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न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२

****

सदा बँट के जग में जमातों में हम
रहे खून  लिखते  किताबों में हम।१।
*
हमें मौत  रचने  से  फुरसत नहीं
न शामिल हुए यूँ जनाजों में हम।२।
*
हमारे बिना यह सियासत कहाँ
जवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।
*
किया कर्म जग  में  न ऐसा कोई
गिने जायें जिससे सबाबों में हम।४।
*
न मंजिल न मकसद न उन्वान ही
कि समझे गये हैं मिराजों में हम।५।
*
रहा भाग्य अपना तो सीमित यही
रहे भूख  में  या  निवालों  में हम।६।
*
न पावन  हुए  जब  मनों के लिए
मिलेंगे कहाँ फिर शिवालों में हम।७।
***
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2026 at 4:09am

आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्ताहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 10:05pm

   हमारे बिना यह सियासत कहाँ
जवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।... विडम्बना है 

रहा भाग्य अपना तो सीमित यही
रहे भूख  में  या  निवालों  में हम।६।.... नसीब है. वाह ! आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर,  खूबसूरत ग़ज़ल हुई है आपकी. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर 

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