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कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

ईद मनाये हम सभी गले मिले सब आज

सर्व धर्म सद्भाव के अकबर थे सरताज |

अकबर थे सरताज, सभी का मान बढाया

नवरत्नों के साथ, गर्व से राज चलाया

सभी तीज त्यौहार सुखद अनुभूति कराये

बढे ह्रदय सद्भाव सभी अब ईद मनाये |…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 29, 2014 at 10:30am — 10 Comments

दोहे।

दिनकर मनमाना हुआ, गई धरा जब ऊब।

सूर्य रश्मियाँ रोक के, ......मेघा बरसे खूब।



त्राही दुनियां में मची, संकट में सब जीव।

बरखा रानी आ गई, .....कहे पपीहा पीव।



झूम रहे पत्ते सभी, पवन गा रही गीत।

वन्दन बरखा का करें, निभा रहें हैं रीत।



रंग धरा के खिल गए, शीतल पड़ी फुहार।

वन कानन नन्दन हुए , झूम उठा संसार।



पुष्प सभी हैं खिल उठे, जल की पड़ी फुहार।

भ्रमरों ने गुंजन किया, तितली ने मनुहार।



जल निमग्न धरती हुई, जन जीवन फिर…

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Added by seemahari sharma on July 29, 2014 at 10:30am — 10 Comments

क्या है जो रोज़ गुनाह करते हो --डा० विजय शंकर

क्या किसी भी सजा से नहीं डरते हो

क्यों रोज़ गुनाह पे गुनाह करते हो

दुनियाँ जहाँन की सब खबर रखते हो

खुद क्या हो बिलकुल बेखबर रहते हो

अपने कर्मों पे नज़र नहीं रखते हो

कौन क्या कर रहा परेशान रहते हो

औरों के खजाने पे नज़र रखते हो

कभी चोरी के नोट अपने गिनते हो

शेर की खाल में गीदड़ नज़र आते हो

घर में आईने बिलकुल नहीं रखते हो

बैसाखियाँ ले कर गुजर बसर करते हो

दौड़ में सबसे आगे हो, दम भरते हो

ईश्वर की दुनियाँ को बहुत बनाते हो

भगवान से… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 29, 2014 at 10:09am — 12 Comments

बैठक

याद आता है 

वो अपना दो कमरे का घर 

जो दिन मे 

पहला वाला कमरा 

बन जाता था 

बैठक .... 

बड़े करीने से लगा होता था 

तख़्ता, लकड़ी वाली कुर्सी 

और टूटे हुये स्टूल पर रखा 

होता था उषा का पंखा

आलमारी मे होता था 

बड़ा सा मरफ़ी का 

रेडियो ... 

वही हमारे लिए टी0वी0 था 

सी0डी0 था और था होम थियेटर 

कूदते फुदकते हुये 

कभी कुर्सी पर बैठना 

कभी तख्ते पर चढ़ना 

पापा की गोद मे मचलना…

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Added by Amod Kumar Srivastava on July 28, 2014 at 10:06pm — 11 Comments

गजल- रंग पानी सा....

गजल- रंग पानी सा....

बह्र - 2122, 2122, 2122



नारि ही जब शक्ति की दुर्गा-सती है।

आज कल हालात की मारी हुयी है।।



काल बन भस्मासुरों को भस्म कर दें,

निर्भया बन वह सड़क पर लुट रही है।



विष्णु-शिव-ब्रह्मा हुआ है आदमी अब,

सृ-िष्ट - नारी की कहानी त्रासदी है।



नित गरीबी आग में पकती रही पर,

भूख, बच्चों की पढायी सालती है।



रक्त नर का पी कपाली बन लड़ी जो,

खून में लथपथ शिवानी सो रही है।…



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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 28, 2014 at 9:00pm — 9 Comments

मुक्तक

1

न्याय पर जनतंत्र जन कल्याण पर,

अर्थ अवसरवाद का चेहरा लगा है/

रोशनी सर्वत्र जाने में विवश है,

बादलोँ का सूर्य पर पहरा लगा है/

2

तुम अँधेरे पंथ पर क्यों चल रहे,

रोशनी के जाल हमने तिर दिये हैं/

रह गई जो कालिमा दीपक तले,

उन अँधेरोँ से तो दीपक पल रहे हैं/

3

नीँद उड़ती जा रही है,रात रिसती रह गई/

धार में नौका ना जाने किस दिशा को गह गई/

उड़ गये बादल छलक पाताल का पानी गया,

फिर बिगड़ते सन्तुलन की बात धरती कह गई/

4

कहीं…

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Added by पं. प्रेम नारायण दीक्षित "प्रेम" on July 28, 2014 at 8:30pm — 4 Comments

गंगा के नाले (लघु कथा) // --शुभ्रांशु पाण्डॆय

"अरे वाह आज तो मजा आ गया", रमेश घर में घुसते ही चहकते हुये बोला, ".. दुकानदार ने सामान का बिल बनाते समय साढ़े पाँच सौ रुपये कम जोड़े !"

“पापा, फ़िर तो आपको वो लौटा देना था न !”, बेटी नेहा ने अपनी आँखो को और बडा़ करते हुये कहा.

“पागल हो क्या ?”, मानों उसकी नादानी पर हँसते हुये रमेश ने कहा, “.... आज हम पार्टी करेंगे…”

 

नेहा के मन में टीचर की बतायी बातें कौंध गयीं, “गंगा में तमाम नदियाँ ही नहीं मिलतीं, शहरों के गंदे नाले भी गिरते हैं.”

उसे लगा, वो गंगा में…

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Added by Shubhranshu Pandey on July 28, 2014 at 8:00pm — 12 Comments

इश्क करना भी हुनर इक हो गया

२१२२  ११२२  २१२

तेरी बातों से बड़ा हैरान हूँ

जिन्दगी मेरी बड़ा परेशान हूँ

क्या खता है, है सही क्या, क्या गलत

बेखबर इन से अभी नादान हूँ

मेरी खातिर है नहीं इक पल उन्हें 

जो कहा करते थे उनकी जान हूँ

इश्क करना भी हुनर इक  हो गया

इस हुनर से तो अभी अनजान हूँ

सांस चलती है तो जिंदा कहते सब

पर खबर मुझको कि मैं बेजान हूँ

है न चाहत का सबब मुझको पता

धड़कने कहती हैं बस  कुरवान…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 28, 2014 at 3:25pm — 10 Comments

दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

-----------------------------------------

ये मात्र दोहे हैं. चिकित्सा सलाह नहीं .

------------------------------------------

मानस चरचा हो रही सुनो लगा कर ध्यान

भव सागर तरिहो सभी इसको पक्का जान

-------------------------------------------

मटर पराठा खा गये  बैठे जितने लोग

लौकी सेवन नित करें भागें सगरे रोग

--------------------------------------

लौकी रस इक्कीस  दिन प्रातः पी लें…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 28, 2014 at 1:45pm — 14 Comments

बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !

मैं चाहता हूँ कि बिल्ली सी हों मेरी कविताएँ !

 

क्योकि -

युद्ध जीत कर लौटा राजा भूल जाता है -

कि अनाथ और विधवाएँ भी हैं उसके युद्ध का परिणाम !

लोहा गलाने वाली आग की जरुरत चूल्हों में है अब !

एक समय तलवार से महत्वपूर्ण हो जातीं है दरातियाँ !

 

क्योंकि -

नई माँ रसोई खुली छोड़ असमय सो जाती है अक्सर !

कहीं आदत न बन जाए दुधमुहें की भूख भूल जाना !

कच्ची नींद टूट सकती है बर्तनों की आवाज से भी ,

दाईत्वबोध पैदा कर सकता…

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Added by Arun Sri on July 28, 2014 at 10:47am — 24 Comments

रावण को तू राम बता

२२/२२/२२/२ 
.
रावण को तू राम बता,
और सहाफ़त काम बता. ...सहाफ़त-पत्रकारिता 
.

बिकने को तैयार हैं सब,
तू भी अपने दाम बता.
.

सीख ज़माने वाला फ़न,
धूप कड़ी हो, शाम बता. 
.

झूठ भी सच हो जाएगा,
बस तू सुब्हो शाम बता.   
.

चाहे काट हमारा सर,
पर पहले इल्ज़ाम बता.    

.

क़ातिल ख़ुद मर जाएगा,
बस मक़्तूल का नाम बता. 
.
निलेश "नूर"
मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on July 28, 2014 at 9:00am — 11 Comments

थर्राहट ... (विजय निकोर)

थर्राहट

कुछ अजीब-सा एहसास ...

बेपहचाने कोई अनजाने

किसी के पास

इतना पास क्यूँ चला आता है

विश्वास के तथ्यों के तत्वों के पार

जीवन-स्थिति की मिट्टी के ढेर के

चट्टानी कण-कण को तोड़

निपुण मूर्तिकार-सा मिट्टी से मुग्ध

संभावनाओं की कल्पनाओं के परिदृश्य में

दे देता है परिपूर्णता का आभास ...

उस अंजित पल के तारुण्य में

सारा अंबर अपना-सा

स्नेहसिक्त ओंठ नींदों में…

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Added by vijay nikore on July 28, 2014 at 1:30am — 15 Comments

आज यों निर्लज्जता सरिता सी बहती जा रही है

आज यों निर्लज्जता सरिता सी बहती जा रही है  

द्वेष इर्षा और घृणा ले साथ बढती जा रही है

 

बिन परों के आसमाँ की सैर के सपने संजोते

पा रहे पंछी नए आयाम सब कुछ खोते खोते

 

लालसा भी कोयले पर स्वर्ण मढ़ती जा रही है

 

दिन गए वो खेल के जब खेलते थे सोते सोते  

अब गुजरता है लडकपन पुस्तकों का बोझ ढोते  

 

दौड़ है बस होड़ की जो क्या क्या गढ़ती जा रही है

 

काश के पंछी ही होते लौट आते शाम होते

कोसते भगवान् को…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 28, 2014 at 1:00am — 3 Comments

ख़्याल

आज अचानक बेटा अपने बीबी बच्चों सहित गांव पंहुचा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । कहाँ तो बुलाने पे भी कोई न कोई बहाना बना देता था और अगर आया भी तो अकेला और उसी दिन वापस ।

" दादा , दादी के पैर छुओ बच्चों" , और बहू ने भी झुक के पैर छुए दोनों के । फिर बहू ने लाड़ दिखाते हुए कहा " क्या बाबूजी , आप कितने दुबले हो गए हैं , लगता है माँ आपका ध्यान नहीं रख पाती , अब आप लोग हमारे साथ ही चल कर रहिये" ।

"हाँ , हाँ , क्यों नहीं , बिलकुल अब आप लोग चलिए हमारे साथ , क्या रखा है अब यहाँ" ,…

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Added by विनय कुमार on July 27, 2014 at 10:36pm — 10 Comments

मस्त वर्षा ऋतु निराली !

मस्त वर्षा ऋतु निराली !

 

मस्त वर्षा ऋतु निराली, मेघ बरसे साँवरा ।

भीगती है सृष्टि सारी, देख मन हो बाँवरा ।।

झूमता सावन लुभाता, शोर करती है हवा ।

मग्न होकर मोर नाचें, गीत गाते हैं…

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Added by Satyanarayan Singh on July 27, 2014 at 7:30pm — 10 Comments

प्रतीक्षा // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा//

प्रतीक्षा

-------

प्रतीक्षा है

किसकी?

किसे है प्रतीक्षा

मन, मस्तिष्क

या आँखें

विभेद कठिन

आज तक स्मृति में है

वह सब कुछ

विस्मृत हो तो कैसे

क्या उसने भुला दिया होगा

शायद भुला सके

पर मैं नहीं भूल…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 27, 2014 at 5:00pm — 12 Comments


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Added by Rana Pratap Singh on July 27, 2014 at 1:30pm — 1 Comment

वर्षा प्रेम सुधा बरसाये

अवनी अम्बर जीव चराचर

सुख पा सब हर्षाये   

वर्षा प्रेम सुधा बरसाये

        

प्रियतम को आमंत्रित करने  

मेघ दूत बन आये   

नील गगन के मुख मंडल पर

श्वेत श्याम घन छाये

वर्षा प्रेम सुधा बरसाये

 

बहे पवन मदमस्त झूम के  

पुरवा मन अलसाये

प्रेम मिलन संकेत सरित ने

अर्णव संग जताये  

वर्षा प्रेम सुधा बरसाये

 

छैला दिनकर आज धरा से     

छिप छिप नैन लड़ाये  

प्रेम जलज बिहँसे इस जग…

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Added by Satyanarayan Singh on July 27, 2014 at 1:00pm — 12 Comments

चोर को पकड़ो ,सजा दो --डा० विजय शंकर

जिंदगी एक दंड है , अपराध है
गर नहीं कानूनों का साथ है
गरीबी एक नामुमकिन सी चीज है
हर पैदा होने वाला देश का नसीब है
ये देश ये दुनिया किसी की जागीर नहीं है
खिलाफ आदमी कानून बन जाए , सही नहीं है
न धरती तुम्हारी न पानी तुम्हारा
न यहां कोई मिलकियत तुम्हारी है
टैक्स लो और काम करो
चोर को पकड़ो , और सजा दो .
लोगों का जीवन आसान करो .
शासन करना लाज़िम है पर
हुक्म बजाने के न अरमान धरो .

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Added by Dr. Vijai Shanker on July 27, 2014 at 12:13pm — 6 Comments

काश मैं अपनी बेटी का पिता होता...

मैं शब्दों के भार को तौलता रहा

भाव तो मन से विलुप्त हो गया|

मैं प्रज्ञा की प्रखरता से खेलता रहा

विचारों से प्रकाश लुप्त हो गया|

मस्तिष्क धार की गति तो तीव्र थी,

मन-ईश्वर का समन्वय सुषुप्त हो गया|

...…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 27, 2014 at 11:20am — 5 Comments

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