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बूँद बूँद बरसो

मत धार धार बरसो

 

करते हो

यूँ तो तुम

बारिश कितनी सारी

सागर से

मिल जुलकर

हो जाती सब खारी

 

जितना सोखे धरती

उतना ही बरसो पर

कभी कभी मत बरसो

बार बार बरसो

 

गागर है

जीवन की

बूँद बूँद से भरती

बरसें गर

धाराएँ

टूट फूट कर बहती

 

जब तक मन करता हो

तब तक बरसो लेकिन

ढेर ढेर मत बरसो

सार सार बरसो

---------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 509

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 10:08am

शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 3:54am

बढ़िया नवगीत 

बहुत बधाई आपको 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 26, 2015 at 3:07pm
शुक्रिया आदरणीय सुनील जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 26, 2015 at 3:06pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय हरि प्रकाश जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 26, 2015 at 3:06pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गोपाल नारायण जी
Comment by shree suneel on June 25, 2015 at 6:08pm
सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय. अच्छी लगी. बधाई आपको.
Comment by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 5:46pm

आदरणीय   धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी ,सुन्दर भावों  से सजी  इस रचना पर  हार्दिक बधाई  ! सादर   

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 24, 2015 at 4:32pm

जब तक मन करता हो

तब तक बरसो लेकिन

ढेर ढेर मत बरसो

सार सार बरसो----------------------- धर्मेन्द्र जी , बहुत बढ़िया ,

कृपया ध्यान दे...

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