For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

 

कई दशक पहले मैं जब भी प्रिय अमृता प्रीतम जी के उपन्यास पढ़ता था, पुस्तक को रखते एक कसक-सी होती थी, यह इसलिए कि एक बार आरम्भ करके उनकी पुसत्क को रखना कठिन होता था। आज भी ऐसा ही होता है। जब से एक प्रिय मित्र पिंकी केशवानी जी ने अमृता जी की पुस्तक “मन मंथन की गाथा” मुझको भेंट में भेजी, जब भी ज़रा-सा अवकाश मिलता है, यह पुस्तक मुझको झट पास बुलाती है।

मित्र पिंकी ने पुस्तक में लिखा, “एक छोटी-सी भेंट, सस्नेह”... छोटी-सी भेंट ? क्या आप अनुमान लगा सकती हैं कि आपकी यह भेंट मेरे लिए खज़ाना है।

अमृता जी की पुस्तकें मुझको सदैव बहुत अपनी-सी लगती रहीं। वह इसलिए कि जैसे वह मेरे मन की बात कह रही हों, कि जैसे उनके और मेरे जीवन के अनुभव एक हों। उदाहरणार्थ ... 1960 में जब वह इमरोज़ जी से पहली बार मिलीं तो उन्होंने उस अनुभव को कुछ यूँ बयाँ किया, ... “ मिलन और बिछोह की, मसर्रत और दर्द की एक बहुत नाज़ुक जगह पर खड़ी थी।“ इस पुस्तक में यह पढ़ते ही मुझको मेरी एक कविता की पंक्तियाँ याद आ गईं....

                 “पा लेने की प्यास

                  खो देने की तड़प

                  ज्वालामुखी अग्नि हैं दोनों”

सुख और दुख का यह अद्भुत  समन्वय, मिलन और बिछोह का समीकरण, कि जैसे धूप और अंधेरा एक संग.... और हमें इस बीच किसी एक पर भी अधिकार न हो, कोई एक कसक चुपके से अनजाने घर बना लेती है भीतर, और वह कसक ऐसी कि उसे हम किसी से कह नहीं पाते।

सन 1960 में अमृता जी दिल्ली में पश्चिम पटेल नगर रहती थीं... आल इन्डिया रेडिओ में कार्यरत थीं। 1960 में इमरोज़ जी से पहली बार मिलने के बाद उनका परस्पर अपनत्व बढ़ता ही गया। यह केवल अपनत्व नहीं था, अटूट परस्पर विश्वास था यह, जो उनके अंत तक कायम रहा।

सन 1963 में अमृता जी के “हौज़ खास” घर पर उनसे मिला तो बातों बातों में उनके पटेल नगर के घर की बात हुई ... पल भर को वह चुप, ख़्यालों  में खो गईं, और फिर तुरंत सचेत। कहने लगीं, (पंजाबी में), “ हाँ जी, औ वी कोई दिन सी, लोकी छडदे नईं सी” (हाँ जी, वह भी  कोई दिन थे, लोग छोड़ते नहीं थे )। मैं जानता था कि अमृता जी यह किस संदर्भ में कह रही थीं। समाज पुराना था, अभी भी पुराना है, शायद कई चीज़ों में कभी न बदलेगा। संदर्भ यह कि इमरोज़ जी उनको स्कूटर पर बैठा कर आल इन्डिया रेडियो काम पर ले जाते थे, और अमृता जी के पड़ोसी ऐसा देखते जाने कैसी-कैसी खराब अफ़वाहें उड़ाते थे। किस-किस का मुँह बन्द करतीं ।

बातें करते-करते अमृता जी अकसर पल भर को चुप-सी हो जाती थीं, कि जैसे कोई नाज़ुक घड़ी लौट आई हो और उन्हें बाँध-सी लेती हो। ऐसा हम में से कई लोगों के साथ हुआ है, परन्तु अमृता जी के साथ बैठे उनको इस घड़ी से गुज़रते देखना मेरे लिए कुछ और ही रहा है। यह इसलिए कि उनके मन की गहराई उस पल के बाद कुछ इस तरह से अचानक प्रश्न पूछती थी कि मैं अवाक रह जाता था।

ऐसे ही एक पल अमृता जी ने कुछ रुक कर मुझसे एक प्रश्न पूछा था, “ विजय जी, थुवानु किवें पता लगदा है कि किसे दी सच्चई विच किन्नी सच्चाई  वे ?” ... अनुवाद, “ विजय जी, आपको कैसे पता चलता है कि किसी की सच्चाई में कितनी सच्चाई है ?”। ऐसा सवाल, और वह भी मुझसे, जब मैं केवल 22 वर्ष का होने को था ।

हैरान था और अवाक था मैं, कुछ पल चुप, और फिर मैंने उत्तर दिया, “ ऐ ते depend करदा ऐ कि किसे विच थुवाडा विश्वास कदी खरा उतरा वे कि नईं”  .... अनुवाद ..( यह तो depend करता है कि कभी आपका किसी पर विश्वास खरा उतरा है कि नहीं)।

यह सुन कर उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। कहने लगीं, “सवाल होंदे ने, मैं कदी-कदी थुवाडे कोल पुछ लैंदी आँ”   ...  अनुवाद, “ सवाल होते हैं, मैं कभी-कभी आपसे पूछ लेती हूँ। मेरी आँखे  यह सुनते ही उसी पल भीग गईं, कि उनका मुझमें इतना विश्वास ? इतना आदर ?

आज भी यह घटना याद आती है, पलकें भीग जाती हैं, अमृता जी को बहुत “मिस” करता हूँ।

बहुत याद आ रही है उनकी एक पंक्ति .... “ मेरे माथे का तेवर हवन कुण्ड में से उठते हुए धुएँ की लकीर है”।

                                                                    -----------

--- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 367

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 26, 2021 at 6:45am

आ. भाई विजय जी, अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
14 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का "
15 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"क्या गिला गर किसी को भूल गया इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात…"
15 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक राज कपूर जी नमस्कार बहुत- बहुत धन्यवाद आपका आपने समय निकाला ग़ज़ल तक आए और ऐसी बेहतरीन…"
15 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय अजय गुप्ता 'अजेय' जी नमस्कार बहुत धन्यवाद आपका आपने समय दिया आपने सहीह फ़रमाया गुणी…"
15 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक…"
15 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात ही को भूल गया "
16 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"इस सुझाव को विशेष रूप से रूहानी नज़रिये से भी देखेंहुस्न मुझ पर सवार होने सेशेष सारी कमी को भूल…"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई दयाराम जी, अभिवादन व आभार।"
20 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"हार्दिक आभार आदरणीय "
20 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय दयाराम जी नमस्कार  बहुत शुक्रिया आपका  सादर "
22 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक जी सादर अभिवादन  बहुत बहुत धन्यवाद आपका  बहुत अच्छे सुझाव हैं ग़ज़लमें निखार…"
22 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service