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मैं तुम्हारी हूँ

मेरे  प्राणेश-

यह आखिरी शाम,

और वह भी ,बीत गयी।

तुम्हारी वह, खामोशी,

आज फिर से, जीत गयी।

कुछ भी तो मुझे न मिला,

न राधा का अभिमान,

न मीरा का सतीत्व।

फिर कैसे मिलता,

मेरे यौवन को व्यक्तित्व।

क्योंकि सागर की, बाहों में हीं,

नदी पाती है अस्तित्व।

काश! तुम समझ पाते,

मेरे जीवन की आश,

जैसे धरती और आकाश,

वही अधूरी प्यास,

तुम्हें पाने का एहसास।

शायद इसीलिए, अब तक,

चल रही थी साँस।

आज फिर वही तन्हाई है,

फर्क इतना- सा है,

कि तुम्हें मुझसे छुड़ाने,

स्वयं मौत चलकर आई है।

कैसे उसे समझाऊँ,

कि मैं एक विक्षिप्त हूँ।

तुम्हारी स्मृतियों के ,

अवसादों से लिप्त हूँ।

आज भी व्याकुल ,

विवश और, रिक्त हूँ।

करोड़ों सृष्टियाँ होंगी,

और करोड़ों जन्म।

यह आत्मा  ढुढ़ेगी,

जीवन  का मर्म।

मगर इसे मुक्ति न मिलेगी.

इस अधूरी आत्मा को,

कभी तृप्ति न मिलेगी।

क्योंकि मैं तुम्हारी हूँ।

सिर्फ तुम्हारी.........

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Kundan Kumar Singh on May 11, 2013 at 8:42pm

धन्यवाद आप सभी का। खूबसूरत प्रतिक्रियाओं के लिए। मैं बेहतर और श्रेष्ठ रचनाओं के लिए प्रयासरत रहूँगा।

Comment by विजय मिश्र on May 10, 2013 at 12:35pm
"कैसे उसे समझाऊँ,
कि मैं एक विक्षिप्त हूँ।
तुम्हारी स्मृतियों के ,
अवसादों से लिप्त हूँ।
आज भी व्याकुल ,
विवश और, रिक्त हूँ।" ---- मन को कहीं गहरे छू जाती हैं .कितना जटिल होता है ऐसी अनमनस्यकताओं को व्यक्त करना! सराहनीय है कुन्दनजी .
Comment by बृजेश नीरज on May 10, 2013 at 12:26pm

बहुत सुन्दर प्रयास! आपको बधाई!
भाई विक्षिप्तता और विरह की वेदना में फर्क होता है। आपकी कविता कहीं से प्रेमिका के विक्षिप्त होने को नहीं उकेरती।
सादर!

Comment by Kundan Kumar Singh on May 9, 2013 at 6:27pm

धन्यवाद विजय जी। आप सभी बड़ों का आशीर्वाद सर आँखों पर।

Comment by vijay nikore on May 9, 2013 at 12:48am

आपकी कविता में भाव अच्छे लगे।

आप एक अच्छे कवि बनने के मार्ग पर हैं

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Kundan Kumar Singh on May 8, 2013 at 9:31pm

 शुक्रिया इस प्रोत्साहन के लिए। हालांकि मंच से जुड़े हुए एक-दो महीने बीत गए हैं मगर व्यस्तता के कारण ज्यादा रचनाएँ पोस्ट नहीं कर पाया।

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 8, 2013 at 8:50pm

आदरणीय कुंदन कुमार सिंह जी सादर, मंच पर आपकी रचना प्रथम ही पढ़ रहा हूँ. बहुत सुन्दर रचना है. बधाई स्वीकारें.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 8, 2013 at 8:25am

आ0 कुन्दन जी,   अतिसुन्दर भाव, सुन्दर लय और समपर्ण। शुभकामनाओ सहित हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 8, 2013 at 5:15am

प्रयासरत रहें और इस मंच के अन्य रचनाकारों की सुगढ़ रचनाओं को पढ़ कर अपनी टिप्पणियाँ दें, कि, आपने उन रचनाओं में क्या पाया, समझा.

इस प्रस्तुति हेतु शुभेच्छाएँ.

कृपया ध्यान दे...

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