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Kundan Kumar Singh
  • Male
  • New Delhi
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  • वेदिका
 

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Profile Information

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Male
City State
New Delhi
Native Place
Vaishali, Bihar
Profession
Student
About me
I am a simple living being with an opinion to look for a change in me and my surroundings.

Kundan Kumar Singh's Blog

आत्मनिंदा

ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब यौन शोषण की घटनाएँ खबरों में नहीं आती। खबर पढ़कर हृदय ग्लानि और अपराध-बोध के दलदल में धँस जाता है। खुद से पूछता हूँ- यह यौन शोषण है क्या? अब आप कहेंगे- कैसा अनपढ़ और गवाँर हूँ। यौन शोषण का अर्थ तक नहीं समझता। तो मैं आपसे पूछता हूँ। क्या आप सही मायने में इसका उत्तर बता सकते हैं? मेरा तात्पर्य उस प्रश्न से ही जुड़ा है। आखिर यह शोषण हमेशा स्त्रियों के साथ ही क्यों होता है? क्या यह शारीरिक रूप से पीड़ादायी है या मानसिक रूप से भी? क्या यह केवल शारीरिक है या पूर्णतः मानसिक?…

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Posted on March 20, 2014 at 4:00pm — 1 Comment

विरोधाभास

करीब सुबह के दस बजे थे। एक सभ्य कुलीन महिला पुलिस स्टेशन पहुंची। तेज कदमों से वह इंस्पेक्टर की टेबल के सामने जाकर खड़ी हो गई।

“मैं केस दर्ज कराने आई हूँ।‘’ महिला की आँखों में एक अजब-सा आक्रोश था।

“जी कहिए।“ इंस्पेक्टर ने टेबल पर पड़ी फाइलों से अपनी नजर हटाते हुए कहा।

“मेरा बलात्कार किया गया है।“

उसके इन शब्दों को सुनकर इंस्पेक्टर गंभीर हो गया। हाल-फिलहाल की घटनाओं को देखते हुए आला अधिकारियों की तरफ से सख्त निर्देश था कि ऐसे किसी भी मामले पर तुरंत कारवाई की जाए।…

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Posted on June 18, 2013 at 9:30am — 11 Comments

मैं तुम्हारी हूँ

मेरे  प्राणेश-

यह आखिरी शाम,

और वह भी ,बीत गयी।

तुम्हारी वह, खामोशी,

आज फिर से, जीत गयी।

कुछ भी तो मुझे न मिला,

न राधा का अभिमान,

न मीरा का सतीत्व।

फिर कैसे मिलता,

मेरे यौवन को व्यक्तित्व।

क्योंकि सागर की, बाहों में हीं,

नदी पाती है अस्तित्व।

काश! तुम समझ…

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Posted on May 7, 2013 at 9:00pm — 9 Comments

सुसाइड-नोट

माँ -

बहुत कोशिश की मैंने ,

इन आँसुओं को पीने की,

कुछ और,दिन जीने की।

इस अँधेरे , घर में,

जहाँ मेरा कुछ भी नहीं,

जहाँ मैं अभिशाप हूँ।

तुम्हारा कोई, पाप हूँ।

मगर मैं, अस्तित्वहीन ,

वेदना और दुख से क्षीण ,

आज भी, चुप-चाप हूँ।



यह मांग का सिंदूर,

जो सौभाग्य की निशानी है।

कैद मेरी आत्मा की,

अनकही, कहानी है।

जो कभी दुष्चक्र से,

निकल नहीं सकती।

मजबूर,अपने भाग्य को,

वह बदल नहीं सकती।

हर सुबह,जिसके…

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Posted on March 16, 2013 at 12:00pm — 7 Comments

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