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सबसे छोटा क़ाफ़िया और सबसे बड़ी रदीफ़ पर एक और ग़ज़ल - सलीम रज़ा रीवा


212 212 212 212, 212 212 212 212

-

जब तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी /

लब तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी //

-

तुम मेरे साथ हो, चांदनी रात हो, होंट की बात हो, ज़ुल्फ़ की बात हो /

तब तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी //

-

हम नहीं चाँद तारे ये काली घटा गूंचा ओ गुल ये बुलबुल ये महकी फिज़ा /

सब तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी //

-

हम गुनहगार है, हम सियह कार हैं, फिर भी रहमो करम पे यकी है हमें /

रब तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी //

-

ऐ  रज़ा दर - बदर हम भटकते रहे  प्यार क्या , प्यार का इक निशाँ ना मिला /

अब तुम्हारी महब्बत में खो जाएंगे बिगड़ी क़िस्मत भी इक दिन संवर जाएगी //

-

 "मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by SALIM RAZA REWA on Saturday

जनाब मुझे यक़ीन है आपकी कोशिश ज़रूर रंग लाएगी ,

Comment by Samar kabeer on Saturday
वैसे तो इमकान नज़र नहीं आता,फिर भी कुछ सोचता हूँ भाई ।
Comment by Abhinav Arun on Friday

नवल प्रयोग ,बढ़िया है !!

Comment by SALIM RAZA REWA on November 17, 2017 at 10:52am

आली जनाब समर साहिब,

इस ग़ज़ल को सही करने के लिए आपकी मदद की ज़रुरत है। 

Comment by Samar kabeer on November 16, 2017 at 5:11pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब, तस्दीक़ साहिब सही फ़रमा रहे हैं,रदीफ़ और क़ाफिये में रब्त नहीं है ।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 16, 2017 at 12:04pm

आदरणीय Shyam Narain Verma ji' जी ,
आपकी नवाजिश के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Shyam Narain Verma on November 16, 2017 at 12:03pm
बहुत सुन्दर ग़ज़ल, हार्दिक बधाई l
Comment by SALIM RAZA REWA on November 16, 2017 at 12:00pm

आली जनाब तस्दीक़ साहिब ,
आपकी ग़ज़ल पे शिरकत और महब्बत के लिए शुक्रिया ,
जनाब यहाँ पर खोने का मतलब गुम हो जाना नहीं है ,

दीवानगी से है और जब हम किसी के प्यार में खो जाते हैं तो यक़ीनन हम अपनी मंज़िल पा लेते हैं।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 16, 2017 at 11:28am

जनाब सलीम साहिब , ग़ज़लकी अच्छी कोशिश हुई है , मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ
आपने जो रदीफ़ चुनी है उसका क़ाफ़िए के साथ तालमेल नहीं हो पा रहा
है , खो जाने पर क़िस्मत कैसे सँवरेगी ------देखिएगा

Comment by SALIM RAZA REWA on November 15, 2017 at 11:12pm
जनाब अफरोज साहब,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया, आप सही कह रहे हैं, पुरानी ग़ज़ल में भी आपका माश्वारा तहे दिल से तस्लीम है, आप कि मुहब्बत कि हमेशा तलब रहती है. महब्बत सलामत रहे....

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