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Vijay nikore's Blog (213)

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार पर

जब-जब जहाँ कहीं फूल खिले

तुझे याद किया था हमने ...

 

"क्या...

तुम्हारे मन के द्वार तक

मेरे दिल की दस्तक नहीं पहुंची ?"

दस्तक पहुँची

पहुँची हर बार

भागा, भाग कर गया

साँकल खोली

कोई था न द्वार पर

एक चिरकाल से जाने-पहचाने

अकेलेपन के सिवा

कुछ और न था

लौट आया मैं खाली हाथ

न, न, न

मुठ्ठी में लिखा नाम…

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Added by vijay nikore on July 27, 2026 at 9:00am — No Comments

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजते

भावनात्मक अवरोधों के दबाव में

कभी ऐसा भी तो होता है ...



समय समय से रूठ जाता है

प्यार रूठता नहीं

प्यार सूख जाता है

वह पहचाना नहीं जाता तब

पतझड़ में पत्तों की तरह

पीला, सूखा ... कुम्लाहया



एक असहनीय दर्द

शब्द गले में अटके

अधरों तक आए, भारी

और भारी

कुछ भी कहने में असमर्थ

रिश्ते के मुड़े पन्नों पर कुछ आँसू

बह-बह जाती है शब्दों की स्याही

व्यथा का मूल स्रोत खोजती



कितनी तीव्र… Continue

Added by vijay nikore on April 14, 2026 at 8:19am — 1 Comment

सुखद एकान्त है या है अकेलापन

तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी

इठलाता पवन, मतवाला पवन

तरू तरु के पात-पात पर

उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास

मेरा मन क्यूँ उन्मन

क्यूँ इतना उदास

 

खुशी ... पिघलती हुई मोम-सी

जाने क्यूँ उसे हमेशा

होती है जाने की जल्दी

आती है, चली जाती है

आ..ती  है 

आलोप हो जाती है

 

कोई टुकड़ा स्याह बादल का आकर

रुक गया है मेरी छत पर मानो

कैसा सिलसिला है प्रकृति का यह

दर्द की अवधि समाप्त नहीं…

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Added by vijay nikore on January 5, 2026 at 9:00am — 6 Comments

काला ताजमहल

यह मन हो मानो घर तुम्हारा अपना

पार क्षितिज से जैसे कोई रहस्य-बिंबित

स्वरातीत गीत-सी याद तुम्हारी चली आई

थीं चाहे कितनी भी हम में अपूर्णताएँ अपार

विश्वास की आढ़ में था ठहरा सनातन प्यार

हर…

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Added by vijay nikore on November 1, 2022 at 11:55am — 5 Comments

वेदना का वज़्न

दिशाविहीन

दयनीय दशा

दुख में वज़्न

दुख का वज़्न

व्यथित अनन्त प्रतीक्षा

उन्मूलित, उचटा-सा है मन

कि जैसे रिक्त हो चला जीवन

खाली लगती है…

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Added by vijay nikore on March 29, 2022 at 2:33pm — 11 Comments

कैसी थी यह अलविदा

"अन्तिम विदा" की शाम के बाद

कुछ पलों के लिए ही सही

एक बार पुन: तुम्हारा लोट आना

आँचभरी वेदना को छुपाती मेरी आँखों में देखना

मानवीय उलझनें, प्यार की तलाश

और अब अश्चर्य और उत्साह का सुप्रसार…

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Added by vijay nikore on December 27, 2021 at 4:00pm — 3 Comments

धक्का

निर्णय तुम्हारा निर्मल

तुम जाना ...भले जाना

पर जब भी जाना

अकस्मात

पहेली बन कर न जाना

कुछ कहकर

बता कर जाना

जानती हो न, चला जाता…

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Added by vijay nikore on December 7, 2021 at 12:00pm — 3 Comments

यह भूला-बिसरा पत्र ...तुम्हारे लिए

तेरे स्नेह के आंचल की छाँह तले

पल रहा अविरल कैसा ख़याल है यह

कि रिश्ते की हर मुस्कान को

या ज़िन्दगी की शराफ़त को

प्यार के अलफ़ाज़ से

क़लम में पिरो लिया है,

और फिर सी दिया है... कि

भूले से भी कहीं-कभी

इस रिश्ते की पावन

मासूम बखिया न उधड़े

और फिर कस दिया है उसे

कि उसमें कभी भी अचानक

वक़्त का कोई

झोल न पड़ जाए।

 

सुखी रहो, सुखी रहो, सुखी रहो

हर साँस हर धड़कन दुहराए

स्नेह का यही एक ही…

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Added by vijay nikore on December 5, 2021 at 5:06pm — 18 Comments

श्रध्दांजलि

बेमौसम पतझड़ आया हो जैसे

पेड़ से झड़ते पत्तों-सी थर्राती

परिक्लांत पक्षी की पुकार

बींधती कराह-सी

सारी हवा में घुल गई

शोक समाचार को सुनते ही

आज अचानक

हवा जहाँ कहीं भी थी

वहीं की वहीं रूक गई

कि जैसे वह दिवंगत आत्मा

मेरे मित्र

केवल तुम्हारी माँ ही नहीं, वह तो

सारी सृष्टि की माँ रही

पेड़, पत्ते, पक्षी, मुझको, तुमको

एक संग सभी को

आज अनाथ कर गई

 

पुनर्जन्म सच है यदि तो कैसे कह…

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Added by vijay nikore on October 3, 2021 at 3:00pm — 4 Comments

आश्वासन

एक आयु के उपरान्त

प्रेम मुदित तुम्हारा लौट आना

गुज़रती साँसों को मानो

संजीवनी की बूटी से

साँस नई दे देना

स्नेह का यह फल मीठा

और अति आनन्ददायक था…

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Added by vijay nikore on June 7, 2021 at 1:00pm — 8 Comments

अनजाना उन्माद

अनजाना  उन्माद

 

मिलते ही तुमसे हर बार

नीलाकाश सारा

मुझको अपना-सा लगे

बढ़ जाए फैलाव चेतना के द्वार

कण-कण मेरा पल्लवित हो उठे

कि जैसे नए वसन्त की नई बारिश

दूर उन खेतों के उस पार से ले आती

भीगी मिट्टी की नई सुगन्ध

कि जैसे कह रही झकझोर कर मुझसे ....

मानो मेरी बात, तुम जागो फिर एक बार    

सुनो, आज प्यार यह इस बार कुछ और है

 

और तुम ...…

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Added by vijay nikore on May 9, 2021 at 2:30pm — 2 Comments

विदा की वह शाम ...

विदा  की  वह  शाम

 

प्रबल  झंझावात  के  बाद  मानो

दिशा-दिशा   आकुल अकथ  सुनसान

निस्तब्ध   शांत ... और  इस  पर

दिन  से सम्बन्ध  तोड़  रही

वैभव-विहीन  शाम…

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Added by vijay nikore on April 27, 2021 at 2:30pm — 2 Comments

यह रास्ते ... यह मोड़

यह रास्ते … यह मोड़
 
मुद्दतें  हो  चुकी  हैं रास्तों  को
रास्तों  से अलग  हुए
फिर  भी  कोई  उमीद  लिए
रात से  भोर  तक और  फिर
एक और  रात  तक  
लैम्पपोस्ट  के कांपते  प्रकाश  तले
समर्पण  भाव  से  यह  रास्ते
चट्टानी  चुप्पी  की  चादर  ओढ़े
यह  उसी  मोड़  पर जुड़े  रहे
 
जमी  रही  है  उस  मोड़  पर
अनोखी  इमानदारी  से
हमारी  विरह  की…
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Added by vijay nikore on April 24, 2021 at 11:30pm — 3 Comments

आँखों के द्वार बंद होने से पहले

झुक आई है एक और शाम

ग्रभ में गहरी-भूरी स्तब्धता लिए

कुछ फ़ासले, कुछ फ़ैसले

लगते थे जो कभी

थे हमारे लिए नहीं

हर किसी और के लिए

खड़े हैं अब वही फ़ासले

वही फ़ैसले 

घूर रहे हैं सवाल बने बड़े-बड़े

सवालों के उत्तर की प्रत्याशा

ले आती एक और गंभीर शाम

और फिर एक और   ...

मंज़िल तो लगती ही थी हमेशा

पकड़ के बाहर, पहुँच से दूर बहुतं

लेकिन उस आखरी शाम

कुछ तुमने कहा, जो मैंने सुना

"मेरे…

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Added by vijay nikore on February 16, 2021 at 7:00am — 5 Comments

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

 

कई दशक पहले मैं जब भी प्रिय अमृता प्रीतम जी के उपन्यास पढ़ता था, पुस्तक को रखते एक कसक-सी होती थी, यह इसलिए कि एक बार आरम्भ करके उनकी पुसत्क को रखना कठिन होता था। आज भी ऐसा ही होता है। जब से एक प्रिय मित्र पिंकी केशवानी जी ने अमृता जी की पुस्तक “मन मंथन की गाथा” मुझको भेंट में भेजी, जब भी ज़रा-सा अवकाश मिलता है, यह पुस्तक मुझको झट पास बुलाती है।

मित्र पिंकी ने पुस्तक में लिखा, “एक छोटी-सी भेंट,…

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Added by vijay nikore on September 25, 2020 at 10:51pm — 1 Comment

आत्मबोध

खालीपन का भारीपन

नहीं मालूम, नहीं मालूम मुझको

मेरा यह अनुभव केवल मेरा ही है

या है यह हर किसी का

कहीं कुछ खो देने की पीड़ा से निवर्त होने  का

अनवरत  प्रारम्भिक  प्रयास…

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Added by vijay nikore on August 24, 2020 at 7:30am — 4 Comments

बदलाव !

बदलाव !

तड़के प्रात:

स्वच्छ धूप की नरम दूब से

मिलने की उत्सुक्ता ...

 

कुछ इसी तरह कोई लोग

कितनी उत्सुक्ता से अपने बनते

निज को समर्पित…

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Added by vijay nikore on May 14, 2020 at 5:00am — 6 Comments

तृप्ति

तृप्ति

चहुँ ओर उलझा कटा-पिटा सत्य

कितना आसान है हर किसी का

स्वयं को क्षमा कर देना

हो चाहे जीवन की डूबती संध्या

आन्तरिक द्वंद्व और आंदोलन

मानसिक सरहदें लाँघते अशक्ति, विरोध

स्वयं से टकराहट

व्यक्तित्व .. यंत्रबद्ध खंड-खंड

जब देखो जहाँ देखो हर किसी में

पलायन की ही प्रवृत्ति

एक रिश्ते से दूसरे ...

एक कदम इस नाव

एक ... उस…

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Added by vijay nikore on May 13, 2020 at 5:30am — 4 Comments

चेतना का द्वार

चेतना का द्वार

उठते ही सवेरे-सवेरे

चिड़ियों की चहचहाट नहीं

आकुल क्रन्दन... चंय-चंय-चंय

शायद किसी चिड़िया का बीमार बच्चा

साँसे गिनता घोंसले से नीचे गिरा था

वह तड़पा, काँपा…

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Added by vijay nikore on May 4, 2020 at 1:00pm — 7 Comments

आत्मावलंबन

आत्मावलंबन

बाहरी दबाव और आंतरिक आदर्श 

असीम उलझन और तीव्रतम संघर्ष

ऐसा भी तो होता है कभी

कि मन का सारा संघर्ष मानो

किसी एक बिंदु पर केंद्रित हो उठा हो

और पीड़ा ... जहाँ कहीं से भी उभरी

सारी की सारी द्रवित हो कर

उस एक बिंदु के इर्द-गिर्द

ठहर-सी गई हो

बह कर कहीं और चले जाने का

उस पीड़ा का

कोई साधन न हो

वाष्प-सा उसका उड़…

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Added by vijay nikore on April 28, 2020 at 6:52am — 6 Comments

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