भाव हैं . सादर .

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on April 15, 2015 at 2:35pm

आ० जितेंद्रा जी, विजय शंकर जी . राज कुमार जी,
आप मित्रों का बहुत आभार की आपने रचना को सराहा.

Comment by rajkumarahuja on April 15, 2015 at 12:50pm

 " हमारे अन्दर का बनियाँ " सुन्दर अभिव्यक्ती माननीय डा. विजय प्रकाश शर्मा जी ...साधुवाद !

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