२१२२ २२१२ २१२२ २२
अब जो जायेंगे उस गली तो सबा छेड़ेगी
वारे उल्फ़त! मुझको मेरी ही वफ़ा छेड़ेगी
..
जिसको आँखों में भरके फिरते थे हम इतराते
हाय जालिम तेरी कसम वो अदा छेड़ेगी
..
जो गुजरते हर एक दर पे थी हमने मांगी
राह में मिलके मुझसे वो हर दुआ छेड़ेगी
..
वो जो बातें ख्यालों की ही रह गई बस होकर
बेसबब बेवख्त आ मुद्दा बारहा छेड़ेगी
..
सुनते ही जिसको तुम चले आते थे दौड़े
हाँ…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 1, 2015 at 6:00pm — 25 Comments
सोनाली हर बार यानि पिछले आठ वर्षों से अपना जन्म -दिन , घर के पास के पार्क में खेलने वालों बच्चों के साथ ही मनाती है। उनके लिए बहुत सारी चोकलेट खरीद कर उनमे बाँट देती है।आज भी वह पार्क की और ही जा रही है।उसे देखते ही बच्चे दौड़ कर पास आ गए।और वह ...! जितने बच्चे उसकी बाँहों में आ सकते थे , भर लिया। फिर खड़ी हो कर चोकलेट का डिब्बा खोला और सब के आगे कर दिया।बच्चे जन्म-दिन की बधाई देते हुए चोकलेट लेकर खाने लगे।
" एक बच्चा इधर भी है , उसे भी चोकलेट मिलेगी क्या ...?" सोनाली के पीछे से…
ContinueAdded by upasna siag on July 1, 2015 at 5:30pm — 9 Comments
तरही ग़ज़ल
2122 1122 1122 22
ये तबाही भरे मंजर नहीं देखे जाते
आँखों में गम के समंदर नहीं देखे जाते
फलसफा इश्क का मैं आज तुम्हे समझा दूं
इश्क में रहजन-ओ –रहवर नहीं देखे जाते
एक मुफलिस की ग़ज़ल सुनके बज्म झूम उठी
रुतवे महफ़िल में सुखनवर नहीं देखे जाते
इक सदी होने को आयी हमें आज़ाद हुए
मुझसे हैं लोग जो बेघर नहीं देखे जाते
रिंद गर सच्चा तू होता तो खुद समझ लेता
खाली क्यूँ मुझसे ये सागर नहीं देखे जाते
खेलती थी…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on July 1, 2015 at 4:44pm — 18 Comments
२२ २२ २२ २२
कहीं पे' ठण्डी' बयार जिन्दगी ।
कहीं लगे अंगार जिन्दगी ।।
पतझड और बहार जिन्दगी ।
सुख दुख का व्यापार जिन्दगी ।।
जाने कितने रंग से' खेलें।
होली का त्यौहार जिन्दगी ।।
नानी माँ की गोद में' है तो।
इमली,आम,अचार जिन्दगी ।।
इश्क के' मारों से जो पूछा।
दिलबर का दीदार जिन्दगी ।।
उनके होंटों के साहिल पर।
फूलों सी रसदार जिन्दगी ।।
कौन समझ पाया है इसको।
उलझन का संसार जिन्दगी ।।…
Added by Rahul Dangi Panchal on July 1, 2015 at 2:00pm — 18 Comments
Added by मनोज अहसास on July 1, 2015 at 1:45pm — 13 Comments
समुद्र में मिलती नदी ने समुद्र से कहा, "बहुत खुश हूँ आज, सीमित असीम में समा रही है, कोई सीमा का बंधन नहीं..."
समुद्र चुप रहा|
उस चुप्पी को देख तट और तलहटी दोनों मुस्कुरा उठे|
(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 1, 2015 at 12:30pm — 12 Comments
Added by Pari M Shlok on July 1, 2015 at 12:16pm — 22 Comments
२१२ १२२ २
गली गली बुहारूँ क्या?
नालियाँ निथारूँ क्या ?
काम छोड़ कर अब मैं
रास्ता निहारूँ क्या?
आसमां से उतरे हो
आरती उतारूँ क्या?
धूल लग गई शायद
पाँव भी पखारूँ क्या?
देखना है चेह्रा अब
आईना सँवारूँ क्या?
लाए कुछ नए जुमले
शब्द मैं सुधारूँ क्या?
धूप लग रही क्या जी
अब्र को पुकारूँ क्या?
वोट मांगने आये
पांच…
ContinueAdded by rajesh kumari on July 1, 2015 at 12:00pm — 27 Comments
“दोनो पैरों के अँगूठों में बन्धी रस्सी भी खोल दो, चिता पर कोई भी गाँठ या बन्धन नहीं होता..”
“चिता पर सारे बन्धन खत्म हो जाते हैं” - किसी और ने कहा.
सुनते ही राकेश पत्नी प्रिया और उसके बीच के सबसे बडे़ बन्धन एक साल के बेटे को अपने सीने से लगाये प्रिया के निर्जीव शरीर को चुपचाप देखता हुआ फिर से फ़फ़क पड़ा.
*************************
(मौलिक व अप्रकाशित)
Added by Shubhranshu Pandey on July 1, 2015 at 12:00am — 22 Comments
बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २
जिस्म की रंगत भले ही दूध जैसी है
रूह भी इन पर्वतों की दूध जैसी है
पर्वतों से मिल यकीं होने लगा मुझको
हर नदी की नौजवानी दूध जैसी है
छाछ, मक्खन, घी, दही, रबड़ी छुपे इसमें
पर्वतों की ज़िंदगानी दूध जैसी है
सर्दियाँ जब दूध बरसातीं पहाड़ों में
यूँ लगे सारी ही धरती दूध जैसी है
तेज़ चलने की बिमारी हो तो मत आना
वक्त लेती है पहाड़ी, दूध जैसी…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 6:24pm — 26 Comments
हमारा प्यार आँखों से अयाँ हो जाएगा इक दिन
छुपाना लाख चाहोगे बयाँ हो जाएगा इक दिन
ये सब वहशत-ज़दा रातें इसी उम्मीद में गुज़रीं
कि तुम आओगे , रौशन ये समां हो जाएगा इक दिन
न टूटे दिल , न तन्हा रात , न भीगी हुई पलकें
मगर सब छीन कर बचपन,जवां हो जाएगा इक दिन
तुम्हारे सुर्ख होठों की महक में ऐसा जादू है
कि भवरों को भी फूलों का गुमाँ हो जाएगा इक दिन
लिखो बस गीत उल्फ़त के और नग्मे प्यार के…
ContinueAdded by saalim sheikh on June 29, 2015 at 11:30am — 19 Comments
“मेरे ग्रैंड फादर राय बहादुर थे” ..... उस व्यक्ति ने बुद्धिजीवियों की सभा में अकड़ के साथ यह बात कही । सभा के आयोजक ने भी गर्व से अपना सर ऊंचा कर लिया । वहाँ उपस्थित लोग जो उस व्यक्ति को मिल रहे विशेष सम्मान, तवज्जो , उसके समृद्ध पहनावे एवं उसकी मंहगी गाड़ी से पहले ही नतमस्तक हो रहे थे, यह सुनकर थोड़े और विनीत भाव दिखलाने लगे। उसे मंच पर सबसे ऊंची कुर्सी दी गयी । सब उसके साथ एक फोटो खिचवा लेना चाहते थे । महेश सभा में सबसे पीछे की कुर्सी पर उपेक्षित सा बैठा अपने मलिन कपड़ों को देख रहा था। वह…
ContinueAdded by Neeraj Neer on June 28, 2015 at 6:25pm — 22 Comments
लघुकथा- आग
बरसते पानी में काम को तलाशती हरिया की पत्नी गोरी को बंगले में कुत्ते को बिस्कुट खाते हुए देख कर कुछ आश जगी, ‘ यहाँ काम मिल सकता है या खाने को कुछ. इस से दो दिन से भूखे पति-पत्नी की पेट की आग बुझ सकती थी.’
“ क्या चाहिए ?”
“ मालिक , कोई काम हो बताइए ?”
“ अच्छा ! कुछ भी करेगी ?” संगमरमरी गठीले बदन पर फिसलती हुई चंचल निगाहें उस के शरीर के रोमरोम को चीर रही थी.
“ जी !! ” वह धम्म से बैठ गई. उसे आज महसूस हुआ कि बिना तन की आग बुझाए पेट की आग नहीं बुझ…
ContinueAdded by Omprakash Kshatriya on June 28, 2015 at 1:30pm — 18 Comments
पढाया गया था-
‘मैन इज ए सोशल एनिमल’
हमने भी रट लिया
औरों की तरह
पर मन नहीं माना
कहाँ पशु और कहाँ हम
पर एक दिन जाना
पक्षी और पशु
दोनों ही बेहतर है
हम जैसे मानव से
क्योंकि
भूख सबको लगती है
पर पक्षी
न घुटने टेकता है
और न हाथ फैलाता है
रोता भी नहीं
गिडगिडाता भी नहीं
हाथ तो मित्र
पशु भी नहीं फैलाते
बल्कि वे…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 28, 2015 at 1:13pm — 9 Comments
"सर, हमारे अमरूदों के बाग़ में कुछ लोग रोज़ शाम को शराब पीते हैं साथ में जुआ भी..."
"एफ.आई.आर. करवा दो|"
"कोई फायदा नहीं सर, उसमें कुछ पुलिस वाले भी हैं..."
"तो फिर ये मूर्ती ले जाओ, शराब की बदबू अगरबत्ती और फूलों की खुश्बू में बदल जायेगी|"
(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on June 28, 2015 at 12:37pm — 9 Comments
२१२२/२१२२/२१२/
मंज़िलों का जो पता दे जाएगा
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा दे जाएगा.
.
और थोड़ा फ़ासला दे जाएगा
ज़िंदगी की गर दुआ दे जाएगा.
.
दिल को सतरंगी छटा दे जाएगा
फिर धड़कने की अदा दे जाएगा.
.
ग़म हमें अब और क्या दे जाएगा
बस नया इक तज्रिबा दे जाएगा.
.
आएगा कोई पयम्बर फ़िर नया
फ़िर नया हम को ख़ुदा दे जाएगा.
.
जब वो सोचेगा हमारे वास्ते
फिर वो मीरा, राबिया दे जाएगा.
.
“नूर” बरसेगा ख़ुदा का एक दिन
मुश्किलों…
Added by Nilesh Shevgaonkar on June 28, 2015 at 10:54am — 31 Comments
Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 28, 2015 at 9:22am — 13 Comments
सिरा है मेरा काला ,
तन है मेरा सफ़ेद |
मोल नहीं कुछ मेरा ,
करूँ अगर रंगों में मेरे भेद |
कोई ना जाने मोल मेरा,
गर रहूँ मैं डिब्बे में बंद |
बाहर निकल कर रगड़ जो खाऊं ,
तब बनु मैं ज्योत अखंड |
रहती हूँ अपनी सहेलियों के सांथ,
काम आती रहेंगी जो आपके ,
मेरे जाने के भी बाद |
लौ के रूप में उत्साह के सांथ हम बाँट लेती हैं एक दूजे का दर्द /``\ /``\
त्योहारों में दिया जलाकर खुशियां भी लाती हूँ |
बीड़ी-सिगरेट को जला कर धूम्रपान भी फैलाती…
Added by Rohit Dubey "योद्धा " on June 27, 2015 at 7:59pm — 7 Comments
बिछा मेरा जमीं पे दिल कदम अपने बढ़ाती है
मुझे ही प्यार करती है कसम भी रोज खाती है
न कोई प्यार अब लिखना, किताबो से मिटा देना
वफा कैसे करें पढ कर जला वो दिल दिखाती है
जुदाई चीज है ऐसी कही खुशियाँ कही दे गम
जुदा नभ से हो बूँदे प्यास धरती की मिटाती है
खिलो मत एे कमल अब तुम, तुझे देखे न अब दुनिया।
तुम्हारा नाम ले जिसको, पुकारू वो सताती है।।
छुपा लो चाँद को बादल, न है अब रौशनी प्यारी
उजाला देख कर मुझको, किसी की याद आती है
किसे…
Added by Akhand Gahmari on June 27, 2015 at 5:05pm — 5 Comments
Added by सूबे सिंह सुजान on June 27, 2015 at 2:12pm — 6 Comments
2026
2025
2024
2023
2022
2021
2020
2019
2018
2017
2016
2015
2014
2013
2012
2011
2010
1999
1970
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |