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ग़ज़ल : सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

हर एक शक्ल पे देखो नकाब कितने हैं

सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

 

जले गर आग तो उसको सही दिशा भी मिले

गदर कई हैं मगर इंकिलाब कितने हैं

 

जो मेर्री रात को रोशन करे वही मेरा

जमीं पे यूँ तो रुचे माहताब कितने हैं

 

कुछ एक जुल्फ़ के पीछे कुछ एक आँखों के

तुम्हारे हुस्न से खाना ख़राब कितने हैं

 

किसी के प्यार की कीमत किसी की यारी की

न जाने आज भी बाकी हिसाब कितने हैं

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 6, 2015 at 6:05pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय जवाहर लाल जी

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 1, 2015 at 12:17am

वाह वाह न कहूं तो क्या कहूं ...पहली पंक्ति ने आत्मविभोर कर दिया 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 10:05am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विनय कुमार जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 10:05am

शुक्रिया आदरणीय सुनील जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 10:04am

शुक्रिया आदरणीय मोहन बेगोवाल जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 10:04am

शुक्रिया आदरणीय गोपाल नारायन जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 10:04am

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 10:03am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय दिनेश कुमार जी

Comment by विनय कुमार on June 28, 2015 at 11:11pm

// हर एक शक्ल पे देखो नकाब कितने हैं
सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं // , वाह , वाह , बहुत उम्दा ग़ज़ल , बधाई आदरणीय.

Comment by shree suneel on June 28, 2015 at 6:51pm
हर एक शक्ल पे देखो नकाब कितने हैं
सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं... बहुत ख़ूब
अच्छी ग़ज़ल हुई आदरणीय धर्मेंद्र जी. बधाई हो

कृपया ध्यान दे...

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