For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,167)

सिर्फ विभीषण बनता है- ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 22 2



अधरों पर झूठी मुस्कान, जिसमें भरी कुटिलता है।

सच तो ये है हे भैय्या जी, खद्दर उसी पे जँचता है।।



जाग रहे लोगों से भारत वासी का कब हृदय मिला।

जो संसद में ही सोता हो, वो ही असली नेता है।।



विष का घूँट तुम्हारी ख़ातिर, जो पी ले वो पागल है।

बीच सदन पव्वा ले बैठे, मान उसी का होता है।।



युग बदला परिभाषा बदली, गद्दारी क्या होती है?

भारत का आदर्श आज कल, सिर्फ विभीषण बनता है।।



साक्षरता के दर के आंकड़े, पर मत जाओ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2016 at 10:03pm — 4 Comments

ग़ज़ल...कहीं से तुम चले आओ

1222         1222         1222        1222



तड़फते हैं सभी मंज़र कहीं से तुम चले आओ

​हवा की पालकी लेकर कहीं से तुम चले आओ 



खमोशी रात की औ दूर तक तन्हाई का आलम

रुके से जल में है कंकर कहीं से तुम चले आओ



क्षितिज के पार से किरणें सुहानी मुस्कुराईं यूँ

चुभे ज्यूँ रूह में खंजर कहीं से तुम चले आओ



मिटाने से नहीं मिटता ये रिश्ता आसमानी है

रहेगा जन्म जन्मान्तर कहीं से तुम चले आओ



अज़ब सी बेबसी हर सूं सफ़र भी कातिलाना…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 6, 2016 at 10:00pm — 4 Comments

गीत (सार छंद)/सतविन्द्र कुमार

गीत(सार छ्न्द)प्रयास

-------–

आज पड़े सावन के झूले,सबके मन हर्षाते

भूल गए मुझको तो साजन,याद बहुत हैं आते



बूँद पड़े जब तन पर मेरे तन शीतल हो जाता

आग लगी अंतस में जो है उसको कौन बुझाता

प्रेम पर्व पर प्रियतम सबको,जानूँ खूब सुहाते

भूल गए मुझको तो साजन याद बहुत हैं आते।1।



सोहे सभी सिंगार सहेली जब, साजन हो संगी

बिन साजन के सजना भी तो, लगता है बेढंगी

सारे हार सिंगार सजन जी ,तुझे रिझाने लाते

भूल गए मुझको तो साजन याद बहुत हैं… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 6, 2016 at 6:31pm — 8 Comments

ग़ुल अहसासों के ......

ग़ुल अहसासों के ......

क्यों

कोई

अपना

बेवज़ह

दर्द देता है

ख़्वाबों की क़बा से

सांसें चुरा लेता है

ज़िस्म

अजनबी हो जाता है

रूह बेबस हो जाती है

इक तड़प साथ होती है

इक आवाज़

साथ सोती है

कुछ लम्स

रक्स करते हैं

कुछ अक्स

बनते बिगड़ते हैं

शीशे के गुलदानों में

कागज़ी फूलों से रिश्ते

बिना किसी

अहसास की महक के

सालों साल चलते हैं

फिर क्यों

इंसानी अहसासों के रिश्ते

ज़िंदा होते हुए…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 6, 2016 at 4:19pm — 6 Comments

न जानूँ मैं

न जानूँ मैं

न जानूँ मैं
तुम निराकार को
तुम्हारे आकार को
मूर्ति बन कहीं होते हो
कहीं होते हो एक प्रतीक बनकर
कोई कहता है
हो तुम ह्रदय में
कोई खोजता है
तुम्हें मन्दिर मस्जिद में
तुम गरीब में तुम ही अमीर में
तुम ही वन
तुम ही सागर
हर परिंदे की उड़ान तुम ही
हर जगह हो तुम
फिर भी ओझल हो आँखों से
न जानूँ तुमको मैं
प्रेम हो बस यह मानूँ मैं ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 6, 2016 at 11:00am — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल- कोई खुश है, आओ ताली हम भीं दे दें ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   22 - बहरे मीर

अर्थ निकालें, उनको लाली हम भी दे दें

जो भी मर्ज़ी आये गाली हम भी दे दें

 

किसी शहर में हुआ सुना है आज धमाका

कोई खुश है, आओ ताली हम भीं दे दें

 

दूर बहुत, आये हैं अपने आकाओं से ,

थोड़ी सी उनको रखवाली हम भी दे दें

 

थाली के बैंगन वैसे तो साथ लगे. पर  

कोई कारण, कोई थाली हम भी दे दें

 

वैसे तो तैनाती दिखती सभी बाग़ में

फर्दा की खातिर कुछ माली हम भी दे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 6, 2016 at 9:22am — 10 Comments

गज़ल

श्रृंगार से ये तन तुम, यूँ और मत सजाओ,

छूते हुए लगे डर, फौलाद अब बनाओ।।



मेहंदी सुहाग चूड़ा, कमजोरी की निशानी,

हाथों में लो कलम तुम, तलवार सा चलाओ।।



मेहँदी भी है पिया की, चूड़ी भी है पिया की,

कुछ तो दिमाग खोलो, अपना भी कुछ बताओ।।



जीवन गया ये अपना, पानी के भाव बहकर,

अपना नहीं रुका पर, बेटी का तुम बचाओ।।



देते हो दूसरों को, उपदेश जिंदगी के,

कुछ तो करो शरम अब, खुद भी तो आजमाओ।।



छोडो मुहब्बतों को, जीना नहीं है आसां,

है… Continue

Added by sarita panthi on August 6, 2016 at 8:23am — 5 Comments

दोहे {सावन}

भारत में हर मास में, होता इक त्यौहार

केवल सावन मास है, पर्वों से भरमार |1|

 

रस्सी बांधे साख में,  झूला झूले नार

रिमझिम रिमझिम वृष्टि में, है आनन्द अपार |२|

 

जितने हैं गहने सभी, पहन कर अलंकार

साथ हरी सब चूड़ियाँ, बहू करे श्रृंगार |३|

 

काजल बिन्दी साड़ियाँ, माथे का सिन्दूर

और देश में ये नहीं, सब हैं इन से दूर |४|

 

कभी तेज धीरे कभी, कभी मूसलाधार

सावन में लगती झड़ी, घर द्वार अन्धकार…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on August 6, 2016 at 8:00am — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
गाय हमारी माता है // --सौरभ

गाय हमारी माता है

हमको कुछ नहीं आता है..



हमको कुछ नहीं आता है

कि, गाय हमारी माता है !



गाय हमारी माता है

और हमको कुछ नहीं आता है !?



जब गाय हमारी माता है

हमको कुछ क्यों नहीं आता है ?



गाय हमारी माता है

फिरभी हमको कुछ नहीं आता है !



फिर क्यों गाय हमारी माता है..

जब हमको कुछ नहीं आता है ?



तो फिर, गाय हमारी कैसी माता है

कि हमको कुछ नहीं आता है ?



चूँकि गाय हमारी माता है..

क्या…

Continue

Added by Saurabh Pandey on August 6, 2016 at 1:30am — 19 Comments

बिन पैंदी का लौटा (लघुकथा)

मैं न बदलूंगा

"तुम्हारे जैसा चमचा नहीं देखा आज तक । कितनी चापलूसी कर लेते हो तुम । और देखो तो दोनों मेनेजर तुम्हारी मुट्ठी में हैं ।" अ ने ब से कहा

"अब यह तो अपनी अपनी कला है । हाँ यह सच है दोनों मेनेजर मेरी बात मानते है । पर मैं चमचा हूँ यह कैसे कह दिया तुमने । "

" सुनो अ यह अपनी अकड़ अपने पास ही रखो । मैं ही नहीं सारा ऑफिस स्टाफ यही कहता है । सब बेवकूफ तो नही । वैसे तुम एक बिन पेंदी के लौटे हो । तुम्हारे जैसा बेशर्म इंसान नहीं देखा है मैंने सुना है एक मेनेजर ने तुमको घर बुलाया… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 5, 2016 at 5:46pm — 8 Comments

गीत (विधाता छ्न्द)

1222,1222,1222,1222



कभी छाया मिली गहरी ,कभी फिर धूप पड़ती है

चले जीवन सही साथी,नहीं मुश्किल अकड़ती है



जमाना ये उसे चाहे दुखों को जो भुलाता है

सतत बढ़ता चला जाए नहीं खुद को रुलाता है

मुसीबत को बहुत छोटी,समझ कर जो चला जाए

खुदा देखो उसे ही तो ज़माने में सदा लाए

नहीं तो देख लो कितनी यहाँ पर उम्र झड़ती है

चले जीवन सही साथी,नहीं मुश्किल अकड़ती है।1।



मुहब्बत एक प्यारा सा ख़ुशी का ही खज़ाना है

इसी को पास रखकर ही हमें जीवन बिताना… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 4, 2016 at 11:00pm — 10 Comments

शब्दों का सैलाब (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

विद्यालय के स्टाफ-रूम में शिक्षकगण लाल-स्याही की परम्परागत औपचारिक रस्म निभा रहे थे। उत्तर-पुस्तिकायें कई तरह से व्यवस्थित या अव्यवस्थित अपनी बारी की प्रतीक्षा में थीं। निर्धारित समय सीमा में उनको जांचने व मूल्यांकन करने का कार्य सम्पन्न करना था।



मानसिक दबाव सहते शिक्षकों में से एक ने कहा- "ये लाल कलम कब थमेगी?कब थमेगा यह सैलाब?"



दूसरे शिक्षक ने कहा- "शब्दों का मेला है, छल्ले डालो जनाब! आइने हैं बच्चों की ये उत्तर-पुस्तिकायें! जागो और जगाओ जनाब!"



तभी प्राचार्य… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 4, 2016 at 7:29pm — 11 Comments

निर्जन पगडंडी - एक नयी राह

" तुमसे कुछ भी कहना बेकार है । तुम कभी नहीं सुधर सकते । जाने कितनी बार जेल जा चुके हो , हर बार कहते हो बस यह आखरी चोरी है , फिर वही करने लग जाते हो । तुम्हारे पीछे तुम्हारे परिवार वालों को जो परेशानियाँ होती है , तुमने कभी इस और ध्यान ही नहीं दिया ......।"रमेश अपने दोस्त को कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था पर वह दोस्त तो !!!

"बन्द करो अपनी शिक्षा दिक्षा नहीं सुनना तुमसे कोई भाषण । मेरी मर्ज़ी जो चाहूँ करूँ । बचपन से करते आया हूँ । घर में किसीने नहीं रोका अब यह मेरी बेरी बीवी जब से आई है…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 4, 2016 at 3:30pm — 11 Comments

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है

अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर

बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल

ख्वाबों और यादों की गली में उम्र गुजारी है

समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल

कहने को तो कह लेते है अपनी बात सबसे हम

जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल

ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता

अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है

क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल

कुछ…

Continue

Added by Madan Mohan saxena on August 4, 2016 at 1:03pm — 3 Comments

आखिर क्यों?(अतुकांत)-रामबली गुप्ता

वो समुद्रतट की

चांदनी रातें

सुहानी बातें

रजनी का रजनीकर के

स्नेहिल ज्योत्स्ना में

नहाना

भीगना।

प्रेम-सिक्त

पुलकित

यामिनी के

निःशब्दता में

चुम्बन

आलिंगन

रति-परिणय, आहा!

हृदय में

उमड़ते

लहराते

गहरे प्रेमधि का

विश्वास

और

गंभीर जलधि की

उपेक्षा

पर आज

वो दृश्य नही

प्रेमधि नही

सिर्फ अश्रुधि

वही रजनी

रजनीकर

निःशब्दता

किन्तु

सर्प की भाँति डंसता… Continue

Added by रामबली गुप्ता on August 4, 2016 at 12:37pm — 8 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 42

कल से आगे ..........

‘‘दोनों बाहर आओ जरा। कुछ वार्ता करनी है।’’ रावण के सो जाने पर सुमाली ने वजृमुष्टि और मारीच से कहा।

दोनों कुटिया से निकल आये। जो मंथन सुमाली के मस्तिष्क में चल रहा था वहीं इनके मस्तिष्कों में भी चल रहा था। रावण की मनस्थिति लंका के सर्वनाश की द्योतक थी। रावण की अनुपस्थिति में विष्णु के लिये उन्हें पुनः समाप्त करना बच्चों का खेल ही था। विष्णु के लिये उन पर आक्रमण करने के लिये कुबेर के साथ किया घात ही पर्याप्त कारण था। और देखो तो विष्णु की टाँग यहाँ भी अड़ी थी।…

Continue

Added by Sulabh Agnihotri on August 4, 2016 at 9:14am — No Comments

धंधे का उसूल(लघुकथा)राहिला

एक भिखारी के झोपड़े में आग क्या लग गयी,सारी मीडिया मछों की तरह भिनभिन करती मौका-ए-वारदात पर पहुँच गयी ।ये एक सामान्य आगजनी की घटना हो सकती थी ,लेकिन उस झोपड़े से जो जले हुए नोटों के बोरे के बोरे बरामद हुए ,ये खास खबर थी ।अब इस घटना को किस तरह सारे दिन की खबर बनाना है इसकी कबायत में मीडिया बाल की खाल निकल रही थी।

"बाबा!भीख मांग ,मांग कर करोड़ों रुपये जमा किये।और आज उनमें आग लग गयी।इससे तो अच्छा होता आप इन रुपयों का भरपूर उपयोग कर लेते।अच्छा खाते ,अच्छा पहनते।"

"आपके कहने का मतलब है हम… Continue

Added by Rahila on August 4, 2016 at 6:30am — 17 Comments

गीत,हरिगीतिका छ्न्द पर प्रथम प्रयास

नारी

------

अबला बनीं सबला अभी तो हम उन्हें सम्मान दें

उत्साह से वे कर रहीं हर काम को अब मान दें



चलते रहे यह मानकर कुछ कर नहीं सकती कभी

कमजोर उनको मानते अब तक चले हैं जी सभी

हैं जानते यह हम सभी सबला हुई अब नार हैं

जीवन उन्हीं से चल रहा,वे ही सबल आधार हैं

नारी सही हैं बढ़ रहीं अपने वतन पर जान दें

उत्साह से वे कर रहीं हर काम को अब मान दें।



इक कल्पना ने था रचा इतिहास सब हैं जानते

आकाश पर लहरा गई थी जो ध्वजा पहचानते

लक्ष्मी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 3, 2016 at 5:00pm — 11 Comments

वह प्रीत की फसल उगाती है/ कविता

मेरा निश्छल मन

किसी से बैर

या शत्रुता नहीं

पालता है।



वह पालता है

प्रीत की सघनता को

वो बहता रहता है

भाव की अविचलता में

उसे फुरसत नहीं

प्रेम में बहते रहने से

उसकी दृष्टि हटती नहीं

अपने प्रियतम से।



हृदय की गहन तलहटी में

उनकी गुंजों में डूबी हुई

भोर की दूर्बा-सी

ओस को आँखों में सजाये

गुँथा करती है

प्रतिदिन जयमाल

मन के फूलों से।



कोकिल-सी कूक लिये

अंधकार को बेधा करती… Continue

Added by kanta roy on August 3, 2016 at 2:35pm — 12 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 41

कल से आगे ..............

सुमाली ठीक एक वर्ष बाद वहीं पहुँच गया जहाँ उसने रावण को छोड़ा था। उसके साथ मारीच और वजमुष्टि भी थे। रावण उस कुटिया में नहीं था। उन्होंने चारों ओर खोजा, थोड़ी ही दूर पर एक दूसरी कुटिया के बाहर बैठा रावण उन्हें दिख गया। वहाँ पहुँचते ही वे चैंक कर रह गये। रावण की गोद में एक छोटी से कन्या थी जो उसकी छाती में दूध खोजने की व्यर्थ प्रयास कर रही थी। सामने एक चिता जल रही थी। रावण का मुँह उतरा हुआ था जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो। बाल बिखरे हुये, आँखें लाल जैसे कई…

Continue

Added by Sulabh Agnihotri on August 3, 2016 at 10:07am — No Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय, मैने तो आना के हिसाब से ही सब काफिया लिखे है। पूरी रचना पर टिप्पणी करते तो कुछ सीखने का…"
1 hour ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें। शेर का शेर के रूप में पूरा होना और एक…"
6 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"उदाहरण ग़ज़ल और उदाहरण क़ाफ़िया को देखें उससे क़ाफ़िया "आना" निर्धारित होता है जबकि…"
7 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"इस मंच पर ग़ज़ल विधा पर जितनी चर्चा उपलब्ध है उसे पढ़ना भी महत्वपूर्ण है। इस पर विशेष रूप से ध्यान…"
7 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"धन्यवाद ऋचा जी।  गिरह ख़ूब हुई // आप भी मनजीत जी की तरह फ़िरकी ले रहीं हैं। हा हा "
7 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय अजेय जी नमस्कार  बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई आपकी बधाई स्वीकार कीजिए  गिरह ख़ूब…"
7 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीया मनप्रीत जी  बहुत शुक्रिया आपका हौसला अफ़ज़ाई के लिए  सादर "
7 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय अजेय जी नमस्कार  बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई के लिए आपका  सादर "
7 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीया मनप्रीत जी नमस्कार  बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई आपकी बधाई स्वीकार कीजिए  चौथे शेर का ऊला…"
7 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय जयहिंद जी  ग़ज़ल का अच्छा प्रयास किया आपने बधाई स्वीकार कीजिए  गुणीजनों की…"
7 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"दिल दुखाना नहीं कि तुझ से कहेंहै फसाना नहीं कि तुझ से कहें गांव से दूर घर बनाया हैहै बुलाना नहीं…"
22 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"धन्यवाद आदरणीय "
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service