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दरख्त

जाओ तुमको तुम्हारे हाल पे

मेने छोड़ दिया

तुमको इससे ज्यादा में और

दे भी क्या सकता था ...

देखो इस सूखे दरख्त को जिसने

बहुत फल खिलाये थे .. पर…

आज यहाँ परिंदा भी अपना

घोसला नहीं बनाता…

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Added by Amod Kumar Srivastava on May 9, 2013 at 12:08pm — 6 Comments

ग़ज़ल : चोरी घोटाला और काली कमाई

बह्र : मुतकारिब मुसम्मन सालिम

चोरी घोटाला और काली कमाई,

गुनाहों के दरिया में दुनिया डुबाई,

निगाहों में रखने लगे लोग खंजर,

पिशाचों ने मानव की चमड़ी चढ़ाई,

दिनों रात उसका ही छप्पर चुआ है,

गगनचुम्बी जिसने इमारत बनाई,

कपूतों की संख्या बढ़ेगी जमीं पे,

कि माता कुमाता अगर हो न पाई,

हमेशा से सबको ये कानून देता,

हिरासत-मुकदमा-ब-इज्जत रिहाई,

गली मोड़ नुक्कड़ पे लाखों…

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Added by अरुन 'अनन्त' on May 9, 2013 at 12:00pm — 12 Comments

कुरुक्षेत्र.......

शाम ढले खड़ा था खिड़की पर,

अपने इतिहास से वर्तमान...

का संगम कराने....…

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Added by KAVI DEEPENDRA on May 9, 2013 at 7:30am — 6 Comments

उम्मीद के चमन में सांसों सी हैं दुआएं।

उम्मीद के चमन में सांसों सी हैं दुआएं।

सुख दुःख दो शिलाएं, इक आए इक जाए।।

हम दोस्त है सभी के

क्यों दुश्मनी निभाएं

सुन्दर भाव संवारें,

अन्तर्मन व्यथाएं ।।1उम्मीद के---



फूलों औ कलियों से

सुगन्धित हैं दिशाएं

अपनी ही आस्था से

बस प्यार को बढ़ाएं।।2 उम्मीद के---



मौसम आये जाये

खुशबहार-पतझड़ से

सुजन में खिन्नता है

दुर्जन खिल खिलाएं।।3 उम्मीद के---



कुछ शहंशाह ऐसे

जो मुल्क बेचते हैं

रोते उदास…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 8, 2013 at 9:26pm — 16 Comments

भिखारन की निष्ठा

भिखारन की निष्ठा

मेरे घर के करीब भिखारियों का एक परिवार रहता था. चार बच्चे और पति – पत्नी. सुबह तड़के ही सभी घर से निकल जाते और गोधूली बेला तक सभी वापस आ जाते.

एक दिन क्या हुआ कि पति और बच्चे तो आ गये लेकिन भिखारन को आने में देर हो गयी . उसके आते आते रात के आठ बज गये. सभी भूखे थे. अतः भिखारन ने जल्दी से चावल की हांडी चूल्हे पर रख दी. चावल जब पक गया तो उसने अपने पति और बच्चों को पहले खिला दिया. बाद में जब वह खाने बैठी तो देखा हांडी में चावल के साथ एक छिपकली भी पक गयी है. भिखारन के…

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Added by coontee mukerji on May 8, 2013 at 12:00pm — 9 Comments

कुछ खरी खोटी....कुण्डलिया

कुणडलिया

----



लाख दवायें कर रहे, कम ना होता रोग

लिखा शास्त्र मे है यही, सबसे उत्तम योग

सबसे उत्तम योग, रोग यह दूर भगाता

ह्रदयों मे उत्साह , बदन मे फुर्ती लाता

स्वस्थ वही हैं आज, योग जो करते जायें

काम करे जो योग, करे नहि लाख दवायें

----

बात बनाना है कला, बात सही यह जान

भागदौड की जिंदगी, आता हरदम काम

आता हरदम काम, मुसीबत दूर भगाता

मुश्किल जो हैं काम, उसे यह सहज बनाता

कहते हैं कविराय, पडा उसको पछताना

सीख सका नहि आज, अभी तक… Continue

Added by manoj shukla on May 8, 2013 at 10:30am — 14 Comments

डमरू घनाक्षरी



32 वर्णो का डमरू दण्डक ‘‘ल सब‘‘ अर्थात इसके बत्तीसों वर्ण लघु होते है।



‘‘कमल नमन कर तमस शमन कर, उजस उरन भर हरष सकल नर।

अपजस हर मन सब रस तन भर, कलश सगर सम हृदय तरल कर।।

हलधर मत कह जन मन भय डर, भग कर लठ लय तड़ तड़ तब मर।

हलधर जय जय भगवन छत धर, मन भय हर-हर भजन करत तर।।‘‘

भावार्थ- कमल आदित्य के समान ही समस्त तिमिर को नष्ट करने वाला, हृदयों मे उल्लास, ओज और सभी प्राणियों में हर्ष का संचार करके दुःखों और सारी विकृतियों को दूर करने वाला है। यह शुभ…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 8, 2013 at 8:00am — 12 Comments

कलम

ईश्वर ने चाहे मुझको 

खुशियाँ कम दे दी ,

मगर अच्छा किया कि

हाथ में मेरे कलम दे दी .

जब भी आँसू बहे आँखों से

शब्द बन के उतर जाते  .

होती न गर कलम हाथ में 

कैसे ग़म ये निकल पाते ,

थोड़ी सी मिली खुशियों में 

ज़हर बनके घुल जाते  .

हम घुट-घुट कर कबके 

यहाँ पर मर जाते  ,

इतना सारा ज़हर पीके हम           

भला कैसे फिर जी पाते .

इसी कलम ने ज़हर निकाला 

जब-जब दर्द ने डंक मारे ,

इसी कलम की…

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Added by POOJA AGARWAL on May 7, 2013 at 9:30pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तस्वीर

यह रोज़ ही की बात है

जब रात गए,

शबनम की बरसात हुआ करती है-

पात पात रात भर

वात बहा करती है,

चोरी छिपे मैंने भी देखा है

दोनों को,

जब रात से प्रभात की

मुलाक़ात हुआ करती है -

मैं तो बस दर्शक हूँ

यह एक तसवीर है.

(2)

रात की लज्जा,

चहारदीवारी के साये में,

मेरे आंगन में छुपे

कलियों के आंचल में

सिमट-सिमट जाती है -

लेकिन वह सूरज

अनायास मेरे घर की

प्राचीर को लांघ…

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Added by sharadindu mukerji on May 7, 2013 at 9:30pm — 9 Comments

मैं तुम्हारी हूँ

मेरे  प्राणेश-

यह आखिरी शाम,

और वह भी ,बीत गयी।

तुम्हारी वह, खामोशी,

आज फिर से, जीत गयी।

कुछ भी तो मुझे न मिला,

न राधा का अभिमान,

न मीरा का सतीत्व।

फिर कैसे मिलता,

मेरे यौवन को व्यक्तित्व।

क्योंकि सागर की, बाहों में हीं,

नदी पाती है अस्तित्व।

काश! तुम समझ…

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Added by Kundan Kumar Singh on May 7, 2013 at 9:00pm — 9 Comments

दुनिया की सबसे प्यारी माँ के लिए

माँ

मुझे वो दिन याद है 
जब तू मुझे गोदी में लेकर,
बैठी रहती थी रात रात भर,
कि मुझे नींद आ जाए|
पर तू सारी रात जागकर …
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Added by Usha Taneja on May 7, 2013 at 8:30pm — 14 Comments

सर झुकाना नहीं आता

क्या करें, 

इतनी मुश्किलें हैं फिर भी

उसकी महफ़िल में जाकर मुझको

गिडगिडाना नहीं   भाता.....

 

वो जो चापलूसों से घिरे रहता है

वो जो नित नए रंग-रूप धरता है

वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है

वो जो यातनाएँ दे के हंसता है

मैंने चुन ली हैं सजा की राहें

क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे

सर झुकाना नहीं आता...

 

उसके दरबार में रौनक रहती

उसके चारों तरफ सिपाही हैं

हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद

उसके नज़दीक…

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Added by anwar suhail on May 7, 2013 at 8:21pm — 7 Comments

क्या करें ,सरकार की मजबूरी है

कालाबाजारी ,भ्रष्टाचार , दरिंदगी ,व्यभिचार ,

बेशर्मी ,बेहूदगी ,बेचारगी ,बेरहमी ,बेहयाई ,

आतंकवाद ,जातिवाद ,भाई-भतीजावाद ,परिवारवाद ,

सब राजनीति में रास्ते हैं ,

पर क्या करें ,सरकार की मजबूरी है ,इन रास्तों से गुजरना पड़ता है .



हमें पता है पडौसी ,निर्दोष जनता में आतंक फैला रहा है ,…

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Added by Dr Dilip Mittal on May 7, 2013 at 6:39pm — 5 Comments

माँ का पल्लू

माँ का पल्लू



मेरा छोटा भाई हमेशा मेरी माँ का पल्लू थामे रहता .माँ जहाँ भी जाती वह पल्लू पकड़े साथ साथ चलता . कभी कभी तो माँ को जब बाथरूम जाना होता तो और मुश्किल में पड़ जाती. कभी माँ खीज कर कहती – छोड़ो पल्लू बेटा ! इतना अपशकुन क्यों करते हो ? अगर मैं मर गयी तो क्या करोगे ?

अबोध बालक तो कुछ नहीं समझ पाया कि मृत्यु क्या…

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Added by coontee mukerji on May 7, 2013 at 6:00pm — 9 Comments

माँ ... श्रध्दांजलि !

माँ ... श्रध्दांजलि !

(पावन माँ दिवस पर)

मैं प्राण-स्वपन तुम्हारा, तुमने सर्जन किया था मेरा,

कभी मैंने जन्म लिया था तुम्हारे पावन-अंदर,…

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Added by vijay nikore on May 7, 2013 at 3:30pm — 26 Comments

ग़ज़ल - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है

बहरे हज़ज़ मुसम्मन सालिम

मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

1222 1222 1222 1222

..............................................................

हुआ पैदा जो अंधा वो खड़ा राहें दिखाता है।

फटी आवाजवाला रोज अब गाने सुनाता…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 7, 2013 at 1:11pm — 23 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मशीनी मानव !!

बस पांच मिनट का पड़ाव  

उस स्टेशन पर 
देख रही हूँ उस पार किस तरह 
वो  उस हथौड़े को 
अपने सर के ऊपर तक ले जाकर 
खटाक से वार कर रहा है
 उस लोहे पर जिसको 
चूड़ियों से भरे दो हाथ 
थाम रहे हैं दोनों और से 
कितना आत्म विशवास है 
उन दोनों को अपने उन हाथों पर 
लोहा इच्छित आकार 
लेता जा रहा है धीरे-धीरे
सोच रही…
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Added by rajesh kumari on May 7, 2013 at 11:58am — 18 Comments

जीवन में जिन्दगी का माँ एहसास हो तुम .........

तपती धुप धूप में

छाँव हो तुम

मेरे लिए

बहुत खास हो तुम

तुम्हारे एहसास भर से

दूर हो जाती है हैं मेरी…

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Added by Sonam Saini on May 7, 2013 at 11:00am — 22 Comments

दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं

तमाम विसंगतियों के विरोध में एक ताज़ा ग़ज़ल .....



दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियाँ आने लगीं 

फैसले को ‘खाप’ की कुछ पगड़ियाँ आने लगीं 



किसको फुर्सत है भला, वो ख़्वाब देखे चाँद का

अब सभी के ख़्वाब में जब रोटियाँ आने लगीं



आरियाँ…

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Added by वीनस केसरी on May 6, 2013 at 9:30pm — 52 Comments

॥ मेरा साथ निभाना तुम ॥ (श्रंगार रस का पहला प्रयास )

 

॥ मेरा साथ निभाना तुम ॥

मै बसंत हूँ , मेरी बहार बन जाना तुम ।

मै सूरज बनूँ तुम्हारा, मेरी किरण बन जाना तुम । …

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Added by बसंत नेमा on May 6, 2013 at 12:30pm — 9 Comments

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