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एक्सपायरी ( लघुकथा )

" साहब , ई सब खाने वाला समान को जलवा देंगे आपलोग ", गोदाम में रखते हुए जोखन ने पूछा |
" हाँ , इनकी एक्सपायरी हो गयी है और ये नुक़्सान पहुँचा सकते हैं लोगों को , इसलिए इनको जलाना पड़ेगा "|
" हमको दे दो साहब , जब भूख प्यास हम लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाती है तो ये क्या नुक़्सान करेगा | बच्चे दुआ देंगे आपको "|
एक बार उसने जोखन की आँखों में देखा , फिर मन में सोचा " मैं चांस नहीं ले सकता | कुछ हो गया तो ?
थोड़ी देर में सारा सामान जल रहा था और जोखन की आँखों में कुछ देर पहले जले उम्मीदों के दिए बुझ गए थे |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on July 8, 2015 at 12:37am

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी , आपके मार्गदर्शन की जरुरत रहती है । सादर ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2015 at 12:21am

इस लघुकथा के होने पर मैं आपको हृदयतल बधाई कह रहा हूँ, आदरणीय ..
शुभ-शुभ

Comment by विनय कुमार on June 28, 2015 at 2:42pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथलेश वामनकर जी , आपकी अनुपस्थिति खल रही थी आजकल.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 4:04am

एक सत्य को अभिव्यक्त करती प्रभावकारी और सफल लघुकथा 

हार्दिक बधाई आदरणीय विनय जी 

Comment by विनय कुमार on June 24, 2015 at 7:36pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय ओम प्रकाश जी .

Comment by Omprakash Kshatriya on June 24, 2015 at 7:12pm
Comment by विनय कुमार on June 24, 2015 at 6:40pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी .

Comment by विनय कुमार on June 24, 2015 at 6:39pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी.

Comment by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 5:16pm

आ. विनय सर  सुन्दर मार्मिक  लघुकथा , हार्दिक  बधाई  ! सादर  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 24, 2015 at 4:26pm

बहुत बढ़िया , आदरनीय

कृपया ध्यान दे...

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