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माँ तुम्हारा वो एहसास----- कविता

 

माँ तुम्हारा वो एहसास 

माँ

                    

 तुम मेरी…

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Added by Veena Sethi on May 12, 2013 at 12:30pm — 9 Comments

!!! गजल !!!

!!! गजल !!!

वज्न-2122, 2122, 2122, 212



तुम जो आये जिन्दगी में, बात सादर हो गयी।

जिन्दगी की सारी सरिता, आज सागर हो गयी।।



आपसी मत भेद भूले, कामना सच हैं नये।

बात रातों की करे तो, चांदनी कर हो गयी।।



हुस्न के जल्वे दिखे है, शाम शबनम की खुशी।

हम सफर जो साथ रहता, आंख कातर हो गयी।।



बन्दगी अब बन्दगी है, रंग - रंगत एक से।

आज फिर राधा-किशन है, बात सुन्दर हो गयी।।



आपकी ही बांसुरी में, गोपियों की लालसा।

राम का दर्शन…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 12, 2013 at 12:00pm — 28 Comments

भारतीय सनातन संस्कृति का ह्रास

साँस लेता हूँ जब

उठती है कसक सीने में

ज्वार उठता है

ज्वाला धधकती है

दब जाता हूँ मैं

राख के ढेर तले

सनातन संस्कृति की राख

दिखलाई देते हैं

संस्कृति के भग्न अवशेष

अटक जाती हैं साँसें

अवसान देखकर

सनातन संस्कृति का



समृद्ध संस्कृति थी कभी

भारतीय सनातन संस्कृति

सम्भाल नहीं पाए

भारतीय भाग्य विधाता

आक्रमणकारी आए विदेशी

रौंदने लगे पैरों तले

भारतीय सनातन संस्कृति

हूण आए, कुषाण आए

यमनी भी… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on May 12, 2013 at 7:17am — 8 Comments

और तू मेरी दुल्हन हो

"सावन की झम झम हो

पायल की छम छम हो

भीगा भीगा तन मन हो

कोई प्यार का सरगम हो

खोई खोई सी धड़कन हो

और तू मेरी…

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Added by Kedia Chhirag on May 12, 2013 at 12:30am — 9 Comments

शत शत प्रणाम

शत शत प्रणाम

 

जो सुबह देखता हु,

शाम को लिखता हु,

रात मे…

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Added by yatindra pandey on May 11, 2013 at 10:30pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं कैसे सोऊँ ?? (मातृ दिवस पर)

मैं  कैसे सोऊँ ??

नौ माह का अंकुर पूर्ण हुआ 

 व्याकुल जग पंथ निहारता 

 गर्भ नाल में जब हुई पीड़ा  

रक्त माँ- माँ कह पुकारता 

मैं कैसे सोऊँ ?

जब बिस्तर उसका हुआ गीला 

वो करवट करवट जागता 

मुख ,उँगलियाँ मचलती वक्ष पर 

पय उदधि हिलौरे मारता 

मैं कैसे सोऊँ ?

 रोटी का कौर लिए फिरती 

वो नाक चढ़ा चिंघाड़ता 

मैं  कलम किताब दूँ हाथों…

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Added by rajesh kumari on May 11, 2013 at 10:00pm — 16 Comments

मुझसे कभी तू रूठ न जाना

"ऐ चांदनी मेरी ,

मुझसे तू कभी रूठ न जाना

खोई सी हैं धड़कनें तुझमें…

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Added by Kedia Chhirag on May 11, 2013 at 3:00pm — 7 Comments

माँ

माँ सचमुच माँ ही होती है,

उसके जैसी कोई और नहीं होती है।

वो हँसती है हमारे साथ ,

और हमारे साथ ही रोती है।

वो देती है तसल्ली दुःख में,

वो मुस्कराती है हमारे सुख में।

वो निराशा में नया सवेरा लाती है,

कष्ट में धीरज बंधाती है।

जब होता है कोई दुःख तो,

अक्सर माँ की याद आती है।

लगता है जैसे भाग कर,

उसके पास मैं चली जाऊँ।

और उसे अपने सारे दुखड़े,

अपने सारे दर्द कह सुनाऊँ।

जब आये कोई मुसीबत तो,मैं 

 उसकी गोद में सिमटकर छिप जाऊँ।

वो बचा ले…

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Added by Savitri Rathore on May 11, 2013 at 12:03pm — 4 Comments

पर्दे शर्म के सारे तार-तार हो गए हैं .

बेख़ौफ़ हो गए हैं ,बेदर्द हो गए हैं ,

हवस के जूनून में मदहोश हो गए हैं .

चल निकले अपना चैनल ,हिट हो ले वेबसाईट ,

अख़बारों के अड्डे ही ये अश्लील हो गए हैं .

पीते हैं मेल करके ,देखें ब्लू हैं फ़िल्में ,

नारी का जिस्म दारू के अब दौर हो गए हैं .

गम करते हों गलत ये ,चाहे मनाये जलसे ,

दर्द-ओ-ख़ुशी औरतों के सिर ही हो गए हैं .

उतरें हैं रैम्प पर ये बेधड़क खोल तन को…

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Added by shalini kaushik on May 11, 2013 at 12:30am — 11 Comments

!!! नवगीत !!!

!!! नवगीत !!!



अब तो आजा मीत मेरे, पलकें हो गई नम।

गीत में यूं दर्द छिपें हैं, सासें हो गई गर्म।।

जीवन इक पल का लगता है,

दिन लगता इक वर्ष।

रातें तारों जैसी लगती है,

अनगिनती हर पल।।..... अब तो आजा.....

तुम बिन सूनी सब गलियां,

सूना लगता है उपवन।

जलघट बिन पनघट जाती हूं,

छलक-छलक जाता यौवन।।..... अब तो आजा ...

अखिंयां राह बिछी फूलों संग,

बगिया हैं बौराए सब।

प्राण उड़-उड़ जाते पत्तों से,

रूक जाती…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 10, 2013 at 7:29pm — 10 Comments

क़ृष्ण तुम बंसी बजाना

क़ृष्ण तुम बंसी बजाना

 

 

उन्मुक्त हो मुक्त गगन में,

छेड़ू मैं कोई तान प्यारी,

मधुर रस भरी प्रेम की,

क़ृष्ण तुम बंसी बजाना ।

 

गाएँगे सब पशु-पक्षी ,

आ जायेंगे तुम्हारे साथी भी,

बहेगी निःस्वार्थ प्रेम की गंगा,

क़ृष्ण तुम बंसी बजाना ।

 

भक्ति रस घुलेगा हवाओं में,

पहुँचेगा वृंदावन की गलियाँ,

नाचेगी सब गोपियाँ वहाँ…

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Added by akhilesh mishra on May 10, 2013 at 6:00pm — 18 Comments

नवगीत ::: नेता काटें ‘मोटा माल’

सामयिक मुद्दों पर एक नवगीत ...

 

रो रो कर जनता बेहाल

नेता काटें ‘मोटा माल’

 

साम्यवाद के पक्ष में

जितने दावे थे

सब ख़ारिज हैं…

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Added by वीनस केसरी on May 10, 2013 at 3:00pm — 24 Comments

वहशी लोग

गंदी नाली के कीड़े है ये वहशी लोग
जो रात –दिन पनप रहे है किसी   
गटर के गंदे पानी में.
छि: घिन्नता से भर रहा है मन
खिज रहा है इसकी दुर्गन्ध से
साँस भी लेना दुश्वार हुआ है
इस अमानवीय माहौल में…
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Added by POOJA AGARWAL on May 10, 2013 at 11:00am — 8 Comments

गजोधर भाई, आप तो शराब नहीं पीते थे!/ जवाहर

मैं शाम को अपने घर पर बैठा टी वी देख रहा था. टी वी के एक न्यूज़ चैनल पर सामयिक विषयों पर गरमा गरम बहस चल रही थी. तभी दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो गजोधर भाई थे.

मैने कहा – "आइये !"

उन्होंने कहा – "आज यहाँ नहीं बैठूंगा. चलिए कहीं बाहर चलते हैं."

मैंने कहा- "ठीक है चलेंगे. आइये पहले चाय तो पी लें. फिर चलते हैं."

उन्होंने कहा – "चलिए न बाहर ही चाय पीते हैं."

मैं उनके साथ हो लिया. चाय के दुकान जिसमे अक्सर हमलोग बैठकर चाय पीते थे, वहाँ न रुक कर गजोधर भाई के साथ और…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on May 10, 2013 at 4:30am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
भारत-तीर्थ

भारत तीर्थ

 (कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता से क्षमायाचना सहित कुछ पंक्तियों का हिन्दी भावानुवाद)

ओ मेरे मन जागो जागो

पुण्य तीर्थ में धीरे,

भारत के जन-मानस के

सागर तीर में.

यहाँ खड़े कर बाहु प्रसारित

नर-नारायण को नमन करुँ मैं,

उदार छन्द में परम आनन्द से,

उनका आज वंदन करुँ मैं.

ध्यानमग्न है यह धरती -

नदियों की माला जपती,

यहीं नित्य दिखती है मुझको

पवित्र यह धरणी रे…

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Added by sharadindu mukerji on May 10, 2013 at 12:50am — 6 Comments

सूखा

सूखा !

मही मधुरी कब से तरस रही ,

बुझी न कभी एक बूँद से तृषा ,

घनघोर घटाएँ लरज लरज कर ,

आयी और बीत चली प्रातृषा .

ईख की जड़ में दादुर बैठे ,

आरोह अवरोह में साँस चले ,

पानी की अहक लिये जलचर ,

ताल हैं शुष्क सबके प्राण जले .

पथिक राह चले बहे स्वेदकण ,

पथतरू* से प्यास बुझाए मजबूरन , * traveller’s tree

दूर कोई आवाज़ बुलाए कल् कल्…

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Added by coontee mukerji on May 9, 2013 at 10:30pm — 14 Comments

माँ तुम मेरी सहेली हो

माँ तुम अबूझ पहेली हो 
माँ तुम मेरी सहेली हो 

स्नेह की  डोर से बंधी 

ममता की…
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Added by दिव्या on May 9, 2013 at 3:30pm — 12 Comments

सुविधा

सुविधा 
बेटा तुम्हारी माँ की तबियत ठीक नहीं है तुम्हे देखना चाहती है .पिता ने फोन पर बेटे से गुजारिश सी की।
हाँ पापा मुझे भी माँ को देखने आना है अगले हफ्ते दो छुट्टी हैं उसमे आने की सोच रहा था लेकिन रिजर्वेशन नहीं मिल रहा है।बेटे ने अपनी मजबूरी…
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Added by Kavita Verma on May 9, 2013 at 1:02pm — 9 Comments

माँ

बहुत ख़ुशनसीब हैं

हम लोग

हमारे सिर पर

हाथ है माँ का

क्योंकि

माँ का आँचल

हर छत से ज़्यादा

मज़बूत होता है

सुरक्षित होता है…

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Added by नादिर ख़ान on May 9, 2013 at 1:00pm — 12 Comments

इम्तिहान

इश्क के इम्तिहान से सनम यूँ  घबरा गया,

छोड़ कर सागर मे कश्ती खुद किनारे आ गया ....



डूबने की चाहत उसे थी इश्क के दरियाओं मे ,…

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Added by Roshni Dhir on May 9, 2013 at 12:30pm — 16 Comments

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