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चांद का टुकड़ा है या कोई परी या हूर है - सलीम रज़ा रीवा

2122 2122 2122 212

चांद  का टुकड़ा है या कोई  परी या हूर है 
उसके चहरे पे चमकता हर घड़ी इक नूर है

-

हुस्न पर तो नाज़ उसको ख़ूब था पहले से ही 
आइने को देख कर वो और भी मग़रूर है

-

हार  कर रुकना नहीं मंज़िल भले ही दूर हो           
ठोकरें  खाकर सम्हलना वक़्त का दस्तूर है

-

हौसले  के  सामने तक़दीर  भी  झुक जायेगी
तू बदल सकता है क़िस्मत किसलिए मजबूर है

-

आदमी की चाह हो तो खिलते है पत्थर में फूल
कौन सी मंज़िल भला इस आदमी  से दूर  है

-

ख़ाक  का है पुतला  इंसाँ  ख़ाक में मिल जाएगा
कैसी दौलत कैसी शुहरत क्यों भला मग़रूर है

-

वक़्त से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता कभी
वक़्त  के  हाथो  यहाँ  हर  एक शय  मजबूर  है

-

उसकि मर्ज़ी के बिना हिलता नहीं पत्ता कोई 
उसका हर एक फैसला हमको रज़ा मंज़ूर है

-

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on November 21, 2017 at 6:25pm

बहुत सुंदर  ग़ज़ल 
भ्रमर ५

Comment by SALIM RAZA REWA on November 21, 2017 at 9:58am
जनाब आरिफ साहब,
ग़ज़ल पर आपकी शिरक़त और हौसला अफज़ाई के लिए दिली शुक्रिया महब्बत सलामत रहे.
Comment by Mohammed Arif on November 20, 2017 at 8:13am
आदरणीय सलीम रज़ा साहब आदाब,
उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र लाजवाब । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 19, 2017 at 4:38pm
जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब,
आपकी मुबारक़बाद का तहे दिल से शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on November 19, 2017 at 4:32pm
आ. बृजेश जी,
ग़ज़ल के तारीफ़ के लिए शुक्रिया,
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 18, 2017 at 9:01pm
पते की बात। बढ़िया प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब सलीम रज़ा रीवा साहिब।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 18, 2017 at 3:11pm
बड़ी उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीय..बधाई
Comment by SALIM RAZA REWA on November 18, 2017 at 9:50am


आदरणीय अभिनव अरुण जी ,
ग़ज़ल पे आपकी तारीफ़ के लिए शुक्रिया , बहुत दिनों बाद आप की आमद हुई आपको देखकर ख़ुशी हुई '

Comment by SALIM RAZA REWA on November 18, 2017 at 9:45am

जनाब तस्दीक़ साहिब ,
आपकी इनायत के लिए शुक्रिया।
आप सही कह रहे हैं ,,,,,,,,वहां है टाइप नहीं हो पाया , आप का शुक्रिया।

'' ख़ाक  का पुतला है  इंसाँ  ख़ाक में मिल जाएगा ''

Comment by SALIM RAZA REWA on November 18, 2017 at 9:43am

जनाब अफ़रोज़ साहिब ,
ग़ज़ल पे आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया ,
आप सही कह रहे हैं ,,,,,,,,वहां है टाइप नहीं हो पाया , आप का शुक्रिया।
'' ख़ाक का पुतला है इंसाँ ख़ाक में मिल जाएगा ''

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