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अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

 

कई दशक पहले मैं जब भी प्रिय अमृता प्रीतम जी के उपन्यास पढ़ता था, पुस्तक को रखते एक कसक-सी होती थी, यह इसलिए कि एक बार आरम्भ करके उनकी पुसत्क को रखना कठिन होता था। आज भी ऐसा ही होता है। जब से एक प्रिय मित्र पिंकी केशवानी जी ने अमृता जी की पुस्तक “मन मंथन की गाथा” मुझको भेंट में भेजी, जब भी ज़रा-सा अवकाश मिलता है, यह पुस्तक मुझको झट पास बुलाती है।

मित्र पिंकी ने पुस्तक में लिखा, “एक छोटी-सी भेंट, सस्नेह”... छोटी-सी भेंट ? क्या आप अनुमान लगा सकती हैं कि आपकी यह भेंट मेरे लिए खज़ाना है।

अमृता जी की पुस्तकें मुझको सदैव बहुत अपनी-सी लगती रहीं। वह इसलिए कि जैसे वह मेरे मन की बात कह रही हों, कि जैसे उनके और मेरे जीवन के अनुभव एक हों। उदाहरणार्थ ... 1960 में जब वह इमरोज़ जी से पहली बार मिलीं तो उन्होंने उस अनुभव को कुछ यूँ बयाँ किया, ... “ मिलन और बिछोह की, मसर्रत और दर्द की एक बहुत नाज़ुक जगह पर खड़ी थी।“ इस पुस्तक में यह पढ़ते ही मुझको मेरी एक कविता की पंक्तियाँ याद आ गईं....

                 “पा लेने की प्यास

                  खो देने की तड़प

                  ज्वालामुखी अग्नि हैं दोनों”

सुख और दुख का यह अद्भुत  समन्वय, मिलन और बिछोह का समीकरण, कि जैसे धूप और अंधेरा एक संग.... और हमें इस बीच किसी एक पर भी अधिकार न हो, कोई एक कसक चुपके से अनजाने घर बना लेती है भीतर, और वह कसक ऐसी कि उसे हम किसी से कह नहीं पाते।

सन 1960 में अमृता जी दिल्ली में पश्चिम पटेल नगर रहती थीं... आल इन्डिया रेडिओ में कार्यरत थीं। 1960 में इमरोज़ जी से पहली बार मिलने के बाद उनका परस्पर अपनत्व बढ़ता ही गया। यह केवल अपनत्व नहीं था, अटूट परस्पर विश्वास था यह, जो उनके अंत तक कायम रहा।

सन 1963 में अमृता जी के “हौज़ खास” घर पर उनसे मिला तो बातों बातों में उनके पटेल नगर के घर की बात हुई ... पल भर को वह चुप, ख़्यालों  में खो गईं, और फिर तुरंत सचेत। कहने लगीं, (पंजाबी में), “ हाँ जी, औ वी कोई दिन सी, लोकी छडदे नईं सी” (हाँ जी, वह भी  कोई दिन थे, लोग छोड़ते नहीं थे )। मैं जानता था कि अमृता जी यह किस संदर्भ में कह रही थीं। समाज पुराना था, अभी भी पुराना है, शायद कई चीज़ों में कभी न बदलेगा। संदर्भ यह कि इमरोज़ जी उनको स्कूटर पर बैठा कर आल इन्डिया रेडियो काम पर ले जाते थे, और अमृता जी के पड़ोसी ऐसा देखते जाने कैसी-कैसी खराब अफ़वाहें उड़ाते थे। किस-किस का मुँह बन्द करतीं ।

बातें करते-करते अमृता जी अकसर पल भर को चुप-सी हो जाती थीं, कि जैसे कोई नाज़ुक घड़ी लौट आई हो और उन्हें बाँध-सी लेती हो। ऐसा हम में से कई लोगों के साथ हुआ है, परन्तु अमृता जी के साथ बैठे उनको इस घड़ी से गुज़रते देखना मेरे लिए कुछ और ही रहा है। यह इसलिए कि उनके मन की गहराई उस पल के बाद कुछ इस तरह से अचानक प्रश्न पूछती थी कि मैं अवाक रह जाता था।

ऐसे ही एक पल अमृता जी ने कुछ रुक कर मुझसे एक प्रश्न पूछा था, “ विजय जी, थुवानु किवें पता लगदा है कि किसे दी सच्चई विच किन्नी सच्चाई  वे ?” ... अनुवाद, “ विजय जी, आपको कैसे पता चलता है कि किसी की सच्चाई में कितनी सच्चाई है ?”। ऐसा सवाल, और वह भी मुझसे, जब मैं केवल 22 वर्ष का होने को था ।

हैरान था और अवाक था मैं, कुछ पल चुप, और फिर मैंने उत्तर दिया, “ ऐ ते depend करदा ऐ कि किसे विच थुवाडा विश्वास कदी खरा उतरा वे कि नईं”  .... अनुवाद ..( यह तो depend करता है कि कभी आपका किसी पर विश्वास खरा उतरा है कि नहीं)।

यह सुन कर उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। कहने लगीं, “सवाल होंदे ने, मैं कदी-कदी थुवाडे कोल पुछ लैंदी आँ”   ...  अनुवाद, “ सवाल होते हैं, मैं कभी-कभी आपसे पूछ लेती हूँ। मेरी आँखे  यह सुनते ही उसी पल भीग गईं, कि उनका मुझमें इतना विश्वास ? इतना आदर ?

आज भी यह घटना याद आती है, पलकें भीग जाती हैं, अमृता जी को बहुत “मिस” करता हूँ।

बहुत याद आ रही है उनकी एक पंक्ति .... “ मेरे माथे का तेवर हवन कुण्ड में से उठते हुए धुएँ की लकीर है”।

                                                                    -----------

--- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2021 at 6:45am

आ. भाई विजय जी, अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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