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एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

2×15

कोई अपना साथ न आए, हर कोशिश नाकाम लगे

मेरे पास चले आना जब, जीवन ढलती शाम लगे

इसको पिछले जन्मों का फल,कहते हैं दुनिया वाले

पेड़ बबूल के बोये फिर भी,उसके हाथों आम लगे

बिक जाने की लाचारी का,एक तजुर्बा ये भी है

जितनी ज्यादा खुद्दारी थी,उतने ही कम दाम लगे

चौथ का चांद देखने वाले,पर लगता है झूठा दोष

हमने तो पूनम को देखा फिर भी सौ इल्जाम लगे

टूटा मन है ,रोगी तन है, रिश्तों में बेगानापन

यारो कुछ…

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Added by मनोज अहसास on August 7, 2019 at 9:13pm — 4 Comments

श्रमेव जयते

उद्मम करते जो सदा
कर्मनिष्ठ , मतिधीर
वे सम्पन्न समाज की 
रखते नींव , प्रवीर

श्रमेव जयते में सदा
जिनका है विश्वास
उनके ही श्रम विन्दु से 
ले वसुन्धरा श्वास

मेहनत भी एक साधना
नहीं कोई यह भोग
लक्ष्य केन्द्रित वृत्ति ही
बन जाए फिर योग

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on August 6, 2019 at 7:00pm — 3 Comments

अभिव्यक्ति का संत्रास ...

अभिव्यक्ति का संत्रास ...

वरण किया
आँखों ने
यादों का ताज
पूनम की रात में

होती रही स्रावित
यादें
नैन तटों से
अविरल
तन्हा बरसात में

वीचियों पर
यादों की
तैरती रही
परछाईयाँ
देर तक
तन्हा अवसाद में

कर न सके व्यक्त
अधरों से
अन्तस् के
सिसकते जज्बातों की
अव्यक्त अभिव्यक्ति का संत्रास
शाब्दिक अनुवाद में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 6, 2019 at 5:06pm — 10 Comments

मैं कोई तारा नही खुर्शीद हूँ

मुझसे ना उलझे कोई ये जान ले

मैं कोई श्लाघा नही ताकीद हूँ

तेरी मंज़िल तक तुझे पहुँचाऊगाँ

मैं कोई छलिया नही मुर्शिद हूँ

हंस रहे हैं मुझपे वो ये जान…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 6, 2019 at 4:30pm — 5 Comments

'देखो हिंदौस्तान फूँकता है'

2122 1212 112/22

जिस्म में पहले जान फूँकता है

बाद-अज़-जाँ अज़ान फूँकता है

सब्र कर शब गुज़र ही जाएगी

क्यों ये अपना मकान फूँकता है

अपनी नफ़रत की आग से कोई

देखो हिंदौस्तान फूँकता है

पास आकर वो गर्म साँसों से

मेरे दिल का जहान फूँकता है

आग तो सर्द हो चुकी कब की

क्यों अबस राखदान फूँकता है

हुक्म से रब के ल'अल मरयम का

देखो मुर्दे में जान फूँकता है

रोज़ आयात पढ़…

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Added by Samar kabeer on August 6, 2019 at 3:00pm — 19 Comments

तुम मेरे ख़ाबों के गुलशन में मिलो------ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

तुम मेरे ख़ाबों के गुलशन में रहो हक़ है तुम्हें

मुझ से जब चाहो ख़यालों में मिलो हक़ है तुम्हें

तुम को तकने की ख़ता, नींदें गँवाने की सज़ा

बदला आँखों से मेरी ऐसे ही लो हक़ है तुम्हें

बस तुम्हारा नाम हर पल जप रहा है मेरा दिल

मेरे सीने से लगो तुम भी सुनो हक़ है तुम्हें

कल्पना के व्योम में जितना मेरा विस्तार है

वह क्षितिज पूरा तुम्हारा, तुम उड़ो हक़ है तुम्हें

शब्द सारे भाव हर लय ताल…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2019 at 10:45am — 8 Comments

हवस - लघुकथा

पिछले दो घंटे से उसका परिवार इस टाइगर रिज़र्व में घूम रहा था. मौसम भी बेहद शानदार था इसलिए सब खुश थे. अभी तक काफी जानवर दिखाई पड़ गए थे लेकिन शेर से सामना नहीं हुआ था. गाइड लगातार बता रहा था कि वह ऐसी जगह ले चलेगा जहाँ कई शेर देखने को मिलेंगे, पहले बाकी जानवर देख लिए जाएँ. उसने भी सहमति दे दी और उनकी जीप धीरे धीरे जंगल में घूम रही थी.

"अरे यहाँ सिग्नल कमजोर है, आवाज कट रही है. मैंने एक मैसेज किया है, उसे पढ़कर लेक के किनारे वाले फ्लैट की रजिस्ट्री की तैयारी कर लो. मैं परसों तक आ जाऊंगा,…

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Added by विनय कुमार on August 5, 2019 at 4:30pm — 8 Comments

वो मेरा था तारा ...

वो मेरा था तारा ...

यादों के बादल से

नैनों के काजल से

लहराते आँचल से

जिसने पुकारा

वो

मेरा था तारा



महकती फिजाओं से

परदेसी हवाओं से

बरसाती राहों से

जिसने पुकारा

वो

मेरा था तारा

सपनों के अम्बर से

खारे समंदर से

मन के बवंडर से

जिसने पुकारा

वो

मेरा था तारा

यादों के नीड से

महकते हुए चीड से

ख्वाबों की भीड़ से

जिसने पुकारा

वो

मेरा था…

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Added by Sushil Sarna on August 5, 2019 at 3:35pm — 6 Comments

गाँव के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

गाँव के दोहे

संगत में जब से पड़ा, सभ्य नगर की गाँव

अपना घर वो त्याग कर, चला गैर के ठाँव।१।

***

मिलना जुलना बतकही, पनघट पर थी खूब

सब  अपनापन  मर  गया, मोबाइल  में  डूब।२।

***

बिछी सड़क कंक्रीट की, झुलसे जिसमें पाँव

पीपल कटकर गुम हुये, कौन करे फिर छाँव।३।

**

सेज माल  के  वास्ते, कटे  खेत  खलिहान

जिससे लोगों मिट गयी, गाँवों की पहचान।४।

**

सड़क योजना खा गयी, पगडंडी हर ओर

पहले सी होती  नहीं, अब  गाँवों  की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 5, 2019 at 8:36am — 10 Comments

अनसुने अनकहे के बीच

कहे-अनसुने-से रहे कुछ जज़्बात

उसपर अनकहे एहसासों का भार

अजीब-सी बेचैन बेकाबू धड़कन का

तकलीफ़-भरा भयानक शोर ...

पन्नों पर उतर तो आते हैं यह

पर भरमाया घबराया मन

इनकार भरा

भार कोई हल्का नहीं होता

पगलाई अन्दरूनी हवाएँ

खयालों-सी वेगवान

झकझोरती आसमानी तूफ़ान बनी

लफ़्ज़ों से लफ़्ज़ टकराते

सूखे पेड़ों-से छूटे पत्तों की तरह

आढ़ी-टेढ़ी लकीरों को बेतहाशा समेटते

लुढ़क जाती है स्याही

रात अँधेरी…

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Added by vijay nikore on August 5, 2019 at 7:52am — 6 Comments

चंद हाइकु ...

चंद हाइकु ...

संग दामिनी
धक-धक धड़के
प्यासा दिल

तड़पा गई
विगत अभिसार
बैरी चपला

लुप्त भोर
पयोद घनघोर
शिखी का शोर

छुप न पाया
विरह का सावन
दर्द बहाया

खूब नहाई
रूप की अंगड़ाई
रुत लजाई

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 3, 2019 at 5:07pm — 4 Comments

मुक्तक

ललालाला ललालाला ललालाला ललालाला

.

न मंदिर में मिले ईश्वर,  गुफाओं में न जाने से .

न भूखे  पेट रहने से, न गंगा ही नहाने से .

उसे पाना अगर सच में, हृदय में झाँक कर देखो ,

मिले रैदास, मीरा - प्रेम की बगिया खिलाने से .

.

कभी है धूप जीवन में, कभी मिलते यहाँ साए.

सहारे को नहीं ढूँढ़ो, मिले या फिर न मिल पाए. 

गिराती शाख कैसे फल, धरा पर सीख लो…

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Added by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 3, 2019 at 2:00pm — 2 Comments

आगाज़

एक तिल से ताड़ करो , आराम नहीं आगाज़ करो||

घर गृहथी का कार्य करो , और अपना भी कुछ सम्मान करो ||

पत्नी बनो, माँ बनो और बन जाओ एक लेखिका भी ||

लेखिका बनकर खिलादो वो सारे ज़ज़्बात भी||

मन बुद्धि शब्दों से बुद्धि मन पर प्रहार करो ||

एक तिल से ताड़ करो , आराम नहीं आगाज़ करो

कलम कागज़ को दोस्त बनाओ देकर उन्हें लेखन का न्योता

न्योता देकर पास बुलाओ और फिर करलो एक समझौता

की मेरा साथ निभाओगे और सभी दबे ज़ज़्बात खिलाओगे

एक तिल से…

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Added by Pratibha Pandey on August 3, 2019 at 12:30am — 4 Comments

ले बाहों में सोऊँगी ....

ले बाहों में सोऊँगी ....

सावन की बरसात को

प्रथम मिलन की रात को

धड़कते हुए जज़्बात को

संवादों के अनुवाद को

ले बाहों में सोऊँगी

अस्तित्व अपना खोऊँगी

अपनी प्रेम कहानी को

भीगी हुई जवानी को

बारिश की रवानी को

नैन तृषा दिवानी को

ले बाहों में सोऊँगी

अस्तित्व अपना खोऊँगी

उस नशीली रात को

उल्फ़त की बरसात को

अजनबी मुलाक़ात को

हाथों में थामे हाथ को

ले बाहों में सोऊँगी

अस्तित्व अपना…

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Added by Sushil Sarna on August 2, 2019 at 5:19pm — 4 Comments

उपेक्षा (लघुकथा )

 प्रयाग में गंगा से गले मिलकर यमुना ने कहा –” दीदी अब आगे तू ही जा I मेरी इच्छा  तुझसे भेंट करने की थी, वह पूरी हुयी I रही समुद्र में जाकर सायुज्य हो जाने की बात तो वह मोक्ष तुझे ही मुबारक हो I वह मुझे नहीं चाहिए I मैं अब इससे आगे नही जाऊँगी, न अकेले और न तेरे साथ I”

“मगर क्यों बहन ? तुम मेरे साथ क्यों नही चलोगी ? दुनिया मुक्ति के लिए कितने जतन करती है और तू है की मुख चुरा रही है ?”

“हां दीदी ?”

“पर क्यों ?”

“तू हमेशा ज्ञानियों के संग में रही है I…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 1, 2019 at 9:27pm — 16 Comments

बूँद भर

बूँद भर 

 

आँख में ठहरा रहा

अश्रू सम बहरा रहा

विस्फरित हो तन गया

बूँद भर जल बन गया

कह  दिया न कहना था जो

न सहा वो  सहना था जो

था ही क्या जो कह गया

मन बेमन हो रह गया

 

एक ताला बनती  चाबी

प्रश्न- माला कितनी बांची

कैसे झटका  सह गया

मोती -मोती कह गया

 

कैसे -कैसे  मन ने टाला

मन ही ने लेकिन उछाला

झरना सा सब झर  गया

बूँद भर जल रह…

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Added by amita tiwari on August 1, 2019 at 1:30am — 3 Comments

कुण्डलिया छंद -

1-

ख़ातूनों का हो गया, खत्म एक संत्रास।

चर्चित तीन तलाक का, हुआ विधेयक पास।।

हुआ विधेयक पास, सभी मिल खुशी मनाएँ।

अब होंगी भयमुक्त, सभी मुस्लिम महिलाएँ।।

बीती काली रात्रि, चाँद निकला पूनों का।

बढ़ा आत्मविश्वास, आज से ख़ातूनों का।।

2-

तीस जुलाई ने रचा, एक नया इतिहास।

मुद्दा तीन तलाक पर, हुआ विधेयक पास।।

हुआ विधेयक पास, साँस लेगी अब नारी।

कहकर तीन तलाक, जुल्म होते थे भारी।।

ख़ातूनों ने आज, विजय खुद लड़कर पाई।

दो हजार उन्नीस, दिवस है…

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Added by Hariom Shrivastava on July 31, 2019 at 7:51pm — 4 Comments

कैसे भूलें हम ....

कैसे भूलें हम ....

पागल दिल की बात को

सावन की बरसात को

मधुर मिलन की रात को

अधरों की सौगात को

बोलो

कैसे भूलें हम

अंतर्मन की प्यास को

आती जाती श्वास को

भावों के मधुमास को

उनसे मिलन की आस को

बोलो

कैसे भूलें हम

नैनों के संवाद को

धड़कन के अनुवाद को

बीते पलों की याद को

तिमिर मौन के नाद को

बोलो

कैसे भूलें हम

अंतस के तूफ़ान को

धड़कन की पहचान को

अधरों की…

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Added by Sushil Sarna on July 31, 2019 at 12:38pm — 4 Comments

शहर के हंकाई

लहू बुज़ुर्गो का मिट्टी में बहाने वालो

दागदारोँ को सरेआम बचाने वालो

बच्चोँ के हाथ में शमशीर थमाने वालो

बात फूलोँ की तुम्हारे मुँह से नहीं अच्छी लगती



खुदा के नाम पे दुकानों को चलाने वालो

धर्म् के नाम पर इंसा को बाँट्ने वालो…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 30, 2019 at 12:30pm — 3 Comments

बिन तेरे रात गुज़र जाए बड़ी मुश्किल है, सलीम 'रज़ा' रीवा

2122 1122 1122 22
बिन तेरे रात गुज़र जाए बड़ी मुश्किल है
और फिर याद भी न आए बड़ी मुश्किल है

खोल कर बैठे हैं छत पर वो हसीं ज़ुल्फ़ों को
ऐसे में धूप निकल आए बड़ी मुश्किल है

मेरे महबूब का हो ज़िक्र अगर महफ़िल में
और फिर आँख न भर आए बड़ी मुश्किल है

वो हसीं वक़्त जो मिल करके गुज़ारा था कभी
फिर वही लौट के आ जाए बड़ी मुश्किल है

वो सदाक़त वो सख़ावत वो मोहब्बत लेकर
फिर कोई आप सा आ जाए बड़ी मुश्किल है

---
मौलिक अप्रकाशित

Added by SALIM RAZA REWA on July 29, 2019 at 9:30pm — 3 Comments

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