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एक ग़ज़ल..भारती की शान हिंदी (हिंदी दिवस पखवाड़े पर)

हैं अनेकों धर्म भाषा, ...एक हिंदुस्तान है l

मातृभाषा हिन्द की, हिंदी हमारी जान है ll

--

देश की संस्कृति रिवाजों पर हमें भी गर्व हो l

भारती की शान हिंदी, . विश्व में पहचान है ll

--

नृत्य शंभू ने किया, डमरू बजा, ॐ नाद का l

देववाणी के सृजन से ..विश्व का कल्यान है ll

--

पाणिनी ने दी व्यवस्था व्याकरण की विश्व को l

हम सनातन छंद रचते ...गीत लय मय गान है ll

--

सूर तुलसी जायसी, ......भूषण कवि केशव हुए l

चंद मीरा पन्त दिनकर, काव्य मय…

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Added by harivallabh sharma on September 2, 2014 at 4:00pm — 12 Comments

हिंदी दिवस पखवाड़े पर एक नवगीत

संस्कृत बृज अवधी

से सुवासित,

मैं हिंदी हूँ हिन्द

की शान।

बीते सात दशक

आजादी,

अब तक क्यों ना

मिली पहचान।



दुनियाँ के सारे

देशों में,

मातृभाषा का प्रथम

स्थान।

उर्दू, आंग्ल, फ़ारसी

सबको,

आत्मसात कर दिया

है मान।

हिंदी दिवस मनाता

अब भी,

मेरा लाडला हिन्दुस्तान

बीते सात दशक......



मैं हूँ स्वामिनी अपने

घर की,

भाषा पराई करती

राज।

लज्जा आती मुझे

बोलकर,

इंगलिश…

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Added by seemahari sharma on September 2, 2014 at 3:30pm — 11 Comments

अमृता प्रीतम जी ... दर्द की दर्द से पहचान (विजय निकोर)

अमृता प्रीतम जी ... दर्द की दर्द से पहचान

स्मृतियों की धूल का बढ़ता बवन्डर ... पर उस बवन्डर में कुछ भी वीरान नहीं। कण-कण परस्पर जुड़ा-जुड़ा, कण-कण पहचाना-सा। प्रत्येक स्मृति से जुड़ी सुखद अनुभूति, बीते पलों को जीवित रखती उनको बहुत पास ले आती है, अमृता जी को बहुत पास ले आती है...कि जैसे बीते पल बारिश की बूंदों में घुले, भीगी ठँडी हवा में तैरते, लौट आते हैं, आँखों को नम कर जाते हैं...

आज ३१ अगस्त ... मेरी परम प्रिय अमृता जी का पुण्य जन्म-दिवस ... वह…

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Added by vijay nikore on September 1, 2014 at 5:00pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रिश्तों का अंतिम संस्कार ( एक अतुकांत चिंतन ) गिरिराज भंडारी

अच्छा ही करते हैं

कितना भी अपना हो

खून का हो या अपनाया हो प्यार से

मर जाने पर जला देते हैं

मुर्दा शरीर

न जलाएं तो सड़ने का डर बना रहता है

फिर इन्फेक्शन , बीमारी का भय

ज़िंदा लोगों के लिए खतरा ही तो है , किसी का मुर्दा शरीर

 

और फिर भूलने में भी सहायता मिलती है

कब तक याद करें

कब तक रोयें

जीतों को तो जीना ही है

अच्छा ही करते हैं जला के

 

कुछ रिश्ते भी तो मुर्दा हो जाते हैं / सकते…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 1, 2014 at 4:30pm — 20 Comments

जनता जागरूक नहीं

विक्रमादित्‍य ने वेताल को पेड़ से उतार कर कंधे पर लादा और चल पड़ा। वेताल ने कहा-‘राजा तुम बहुत बुद्धिमान् हो। व्‍यर्थ में बात नहीं करते। जब भी बोलते हो सार्थक बोलते हो। मैं तुम्‍हें देश के आज के हालात पर एक कहानी सुनाता हूँ।

विक्रमादित्‍य ने हुँकार भरी।

वेताल बोला- ‘देश भ्रष्‍टाचार के गर्त में जा रहा है। भ्रष्‍टाचार की परत दर परत खुल रही हैं। बोफोर्स सौदा, चारा घोटाला, मंत्रियों द्वारा अपने पारिवारिक सदस्‍यों के नाम जमीनों की खरीद फरोख्‍त, राम मंदिर-बाबरी मस्जिद की वोट…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 1, 2014 at 3:00pm — No Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हिन्दी भाषा पखवारे पर (नवगीत) // --सौरभ

अस्मिता इस देश की हिन्दी हुई

किन्तु कैसे हो सकी

यह जान लो !!

कब कहाँ किसने कहा सम्मान में..

प्रेरणा लो,

उक्तियों की तान लो !



कंठ सक्षम था

सदा व्यवहार में…

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Added by Saurabh Pandey on September 1, 2014 at 5:30am — 39 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आइडिया (लघु कथा )

‘’बहुत खुश दिख रही हो लाजो” गाँव से आई लाजो की सहेली कनिया ने कहा|

“हाँ हाँ क्यूँ नहीं बेटा बहू काम पर चले जाते हैं नौकरानी सब  काम कर जाती है बस घर में महारानी की तरह रहती हूँ” लाजो ने जबाब दिया|

कुछ देर की शान्ति के बाद फिर लाजो बोली”ये सुख तेरा ही तो दिया हुआ है उस दिन न तू उस बुढ़िया से पिंड छुडाने का आइडिया देती तो आगे भी न जाने कितने सालों तक मुझे उसकी गंद  उठानी पड़ती और मेरा रोहित दादी की सेवा के लिए मुझे वहीँ सड़ने के लिए छोड़े रखता, नरक बनी हुई थी मेरी…

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Added by rajesh kumari on August 31, 2014 at 1:00pm — 18 Comments

खुश खबरी--

" बेटा , अब दूसरे विवाह की तैयारी करो , इससे तो कुछ होना नहीं है " |
" लेकिन माँ , दूसरे में भी क्या भरोसा , थोड़ा और सबर करो " , और बात आई गयी हो गयी |
कुछ महीनों बाद खुश खबरी थी , माँ बहुत प्रसन्न हुई |
और बेटे का दोस्त जो कुछ दिनों पहले आया था , अचानक वापस चला गया |

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on August 31, 2014 at 2:57am — 6 Comments

क्षणिकाएँ -1--डा० विजय शंकर

क्षणिकाएँ

आकर्षित करती हैं , लुभाती हैं ,

क्षण भर को चौंका भी देतीं हैं ,

स्तब्ध भी कर देती हैं , बस .

फिर हम अपने - अपने

महाकाव्य में लौट आते हैं||



* * * * * * * * * * * * * * * * * *

हर व्यथा को हर कथा को

हर छोटी बड़ी बात को

साहित्य में छाप देने भर से

समस्याओं का अंत नहीं होता ,

समस्याओं से जूझना पड़ता है

उनकें हल यूँ नहीं मिलते

उन्हें ढूंढना पड़ता है ||



* * * * * * * * * * * * * * * * * *

सोहबत का असर होता… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 30, 2014 at 11:00am — 11 Comments

शुरुआत....(लघुकथा)

रमेश अपने बेटे व् त्यौहार पर आई हुई अपनी बहन के बेटे को, लेकर बाजार गया था, उसकी बहन कल अपने घर जाने वाली है. सोचा शायद उसके बेटे को कुछ दिलवा दिया जाये, उसे कुछ सस्ते से कपडे  एक दुकान से दिला लाया है. बहन के बेटे ने भी निसंकोच उन्हें स्वीकार कर लिया.  बाजार में रमेश का बेटा जिद करता रहा पर ,  उसने   अपने बेटे को कुछ नही दिलवाया है ...

“ पापा..!! मुझे तो वो ही वाले ब्रांड के कपडे चाहिए जो मैंने पसंद किये थे, कुछ भी हो उसी दुकान से दिलवाना पड़ेगा आपको..” रमेश के बेटे ने,  रमेश…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 29, 2014 at 2:08pm — 8 Comments

क्या ये हमारी संस्कृति के अंग नहीं ?....

क्या आपको याद है ... आपने आखरी बार कब डुगडुगी की आवाज सुनी थी ?कब अपनी गली या घर के रास्ते में  एक छोटी सी सांवली  लड़की को दो मामूली से बांस के फट्टियों के बीच एक पतली सी रस्सी पर चलते देखा और फिर  हैरतअंगेज गुलाटी मारते, बिना किसी सुरक्षा इन्तमाजात के | सोचिये , दिमाग पर जोर डालिए !!!

       चलिए आज मैं याद दिलाती हूँ | याद है बचपन में जब स्कुल से आकर आप अपना बस्ता फेंक ,माँ के हिदायत पर हाथ मुँह धोकर ,कपडें बदल कर  अपने दोस्तों के साथ झटपट खेलने जाने के मुड में होते थे तब…

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Added by MAHIMA SHREE on August 28, 2014 at 6:34pm — 15 Comments

घर और मायका (लघुकथा)

किचेन से रश्मि की आवाज आई ...... भाभी जरा मेरे कपड़े धुल देना, खाना बनाने के बाद धुलुंगी तो काॅलेज के लिए देर हो जायेगी! इतना सुनते ही सुमन का जैसे पारा गरम हो गया ...... बड़बड़ाते हुए बोली... सभी ने जैसे नौकर समझ लिया है, कुछ ना कुछ करने के लिए बोलते ही रहते हैं, आराम से टी0वी0 भी नही देखने देतें ........ देखिये जी ! अगर इसी तरह चलता रहा तो मैं मायके चली जाउँगी, मेरी भाभी बहुत अच्छी हैं, घर का सारा काम करती हैं,  वहाँ मुझे कुछ नही करना पड़ता, और मैं आराम से टी0वी0…

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Added by Pawan Kumar on August 28, 2014 at 6:06pm — 8 Comments

चूस हाथों के अंगूठे नन्हा बचपन सो गया

२१२२    २१२२     २१२२      २१२ 

 

वो कहें सागर  में मिलकर आज दरिया खो गया 

हम कहें सागर से दरिया मिल के सागर हो गया 

 

सोच कुछ तेरी जुदा है सोच कुछ मेरी अलग

सोचिये सोचों का अंतर आज  कैसा हो…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on August 28, 2014 at 9:57am — 17 Comments

एक ऐसी सास -- डा० विजय शंकर

श्वसुर के निधन पर रात भर की यात्रा पूरी करके वह घर में घुसी ही थी कि एक बार फिर जोर से रोना शुरू हो गया . वह अपनी सास से लिपट के रोये जा रही थी और उन्हें सांत्वना भी देती जा रही थीं . रिश्तेदार दोनों को समझाने, चुप कराने में लगे थे . थोड़ी देर बाद सब आगे की व्यवस्था में लग गए पर उसके आंसू जैसे रुक ही नहीं रहे थे , रोते रोते बोली , " यह कल ही होना था , कल मेरा जन्मदिन था . अब मैं अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाऊँगीं " . सास अब तक कुछ संयत हो चुकी थीं , बड़े प्यार से बहू का सर सहलाते हुए बोलीं, " नहीं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 27, 2014 at 11:22pm — 10 Comments

बोझ

सारी उमर मैं बोझ उठाता रहा जिनका

उन आल-औलादों की वफ़ा गौर कीजिये

मरने के बाद मेरा बोझ ले के यूँ चले

मानो निजात पा गए हों सारे बोझ से

मैंने समझ के फूल जिनके बोझ को सहा

छाती से लगाया जिन्हें अपना ही जानकर

वे ही बारात ले के बड़ी धूम धाम से

बाजे के साथ मेरा बोझ फेंकने चले

अपने लिए ही बोझ था मै खुद हयात में

अल्लाह ये तेरा भला कैसा मजाक है

ज्योही जरा हल्का हुआ मै मरकर बेखबर

खातिर मै दूसरों के एक बोझ बन गया

लगती थी बोझ जिन्दगी उनके बिना…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 27, 2014 at 10:02pm — 13 Comments

सिकुड़ा हुआ समय

पृथ्वी की धुरी के इशारों पर

यूं तो नाचता है समय...

विस्मृत क्षण हो गए धूमिल

कई दिनों से गुम था समय...

कितने ही वर्षों से ढूंढता

पूछता था जिससे वो कहता

“मेरे पास तो नहीं है समय...”…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 27, 2014 at 6:51pm — 15 Comments

राह देखी सूर्य की भर रात हमने - ( गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2122     2122     2122

*************************

सिंधु  मथते  कर पड़ा  छाला हमारे

हाथ  आया  विष  भरा प्याला हमारे

***

धूर्तता  अपनी  छिपाने  के लिए क्यों

देवताओं    दोष    मढ़   डाला  हमारे

***

भाग्य सुख को ले चला जाने कहाँ फिर

डाल  कर  यूँ  द्वार  पर  ताला  हमारे

***

हर  तरफ  फैले हुए हैं दुख के बंजर

खेत  सुख  के  पड़ गया पाला हमारे

***

राह  देखी  सूर्य  की  भर   रात हमने

इसलिए  तन  पर  लगा काला…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 27, 2014 at 11:14am — 10 Comments

याद बहुत ही आती है तू

याद बहुत ही आती है तू, जब से हुई पराई।

कोयल सी कुहका करती थी, घर में सोन चि‍राई।

अनुभव हुआ एक दि‍न तेरी, जब हो गई वि‍दाई।

अमरबेल सी पाली थी, इक दि‍न में हुई पराई।

परि‍यों सी प्‍यारी गुड़ि‍या को जा वि‍देश परणाई।।

याद बहुत ही आती है तू---------

लाख प्रयास कि‍ये समझाया, मन को कि‍सी तरह से।

बरस न जायें बहलाया, दृग घन को कि‍सी तरह से।

वि‍दा समय बेटी को हमने, कुल की रीत सि‍खार्इ।

दोनों घर की लाज रहे बस, तेरी सुनें…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on August 27, 2014 at 8:00am — 5 Comments

ग़ज़ल/ इस धरती के नाम लिखूंगा हरियाली मैं (डॉ. राकेश जोशी)

जब भी आऊंगा खाकर तुमसे गाली मैं

इस धरती के नाम लिखूंगा हरियाली मैं

 

छोटे-छोटे बच्चों की उंगली थामूंगा

आसमान तक दौड़ लगाऊंगा खाली मैं

 

हरेक महल के हर पत्थर से बात करूंगा

मज़दूरों के लिए बजाऊंगा ताली मैं

 

जिस दिन तेरे बच्चे भी पढ़ने जाएंगे

उस दिन तुझे कहूँगा 'हैप्पी दीवाली' मैं

 

खेतों में सपने फिर से उगने लगते हैं

जब भी करता हूँ बातें फसलों वाली…

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Added by Dr. Rakesh Joshi on August 26, 2014 at 9:46pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़रीब के हाथ से निवाला न छीनिए (ग़ज़ल 'राज')

12122 12122 1212

कभी लबों तक पँहुचता प्याला न छीनिए

 ग़रीब के हाथ से निवाला न छीनिए  

 

यतीम का बचपना निराला न छीनिए

जमीन, दरगाह या शिवाला न छीनिए

 

बड़ी नहीं कोई चीज़ तहजीब से यहाँ      

नक़ाब, सिर पे ढका दुशाला न छीनिए

 

नसीब में क्या लिखा यहाँ कौन जानता          

किसी जवाँ दीप का उजाला न छीनिए

 

समान हक़ है मिला सभी को पढ़ाई का

गरीब बच्चों से  पाठ शाला न छीनिए 

 

जुड़े खुदा से…

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Added by rajesh kumari on August 26, 2014 at 5:00pm — 31 Comments

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