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देवता ! मुझे शरण दो

देवता ! मुझे शरण दो !
अस्सी साल की बुढ़िया ,
लाठी टेकती आयी ,
गुहार करने
मंदिर आंगन द्वार .

हाथ उठाकर ,
घण्टी भी बजा न सकी .
जर्जर काया जीवन से त्रस्त ,
और दुखित -
अपनों से सतायी हुई, उपेक्षित .

माँग रही थी मृत्यु का वरदान ,
पर – देवता सोये थे निश्चिंत .
कम्पित कर जोड़े ,
साथ न दे रही थी
थर्राती वाणी.

‘’ मैया ! घर जाओ ‘’ बोले पुजारी
‘’ कहाँ जाऊँ बेटा, कहीं नहीं कोई ‘’.
जो कुछ था लूट लिया अपनों ने ,
‘’ पर वे सुखी रहें ‘’ बोली दुखिया .
फिर होंठ हिले
‘’ मुझे उठा लो देवता ! ‘’
‘’ दे दो मुक्ति ,
तेरे चरणों में सर पटकूँ अपना “ -
‘’ मैया ! अभी बाकी है दाना पानी तेरा,
जब तक है प्राण , पड़ेगा जीना
यह किसी के वश में नहीं –
सबका कर्म अपना - अपना
देवता को कर दो अर्पण
तन मन सारा .’’

रोती कलपती उठी , चली मैया ,
राह पथरीला, पथराई दृष्टि .
हरि नाम जपती ,
माँग रही थी दुहाई ,
प्रकृति भी रोई, गहरी श्वास छोड़ी
मगर -
देखता रहा ,
टुकुर टुकुर
मंदिर का देवता .

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 6, 2013 at 11:59am

मगर -
देखता रहा , 
टुकुर टुकुर 
मंदिर का देवता

आदरनिया सादर बधै 

मारमिक, 

Comment by बृजेश नीरज on May 5, 2013 at 11:14pm

मार्मिक रचना! दिल को दूर तक छू गयी। बधाई आपको।

Comment by coontee mukerji on May 5, 2013 at 3:47pm

आप सब की कृपा बनी रहे .../ सादर / कुंती .

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 5, 2013 at 3:39pm

यथार्थ जीवन के कटु सत्य को दर्शाती सुन्दर मार्मिक रचना. आदरणीया कुंती जी.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 5, 2013 at 2:47pm

आजकल तो हर कोई अपनों से ही लुट रहा है | नेकी करते हाथ जल रहे है पराये ही कंधा दे रहे है 

इन्ही भावो में रची सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया कुंती जी 

Comment by vijay nikore on May 5, 2013 at 6:53am

आदरणीया कुंती जी:

 

ऐसा ही कितने माता-पिता के साथ हो रहा है...

वह जो बच्चों को कंधे पर उठा सकते थे, अब बच्चे

उन्हीं को कंधा नहीं दे सकते..। आपकी रचना सदैव

वास्तविक्ता के कटु सत्य से रंगी होती है।

 

बधाई। लिखती रहें, आनन्द देती रहें।

 

सादर और सस्नेह,

विजय निकोर

Comment by manoj shukla on May 5, 2013 at 5:34am
बहुत ही सुन्दर रचना आदर्णीया ....बधाई स्वीकार करें ...सादर
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 4, 2013 at 8:55pm

आ0 कुन्ती जी, ’’जो कुछ था लूट लिया अपनों ने,
’पर वे सुखी रहें’ बोली दुखिया।’’ वाह रे! मां, ^अबला तेरी यही कहानी...आंचल में है दूध और आंखों में पानी^ ...सदा से यही होता आया है। अतिसुन्दर रचना। बधाई स्वीकारें। सादर,

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