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बंद दरवाज़ा देखकर

लौटी है दुआ

आँख खुली तो जाना ख़्वाब और सच है क्या

 

धीमे-धीमे दहक रहे है

आँखों में गुजरे प्यार वाले पल

राख हो कर भी सपने

गर्म है

बुझे आँच की तरह

 

बर्फ में जमे अहसास

मानो धुव में ठहरे

दिन –रात की तरह

 

चुपी ओढे बैठी मैं

चेहरे पर सजाए मुस्कुराहट

प्यार का मोती खोया

मन की गहराइयों में जाने कहा

 

बंद दरवाज़ा देखकर

लौटी है दुआ

 

(मौलिक और अप्रकाशित)

रिंकी राउत

 

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Comment

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Comment by Samar kabeer on November 15, 2017 at 5:34pm
मोहतरमा रिंकी राउत जी आदाब,कविता बहुत अच्छी है,बधाई स्वीकार करें ।
कुछ टंकण त्रुटियाँ सुधार लीजिये :-
'धीमे धीमे दहक रहे है-"हैं"
'गर्म है'-"गर्म हैं"
"बुझे आँच की तरह'-"बुझी आँच की तरह"
'चुपी औढे बैठी मैं'-"चुप्पी औढे बैठी मैं"
'मन की गहराईयों में जाने कहा'-"कहाँ"
Comment by SALIM RAZA REWA on November 15, 2017 at 4:12pm
रिंकी जी सुंदर रचना के लिए बधाई.
Comment by Sushil Sarna on November 15, 2017 at 1:39pm

आदरणीय रिंकी जी सुंदर अहसासों की सुंदर प्रस्तुति    .. हार्दिक बधाई। 

Comment by Mohammed Arif on November 15, 2017 at 10:47am
प्रिय रिंकी जी आदाब, सुंदर अहसासों की ख़ुशबू से सराबौर बेहतरीन कविता । हार्दिक बधाई और मंच पर स्वागत ।

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