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मुख-शशि उज्ज्वल औ' धनु-भौहें

सरसी छंद



शिल्प-16,11 पर यति, चार चरण और दो पद, पदांत में गुरु-लघु।



भाव शब्द-कल गुरु लघु यति का, रखकर समुचित ध्यान।

दोहा तोटक रोला सरसी, रचिये छंद सुजान।।1।।



सोलह ग्यारह पर यति प्रति पद, गुरु-लघु पद के अंत।

चार चरण दो पद का सरसी, गायें सुर-नर-संत।।2।।



मुख-शशि उज्ज्वल औ' धनु-भौहें, तिरछे नैन-कटार।

हाय! डसें लट-अहि केशों के, हिय पर बारम्बार।।3।।



अरुण अधर-कोमल किसलय नव, दृग-मद पूर्ण तड़ाग।

यौवन-पुष्प खिला ज्यों लेकर घट भर… Continue

Added by रामबली गुप्ता on November 13, 2017 at 8:07am — 14 Comments

अशान्तिदूत (लघुकथा)

“उफ्फ़... थक गया ऐसे भाषणों, नारों और झांकियों से!” हांफते हुए वह एक सूखे से पेड़ की शाखा पर जा बैठा। स्वाधीनता दिवस समारोह में सरे आम अपने कुछ साथियों के साथ क़ैद रहा ‘शांति का प्रतीक’ वह कबूतर लम्बे इन्तज़ार के बाद साथियों के साथ गगन में मुक्त तो कर दिया गया था, लेकिन उसने एक अलग उड़ान भरी और धोखे से क़ब्रिस्तान जा पहुंचा था।



“परेड मैदान और मंच पर मौजूद लोगों में से कोई तो तोता, शेर, गधा, बंदर, कुत्ता, गिद्ध या गीदड़ नज़र आ रहा था, तो कोई पप्पू जैसा।” यह सोचते हुए अभी भी उसके कानों… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 13, 2017 at 12:00am — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
इश्क इससे क्यूँ दुबारा हो गया (ग़ज़ल 'राज')

२१२२ २१२२ २१२

थोड़े  थोड़े में गुजारा हो गया 

मुश्तभर किस्सा हमारा हो गया 



कहकशाँ में ढूँढती बेबस नज़र    

ख़्वाब  अपना  इक सितारा हो गया

 

चाँद की चाहत कभी हमने न की 

एक जुगनू ही सहारा हो गया 

 

छटपटाती देख बेघर सीपियाँ 

दिल समन्दर का किनारा हो गया

 

बेवफा इस जिन्दगी ने फिर ठगा        

इश्क इससे क्यूँ दुबारा हो गया

 

 बातों बातों हार बैठे दिल को हम  

 बेखुदी में बस  ख़सारा हो…

Continue

Added by rajesh kumari on November 12, 2017 at 8:29pm — 22 Comments

'आपके पास है जवाब कोई'

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़इलुन/फेलुन





मेरे ग़म का है सद्दे बाब कोई

आपके पास है जवाब कोई



सुनके मेरी ग़ज़ल कहा उसने

अपने फ़न में है कामयाब कोई



उतनी भड़केगी आतिश-ए-उल्फ़त

जितना बरतेगा इज्तिनाब कोई



सबसे उनको छुपा के रखता हूँ

तोड़ डाले न मेरे ख़्वाब कोई



पास है जिनके दौलत-ए-ईमाँ

उन पर आता नहीं अज़ाब कोई



कोई उस पर यक़ी नहीं करता

अच्छा बन जाए जब ख़राब कोई



आमने सामने हों जब दोनों

उनको देखे कि माहताब… Continue

Added by Samar kabeer on November 12, 2017 at 3:06pm — 29 Comments

हरेक ज़ुल्म गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं - सलीम रज़ा रीवा ( ग़ज़ल )

  • 1212 1122 1212 22

    -

    हरेक ज़ुल्‍म गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं.

    जिन्हे है ख़ौफ़-ए-ख़ुदा वो ख़ुदा से डरते हैं 

    -

    न…
Continue

Added by SALIM RAZA REWA on November 12, 2017 at 10:00am — 28 Comments

देश के भविष्य

तु देश का भविष्य है,

ऐ कैसा तेरा भेष है,

जिस कंधों पर होना चाहिए बस्ता,

उस कंधों पर कितना बोझ है !!



तु उन चारदीवारों से क्यों दूर है,

शिक्षा की मन्दिर से कहां गुम है,

जिस हाथ में होना चाहिए कलम,

उस हाथ को चाय बेचने का काम है !!



ज़िन्दगी का अध्ययन का पल तुमसे क्यों दूर है,

आखिर तू भी उसी अल्लाह का नूर है,

जिस आंखों में होना चाहिए ख्वाब,

उन आँखों में दर्द आंसूओं का सैलाब है !!



सरकार और परिवार चुप क्यों है,

ये बच्चे… Continue

Added by Sushil Kumar Verma on November 12, 2017 at 9:33am — 7 Comments

तालिका छंद

तालिका छंद
सगण सगण(112 112)
दो-दो चरण तुकांत
---
दिन रात चलें
हम साथ चलें
सह नाथ रहें
सुख दर्द सहें

बिन बात कभी
झगड़े न सभी
मन प्रेम भरें
हरि कष्ट हरें

शुभ काम करो
तब नाम करो
सब वैर तजो
हरि नाम भजो

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 12, 2017 at 7:43am — 14 Comments

लघुकथा--एटीकेट्स

" विजेश ! विजेश ! हू इज़ विजेश ।"

" आई एम विजेश सर ।" डरता-डरता विजेश सिर झुकाकर खड़ा हो गया ।

" व्हेरी गुड ! यू आर विजेश । तुम्हारी कई दिनों से शिकायतें आ रही है कि तुम क्लास और स्कूल परिसर में गुटखा-पाऊच खाते हो । क्या यह सच है ? जवाब दो ।"

थोड़ी चुप्पी के बाद वह साहस जुटाकर बोला-" सॉरी सर , बट आज के बाद कभी नहीं खाऊँगा । प्रॉमिस सर !"

" ओके ! सीट डाउन एण्ड मैण्टेन यूअर एटीकेट्स । अब सभी बुक निकालकर रीडिंग शुरू करें ।" पूरी क्लास लेसन रीडिंग में तल्लीन हो गई । थोड़ी ही देर में… Continue

Added by Mohammed Arif on November 11, 2017 at 11:17pm — 12 Comments

न बदले गर ये हालात

*1222 1221



न बदले गर ये' हालात।

फिर आ जायेगी बरसात।।



भले ही कुछ दिनों बाद

मगर होगी करामात।।



तुम आशिक हो ही' बदनाम

दिखा दी अपनी' औकात।।



मुझे कोई न इतराज़

कभी कर लो मुलाकात।।



करूँ कैसे अब इतिबार,

तुम आये हो अकस्मात।।



किसी से कुछ न अब उम्मीद,

सुनो मेरे खयालात​।।



फ़ना तुझपे दिलो जान

करूँ तो फिर बने बात।।



ज़वानी जोश में आज

न कर बैठे कुछ उत्पात।।



नहीं है 'दीप'… Continue

Added by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 11, 2017 at 10:50pm — 4 Comments

पीला माहताब ...

पीला माहताब ...

ठहरो न !

बस

इक लम्हा

रुक जाओ

मेरे शानों पे

जरा झुक जाओ

मेरे अहसासों की गठरी को

जरा खोलकर देखो

जज्बातों के ज़जीरों पे

हम दोनों की सांसें

किस क़दर

इक दूसरे में समाई हैं

मेरे नाज़ार जिस्म के

हर मोड़ पर

तुम्हारी पोरों के लम्स

मुझे

तुम्हारे और करीब ले आते हैं

थमती साँसों में भी

मैं तुम्हारी नज़रों की नमी से

नम हुई जाती हूँ

देखो

वो अर्श के माहताब को

हिज़्र…

Continue

Added by Sushil Sarna on November 11, 2017 at 8:33pm — 10 Comments

सब कहते हैं...

सब कहते हैं शहर में भी सहर होता है
पर शहर में बसर कहाँ बशर होता है

दूर दूर जहाँ तक नज़र जाती है
धुँआ धुँआ शहर ये ज़हर ढोता है

दाग़ ग़ालिब का ये जो पुराना शहर है
बात बात में गालियों का हर्जाना भरे है

क्या हो गया है इस नए ज़माना ए नस्ल को
रिश्तों को सरेआम सरेबाज़ार करे हैं

शब ओ सहर ए उजाला ए फ़साना
शहर ए ग़म की कहानी कहे है

क्या कहूँ अब किस्सा ज़िंदगी का
सब अपनी अपनी कहानी कहे हैं

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

Added by anamika ghatak on November 11, 2017 at 11:04am — 5 Comments

लघुकथा - गिरगिट –

लघुकथा - गिरगिट –

"गुरूजी, आपकी इस अपार सफलता का भेद क्या है? पिछले बाईस साल से राजनीति में आपका एक छ्त्र राज है"?

गुरूजी ने दाढ़ी खुजलाते हुए, गंभीर मुद्रा बनाने का नाटक करते हुए उत्तर दिया,

"मित्रो, राजनीति बड़ी बाज़ीगरी का  धंधा है। अपनी लच्छेदार बातों से लोगों को मंत्र मुग्ध करना होता है| इसमें सफल होना इतना सरल नहीं जितना दिखता है"।

"गुरूजी, हम तो आपके अंध भक्त हैं, कुछ गुरूमंत्र दीजिये जो भविष्य में हमारे काम आ सके"?

"पहली चीज़ तो यह गाँठ बाँध लो कि इसमें…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 11, 2017 at 10:53am — 14 Comments

लाइलाज़ (लघुकथा)

“भाभी, उस तरफ़ मत देखो; इस तरफ़ देखो! यह देखो कितना सुन्दर बच्चा! बिल्कुल वैसा ही, जैसा बैडरूम में भैया के लगाये पोस्टर में है, है न!”



“हां, बहू अच्छे चेहरे देखती रहो, अच्छी फिल्में देखो, भगवान ने चाहा तो तू भी मुझे ज़ल्दी ही सुंदर सा पोता देगी!”



सरकारी अस्पताल के महिला वार्ड के आख़री बैड पर अपनी मां के सिरहाने बैठी सम्मो अगले पलंग के पास बैठे किसी परिवार के सदस्यों की बातें सुन कर अपनी मां को और दूध पीती अपनी नन्हीं बहन को बड़ी दया से देखने लगी। मां का उतरा हुआ पीला सा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 10, 2017 at 10:59pm — 13 Comments

हमेशा जिसने मेरे साथ बस जफ़ा की है-ग़ज़ल

हमेशा जिसने मेरे साथ बस जफ़ा की है

उसी के वास्ते दिल ने मेरे दुआ की है



शराब लाने में ताख़ीर क्यों भला की है

ये इंतज़ार की शिद्दत भी इंतहा की है



तुम्हारे शेर से बेहतर हमारे शेर कहाँ

कि शेर ग़ोई की हमने तो इब्तदा की है



हर एक लफ्ज़ संवर जाये शेर के मानिंद

किसी ने आज ख़ुदा से इल्तजा की है



बड़ी कशिश है मेरे यार तेरे जलवों में

इसी लिए तो मेरे दिल ने भी खता की है



क़सम जो खाई है मजबूर हो के उल्फत में

क़सम तुम्हारी नहीं ये क़सम… Continue

Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on November 10, 2017 at 10:53pm — 2 Comments

बेसबब यूँ मुस्कुराना बस करो

2122 2122 212

हो गई पूरी तमन्ना बस करो ।

बेसबब यूँ मुस्कुराना बस करो ।।



फिक्र किसको है यहां इंसान की ।

फिर कोई ताज़ा बहाना , बस करो ।।



होश में मिलते कहाँ मुद्दत से तुम।

इस तरह से दिल लगाना, बस करो ।।



बेवफा की हो चुकी खातिर बहुत ।।

राह में पलकें बिछाना, बस करो ।।



घर मे कंगाली का आलम देखिये ।

गैर पर सब कुछ लुटाना ,बस करो ।।



रंजिशों से कौन जीता इश्क़ में।हार कर अब तिलमिलाना, बस करो ।।





कर गई दीवानगी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on November 10, 2017 at 5:11pm — 2 Comments

मेरा इंतज़ार करना

मेरे प्रियतम

मेरा इंतज़ार करना

जब बादल झूम कर बरसे

धरती की प्यास बुझाने

मोह जताने

पर

तेरे मन की प्यास

मिलन की प्यास

देख

वो तर ना हो पाए

जब वो गौरैया उन्मुक्त हो जाये

चहचहाये

ख़ुशी फ़ैलाने

तुझे मनाने

पर तेरी आँखों से उदासी का गीत

चुरा गाये

जब सूरज पूरब की बाँहों में

खिले , मुस्काये

पर तेरे सूखे अधर देख

बीती रात

पश्चिम के…

Continue

Added by Vishal Goyal on November 10, 2017 at 2:49pm — 4 Comments

ग़ज़ल : बरसेगा तेज़ाब एक दिन बादल से

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २

आह निकलती है यह कटते पीपल से

बरसेगा तेज़ाब एक दिन बादल से

 

माँगे उनसे रोज़गार कैसे कोई

भरा हुआ मुँह सबका सस्ते चावल से

 

क़ै हो जाएगी इसके नाज़ुक तन पर

कैसे बनता है गर जाना मखमल से

 

गाँव, गली, घर साफ नहीं रक्खोगे गर

ख़ून चुसाना होगा मच्छर, खटमल से

 

थे चुनाव पहले के वादे जुम्ले यदि

तब तो सत्ता पाई है तुमने छल से

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 10, 2017 at 2:38pm — 5 Comments

आप से क्या मुहब्बत हुई

आप से क्या मुहब्बत हुई ।

रात भी अब कयामत हुई ।।



जब भी आए तेरे दर पे हम ।।

दुश्मनों की इजाफ़त हुई ।।



हुस्न था आपका कुछ अलग ।

आप ही की हुकूमत हुई ।।



यूँ संवरते गए आप भी ।

हुस्न की जब इनायत हुई ।।



अब चले आइये बज्म में ।

आपकी अब जरूरत हुई ।।



जाइये रूठ कर मत कहीं ।

आपसे कब अदावत हुई ।।



है तकाजा यहां उम्र का ।

आईनों की हिदायत हुई ।।



कुछ अदाएं मचलने लगीं ।

आंख से जब हिमाकत हुई… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on November 10, 2017 at 12:26pm — 13 Comments

उनका बस इन्तिज़ार अच्छा था-ग़ज़ल

2122 1212 22/112



उनका बस इन्तिज़ार अच्छा था

यार मैं बे क़रार अच्छा था



गम रहा जो क़रीब दिल के बहुत

वो ख़ुशी से हज़ार अच्छा था



कौन कातिल था देख पाया नहीं

तेज़ नजरों का वार अच्छा था



मेरी उम्मीद तो रही कायम

तेरा झूठा ही प्यार अच्छा था



सौदा दिल का किया हमेशा ही

उनका वो रोज़गार अच्छा था



देख कर जीत की खुशी उनकी

हारना उनसे यार अच्छा था



खीझ कर माँ पसीजना तेरा

मार पर वो दुलार अच्छा… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 9, 2017 at 10:13pm — 12 Comments

ग़ज़ल -ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बगैर-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया :अर ; रदीफ़ : कहे बगैर 

बह्र :२२१  २१२१  १२२१  २१२ (१)

ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बग़ैर 

आता सदा वही बुरा’ अवसर कहे बग़ैर |

बलमा नहीं गया कभी’ बाहर कहे बग़ैर

आता कभी नहीं यहाँ’, जाकर कहे बग़ैर |

है धर्म कर्म शील सभी व्यक्ति जागरूक

दिन रात परिक्रमा करे’ दिनकर कहे बग़ैर | 

दुर्बल के  क़र्ज़  मुक्ति  सभी होनी  चाहिए

क्यों ले ज़मीनदार सभी कर कहे बग़ैर |

सब धर्म पालते मे’रे’ साजन, मगर…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on November 9, 2017 at 9:30pm — 10 Comments

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