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अनसुने अनकहे के बीच

कहे-अनसुने-से रहे कुछ जज़्बात

उसपर अनकहे एहसासों का भार

अजीब-सी बेचैन बेकाबू धड़कन का

तकलीफ़-भरा भयानक शोर ...

पन्नों पर उतर तो आते हैं यह

पर भरमाया घबराया मन

इनकार भरा

भार कोई हल्का नहीं होता

पगलाई अन्दरूनी हवाएँ

खयालों-सी वेगवान

झकझोरती आसमानी तूफ़ान बनी

लफ़्ज़ों से लफ़्ज़ टकराते

सूखे पेड़ों-से छूटे पत्तों की तरह

आढ़ी-टेढ़ी लकीरों को बेतहाशा समेटते

लुढ़क जाती है स्याही

रात अँधेरी बिछ जाती है

लावारिस लफ़्ज़ों की रूह पर

काले कफ़न की तरह

टूटा-अधटूटा सिफ़र होता

असंग आत्म-विश्वास

बिखर  चुका  है सब  भीतर

परेशान थका-खड़ा देखता हूँ मैंं

बदनसीब  कहे-अनसुने  जज़्बातों को

अब  मृत  हुए अनकहे  एहसासों को

पुरानी  खबर  की  तरह...

          ------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 528

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Comment by vijay nikore on August 9, 2019 at 3:52am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर कबीर जी

Comment by Samar kabeer on August 8, 2019 at 3:35pm

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,हमेशा की तरह एक उम्द: रचना,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on August 7, 2019 at 10:13am

आपका हार्दिक आभार, आदरणीय लक्ष्मण जी।

Comment by vijay nikore on August 7, 2019 at 10:12am

आपका हार्दिक आभार, आदरणीय C M Upadhay ji

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2019 at 6:14am

आ. भाई विजय जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई।

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 6, 2019 at 7:07pm

सुन्दर रचना 

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